सिर्फ हंगामा ही मकसद है कांग्रेस का?
पिछले 11 साल से विपक्ष में बैठे देश के सबसे बड़े और पुराने राजनीतिक दल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने सिर्फ हंगामा खड़ा करने का काम किया। न वे देश की सूरत बदल पाए और न ही आमजन के दिलों में आग जला पाए।...

कहां चूक रहा विपक्ष : 11 साल की चूक और लगातार पतन की कहानी
– राजेश कसेरा,
वरिष्ठ पत्रकार
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हर बार की तरह संसद के मानसून सत्र का पहला सप्ताह भी हंगामे की भेंट चढ़ गया। कांग्रेस ने सदन के अंदर और बाहर पहलगाम और ऑपरेशन सिंदूर पर चर्चा को लेकर केन्द्र सरकार को घेरने का पूरा प्रयास किया। लेकिन सरकार की ओर से दोनों सदनों में चर्चा के लिए समय निर्धारित होते ही गेंद फिर कांग्रेस के हाथ से निकलती दिखने लगी। देखा जाए तो बीते एक दशक में कांग्रेस का यही रवैया देखने को मिला है। संसद के सत्रों में भागीदारी निभाने से ज्यादा कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने समय जाया करने का काम किया। इसका सीधा लाभ सत्तारूढ़ दल को मिला और उन्होंने जो मिशन तय किया, उसे बकायदा संसद के दरवाजे से बाहर निकालकर पूरा भी कर दिखाया। भाजपा और मोदी ने भांप लिया कि कैसे और कहां कांग्रेस और विपक्ष को उलझाकर रखना है। सत्तारूढ़ सरकार ने अपने एजेंडे के हिसाब से न केवल अपने संकल्पों को साधा, विपक्ष से भी मनचाहा करवा लिया। मोदी- शाह की जोड़ी ने सभी मोर्चों पर विपक्ष को बेनकाब करने के साथ उनको शिकस्त पर शिकस्त देने का काम भी किया।
राजनीतिक रूप से विश्लेषण करेंगे तो साफतौर पर दिख जाएगा कि बीते 11 सालों में कांग्रेस ने सिर्फ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अपने राडार पर रखा। हर मुद्दे पर उनको घेरने का ही काम किया और इसे स्थायी रणनीति बनाकर अपने संगठन के नीचे तक यही संदेश दिया कि मोदी पर राजनीतिक प्रहार से केन्द्र सरकार और भाजपा संगठन दोनों कमजोर होंगे। यही कारण रहा कि कांग्रेस के शीर्ष से लेकर नीचे तक के पदाधिकारियों ने गली-कूचों की समस्याओं तक से मोदी को जोड़ना शुरू कर दिया। इसका खमियाजा लगातार झेलने के बाद भी कांग्रेस ने इससे कोई सबक नहीं लिया और चुनाव-दर-चुनाव हार का स्वाद ही चखा। जिन राज्यों में उसको सरकार बनाने का मौका भी मिला तो वहां के सियासी समीकरणों और लगातार चले आ रहे ट्रैंड के कारण मिला। नहीं तो छह दशक तक देश पर राज करने वाले दल का इतना तेजी से संतुलन तो नहीं बिगड़ता। इसे कांग्रेस के निरंतर पतन का कारण ही कहा जाएगा कि 1984 के लोकसभा चुनाव में सिर्फ दो सीटों वाली भारतीय जनता पार्टी आज केंद्र और 18 राज्यों में शासन कर रही है। स्वतंत्रता के बाद की भारतीय राजनीति का यह सबसे बड़ा परिवर्तन है। भाजपा उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्यप्रदेश, राजस्थान और असम सहित 14 राज्यों में अपने दम पर सत्ता में है तो एनडीए सहयोगियों के साथ बिहार और आंध्रप्रदेश सहित चार और राज्यों में सत्तारूढ़ गठबंधन का हिस्सा हैं।
राहुल गांधी: कांग्रेस का आज, कल और भविष्य
देश से राजनीतिक जनाधार लगातार खिसकने के बावजूद कांग्रेस ने अपने संगठन और जमीनी स्तर पर कोई ठोस काम नहीं किया। पार्टी की कमान भी बीते दो दशक से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से राहुल गांधी के हाथ में ही रहीं। वे ही पार्टी का बीता कल, आज और आने वाला कल बनकर रह गए। पार्टी के अनुभवी रणनीतिकार को दरकिनार कर दिए गए। इसका परिणाम ये रहा कि अक्टूबर 2009 में 32 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में से 13 में कांग्रेस की सरकारें थीं। वहीं 3 अन्य राज्यों में नेशनल कॉन्फ्रेंस, झारखंड मुक्ति मोर्चा और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के साथ गठबंधन में थी। केवल छह राज्यों में भाजपा की सरकारें थीं, जबकि दो राज्यों पंजाब और बिहार में सहयोगी दलों की सरकारें थीं। पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा में वामपंथी दल सत्ता में थे। इसके बाद 2014 में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बावजूद कांग्रेस 9 राज्यों में सत्ता में थी। जम्मू-कश्मीर, बिहार और झारखंड में सहयोगियों की सरकारें थीं। लेकिन, 2025 तक आते-आते तस्वीर एकदम पलट गई। भाजपा ने देशभर में अपने सहयोगियों के साथ मिलकर कमल खिला दिया तो कांग्रेस मात्र तीन राज्यों हिमाचल प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक तक सिमट कर रह गई। कांग्रेस को इस हाल पर लाने वाले राहुल गांधी ही रहे।
न पार्टी के नेता मान रहे, न गुटबाजी खत्म हुई
कांग्रेस की हार का असर राहुल और उनकी टीम को भले न पड़ा हो, पर जमीनी स्तर पर संगठन तितर-बितर हो गया। कांग्रेस में बिगाड़ने वालों की तादाद बढ़ गई। संगठन स्तर पर उसके नेता पार्टी लाइन नहीं मान रहे, न गुटबाजी खत्म हो रही है। राहुल गांधी ने ट्रबल मेकिंग स्टेट्स पर फोकस करते हुए इसी साल अप्रैल में गुजरात का दौरा किया, जहां उन्होंने कांग्रेस के संगठन सृजन कार्यक्रम का आगाज किया। दूसरा पड़ाव मध्यप्रदेश व तीसरा हरियाणा में रहा। संगठन को फिर से मजबूत करने को राहुल ने काम तो शुरू किया, पर जिन राज्यों में उन्होंने भाजपा से लोहा लेने की कवायद शुरू की, वहां उनके हाल सबसे ज्यादा खराब हैं। गुजरात में कांग्रेस वर्ष 1995 से सत्ता से बाहर है। मध्यप्रदेश में कमलनाथ की अगुवाई वाली 15 महीने की छोटी अवधि की सरकार हटा दें तो कांग्रेस वर्ष 2003 से सत्ता से दूर है। हरियाणा में भी ग्रैंड ओल्ड पार्टी लगातार तीन विधानसभा चुनाव हार चुकी है। ये तीनों ही राज्य कांग्रेस के लिए कमजोर कड़ी बने हुए हैं।
अपनों पर ही ठीकरा फोड़ने की पुरानी आदत
देश में पार्टी के खिसकते जनाधार से राहुल इतने परेशान हो गए कि भाजपा या अन्य विरोधी दलों से लड़ने के बजाय उन्होंने गुजरात में तो पार्टी के एक बड़े वर्ग को भाजपा के लिए काम करने का जिम्मेदार ठहरा दिया। लोकसभा चुनाव में उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन के बाद राहुल गांधी और गांधी परिवार से जुड़े नेताओं को उम्मीद थी कि आगे सब अच्छा होगा और समर्थकों में जोश का संचार होगा। लेकिन, पांच प्रदेशों हरियाणा, झारखंड, जम्मू-कश्मीर, महाराष्ट्र, दिल्ली के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन कमजोर होता गया। दिल्ली में तो पार्टी का खाता तक नहीं खुल पाया। ऐसा दिल्ली में लगातार तीसरी बार हुआ। हाल तो ये हैं कि देश के पांच प्रदेशों की विधानसभा में कांग्रेस का कोई प्रतिनिधित्व ही नहीं हैं। ये राज्य हैं पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, दिल्ली, नागालैंड और सिक्किम। कांग्रेस अपने खोते जनाधार को वापस पाने के लिए कोई सकारात्मक या ठोस प्रयास नहीं कर रही। अब तो उसके सहयोगी दल भी गठबंधन के तहत सीट नहीं देना चाह रहे।
विश्लेषकों की चेतावनी अनसुनी
देश में कई राजनीतिक विश्लेषक अक्सर कांग्रेस के पतन के कारण गिनाते हैं। वे उनको आगाह भी करते हैं, लेकिन कांग्रेस, राहुल और उनको घेरे रहने वाले नेता न तो इसको समझते हैं और न ही कोई सीख लेते हैं। पार्टी और उसका शीर्ष नेतृत्व अपनी कमी का दोष अपने दल के कार्यकर्ताओं, नेताओं तथा अन्य लोगों पर मढ़ने का अवसर ढूंढते हैं। इसे ये भी मान सकते हैं कि कांग्रेस ने अपना आकलन करना ही बंद कर दिया है, जो उसके पतन का कारण बन रही है। स्वतंत्रता के बाद से मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति की समीक्षा करने का भी प्रयास नहीं किया गया। वर्ष 2014 के चुनाव में मानमर्दन के बाद हार के कारणों की समीक्षा के लिए गठित एंटनी समिति ने अपनी पड़ताल में पाया था कि मुस्लिमों की ओर झुकाव का पार्टी को भारी नुकसान उठाना पड़ा। इसके बावजूद कांग्रेस ने उससे कोई सबक नहीं लिया। आंतरिक सुरक्षा से जुड़े कुछ मुद्दों पर भी उसका रवैया उसे संदिग्ध बनाता है। पार्टी देश के बदलते मानस और राजनीतिक परिदृश्य को समझ नहीं पा रही और अपना जनाधार एवं प्रासंगिकता खोती जा रही है।
आंकड़े बताते हैं कांग्रेस के गिरते ग्राफ की हकीकत
साल 1962 से 1984 के बीच कांग्रेस का देश में स्ट्राइक रेट 50 फीसदी से ज़्यादा था। इन वर्षों में केवल 1977 अपवाद था। आपातकाल के बाद कांग्रेस का स्ट्राइक रेट 31 फीसदी रहा और इंदिरा गांधी की सरकार गिर गई थी। साल 1984 में कांग्रेस सबसे मजबूत स्थिति में थी, तब पार्टी को 491 में से 404 सीटों पर जीत मिली थी। इसके बाद कांग्रेस कभी 50 फीसदी का स्ट्राइक रेट हासिल नहीं कर पाई। साल 1989 में स्ट्राइक रेट 39 फीसदी रहा। साल 1991 में यह आधे के करीब पहुंचा और स्ट्राइक रेट 48 फीसदी रहा। साल 1996 से 2004 के बीच पार्टी मुश्किल से एक तिहाई सीटें (29 फीसदी) जीत पाई। साल 2004 में कांग्रेस ने गठबंधन की सरकार बनाई, तब पार्टी को 35 फीसदी सीटें मिली। साल 2009 में पार्टी का स्ट्राइक रेट 47 फीसदी तक पहुंचा था। साल 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आई। उस साल कांग्रेस का स्ट्राइक रेट घटकर नौ फीसदी रह गया। कांग्रेस ने 464 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए, लेकिन पार्टी को 420 सीटों (91 फीसदी) पर हार का सामना करना पड़ा। 2019 के लोकसभा चुनाव में 421 सीटों में से 369 सीटों (88 फीसदी) पर कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा। 2024 के चुनाव में कांग्रेस ने अपना स्ट्राइक रेट सुधाकर 8 फीसदी से 28 फीसदी किया। उसने भाजपा के साथ सीधे मुकाबलों की कुल 214 में से 61 सीटें जीतीं। इस चुनाव में कांग्रेस को ऑक्सीजन मिली और उसने 53 नई सीटें जीतीं और पार्टी को 47 सीटों का लाभ मिला। 2019 में 52 सीटें जीतीं थीं जो 99 हो गईं। यानी 90.38 प्रतिशत का इजाफा किया। इसके बावजूद इस जीत के क्रम को वे बरकरार नहीं रख पाए।






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