बिहार में हंगामा क्यों है बरपा..?
बिहार विधानसभा चुनाव में अभी कुछ महीने बाकी हैं, लेकिन राजनीतिक हलचल चरम पर है। चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) ने विपक्ष को ‘वोटबंदी’ जैसे आरोप लगाने का मौका दे दिया...

बिहार चुनाव : चुनाव से पहले ‘वोटबंदी’ के आरोपों पर विपक्ष का हमला
राधा रमण,
वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक
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बिहार में नई विधानसभा का गठन भले ही इस साल 22 नवम्बर से पहले होने हैं, लेकिन सियासी तापमान अभी से बढ़ा हुआ है। इसका कारण चुनाव की घोषणा के ठीक पहले चुनाव आयोग का मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) कराने का फैसला है। इसे लेकर बिहार के विपक्षी दलों में भूचाल सा आ गया है। संसद में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालूप्रसाद यादव और राबड़ी देवी, पूर्व उप मुख्यमंत्री और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव, जनसुराज पार्टी के संयोजक प्रशांत किशोर, माले नेता दीपांकर भट्टाचार्य, निर्दलीय सांसद राजेश रंजन ऊर्फ पप्पू यादव समेत कई नेताओं ने इसे नोटबंदी की तर्ज पर ‘वोटबंदी’ करार देते हुए बिहार के मतदाताओं की हकमारी कहा है। उनका यह भी कहना है कि राज्य के कुल 7 करोड़ 89 लाख 22 हजार 933 में से दो करोड़ 93 लाख से ज्यादा मतदाता रोजी-रोटी कमाने बिहार से बाहर रहते हैं। पुनरीक्षण के बहाने उनका मताधिकार समाप्त करने की कोशिश है। दूसरी बात यह कि फिलहाल बिहार के कई जिले बाढ़ की चपेट में हैं। ऐसे में लोग अपनी जान बचाने के लिए जद्दोजहद करेंगे या मतदाता पुनरीक्षण कराएंगे..? तीसरी बात, इस पुनरीक्षण में आधार कार्ड, मतदाता पहचान-पत्र, राशन कार्ड, बिजली का बिल आदि को नहीं मानकर मतदाताओं पर ही नागरिकता साबित करने का दबाव है। जमीन का कागज दिखाने की मांग की जा रही है, जबकि बिहार में भूमि रिकॉर्ड का बुरा हाल है। अधिकांश जमीन के कागज पुरखों के नाम है। नाम स्थानान्तरण के लिए पूर्व में कम्प्यूटराइजेशन की प्रक्रिया शुरू हुई थी, लेकिन लालफीताशाही के कारण उसे अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका। विपक्ष कहता है, यदि पुनरीक्षण ही कराना था तो यह काम जनवरी में शुरू कर देना चाहिए था। अब चुनाव के समय जब वोटर वोट देने और सियासी दल सीटों के बंटवारे में लगे हुए हैं, ऐसे में मतदाता सूचियों के गहन पुनरीक्षण का क्या मतलब है? उनका आरोप है कि चुनाव आयोग भाजपा के इशारे पर विपक्ष के वोट खुर्द-बुर्द करने पर आमादा है। इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दाखिल की गई है। हालांकि सुप्रीम अदालत ने संवैधानिक संस्था होने के कारण चुनाव आयोग के आदेश पर फौरी रोक तो नहीं लगाई है, लेकिन एसआईआर में आधार कार्ड और वोटर आईडी को शामिल करने का सुझाव दिया है। मामले की सुनवाई आगे भी चलती रहेगी।
पैंसठ लाख नाम हटाए जाने का दावा
इस बीच, चुनाव आयोग ने 25 जुलाई को मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के पहले चरण का काम पूरा कर लेने का दावा किया है। बताया जाता है की इसमें 65 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं। यानी प्रत्येक विधानसभा सीट से औसतन 26 हजार मतदाताओं के नाम हटे हैं। ज्ञात रहे कि 2020 के विधानसभा चुनाव में बिहार की कुल 243 सदस्यीय विधानसभा सीटों में से 189 सीटों पर 26 हजार से कम वोटों से हार-जीत हुई थी। इनमें 99 सीटें एनडीए के खाते में और 85 सीटें महागठबंधन के खाते में गई थीं। शेष 5 सीटों पर अन्य दलों को विजय मिली थी। अब मतदाता सूचियों में सुधार का अगला चरण एक अगस्त से एक सितंबर तक चलेगा।
विपक्ष का कहना है कि चुनाव आयोग पीछे के दरवाजे से महाराष्ट्र, हरियाणा और दिल्ली विधानसभाओं के चुनाव में वोटरों की संख्या बढ़ाकर भाजपा की मदद कर चुका है। अब बिहार में भाजपा की मदद कर रहा है। उधर, अपने फैसले पर अडिग चुनाव आयोग का कहना है कि सिर्फ बिहार नहीं, बल्कि आने वाले समय में जहां कहीं चुनाव होंगे, वहां मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण कराया जाएगा। इससे चिंतित पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अभी से मोर्चा खोल दिया है। मतदाता सूचियों के गहन पुनरीक्षण पर जहां विपक्षी नेता लामबंद हैं तो भाजपा नेता पुरजोर समर्थन कर रहे हैं।
बिहार विधानसभा के मानसून सत्र (इस विधानसभा के आख़िरी सत्र) में विपक्ष ने मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण, बिगड़ती क़ानून व्यवस्था और मंत्री जीवेश मिश्र के इस्तीफे की मांग को लेकर हंगामा किया। जीवेश को राजस्थान की एक अदालत ने नकली दवा की आपूर्ति में दोषी करार दिया है और वह फिलहाल जमानत पर हैं। विपक्ष के हंगामें के बीच सरकार ने अनुपूरक बजट समेत कई विधेयक पारित करा लिया। 5 दिनों के आख़िरी सत्र में महज 4 घंटा 44 मिनट विधानसभा और 2 घंटा 10 मिनट विधान परिषद् की कार्यवाही चल सकी।
चुनाव से पहले अपराधियों का तांडव
इस बीच, विधानसभा चुनाव से पहले अपराधियों का तांडव सिर चढ़कर बोल रहा है। अकेले पटना जिले की बात की जाए तो पिछले 4 माह में 116 से ज्यादा हत्या की वारदातें हो चुकी हैं। पिछले दिनों भाजपा समर्थित राज्य के प्रमुख व्यापारी गोपाल खेमका की घर के सामने गोली मारकर हत्या कर दी गई तो पटना के एक नामी अस्पताल के आईसीयू रूम में घुसकर एक बड़े हिस्ट्रीशीटर की हत्या कर दी गई। राज्य में हत्या के अलावा अपहरण की वारदातें भी खूब हो रही हैं। पुलिस– प्रशासन का इकबाल समाप्त होता दिख रहा है। अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (मुख्यालय) कुंदन कृष्ण इसके लिए मौसम और किसानों पर दोष मढ़ते हैं। मध्य जुलाई में वह कहते हैं कि अप्रैल से जून तक किसानों के पास खेती का कोई काम नहीं होने से वह अपराध में लिप्त हो जाते हैं। हालांकि विपक्ष के दबाव और सरकार की नसीहत पर तीन दिन बाद वह अपने बयान के लिए माफी भी मांग लेते हैं। लेकिन इतना तय है कि पिछले 20 वर्षों से लालू के ‘जंगलराज’ की दुहाई देकर सत्ता की मलाई खाने वाले एनडीए के नेताओं को इस बार अपने ‘जंगलराज’ पर सफाई देने में दिक्कत आएगी।
संघ लोकसेवा आयोग की परीक्षा में हर साल बिहारियों का दबदबा रहता है। मेडिकल और इंजीनियरिंग की पढ़ाई में भी बिहारी अव्वल रहते हैं। हालांकि पर्चा लीक में भी इनका कोई सानी नहीं है। प्रशांत किशोर के शिक्षा व्यवस्था में सुधार के वादे के बाद अब सत्ता पक्ष समेत सभी दल शिक्षा में सुधार पर जोर दे रहे हैं, लेकिन हालात इसके उलट हैं। पिछले दिनों पहली बार पटना विश्वविद्यालय के कालेजों में प्राचार्य की नियुक्ति लॉटरी के माध्यम से की गई, क्योंकि इसमें भाजपा- जदयू के बीच सहमति नहीं बन पाई थी। स्कूलों में शिक्षकों के हजारों रिक्त पदों को लेकर मुख्यमंत्री कहते हैं, अगली बार मौका मिला तो बहाली कर देंगे।
चौपट होती शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था
स्वास्थ्य सेवाओं में पिछड़े बिहार के अस्पतालों में मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। कोरोना महामारी से भी सबक नहीं सीखा। डॉक्टरों के 6000 हजार से अधिक पद खाली हैं। ये ही हाल नर्सिंग स्टाफ का है। दो बड़े अस्पतालों पटना मेडिकल कालेज अस्पताल और नालंदा मेडिकल कालेज अस्पताल की भी हालत खराब है। दूरदराज के अस्पतालों का तो कोई पुरसाहाल नहीं है। सड़कों की बेहतरी के कारण ‘सुशासन बाबू’ के नाम से सुशोभित नीतीश कुमार के राज में पुल-पुलिया गिरने का नया रिकॉर्ड बन रहा है। उधर, जहानाबाद में अफसरों और ठेकेदारों की मिलीभगत से हरे पेड़ों के बीच सड़क बना दी गई है। विपक्ष इस बार चुनाव में इसे निश्चित रूप से मुद्दा बनाएगा। राज्य की नौकरियों में डोमिसाइल नीति बनाने की मांग भी इस बार मुद्दा बनेगा। पिछले दिनों डोमिसाइल नीति लागू करने की मांग कर रहे छात्रों को पुलिस ने दौड़ा-दौड़ाकर पीटा। राजद ने अपने घोषणा-पत्र में डोमिसाइल नीति लागू करने की बात कही है।
उधर, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने चुनाव से ठीक पहले राज्य में 125 यूनिट मुफ्त बिजली, 60 से अधिक उम्र के पत्रकारों की पेंशन बढ़ाकर 15 हजार करने और विधवा व वृद्धावस्था पेंशन बढ़ाकर 1100 रुपए करने की घोषणा की है। तीनों फैसले तत्काल प्रभाव से लागू भी हो गए। विपक्ष इसको लेकर सरकार को घेर रहा है। उसका कहना है कि मुख्यमंत्री चुनाव में हार के डर से विपक्ष की चुनावी घोषणाओं को लागू कर रहे हैं। अगर उनकी नीयत सही है तो 20 वर्षों तक शासन करने के बाद मुख्यमंत्री को मुफ्त बिजली, बुजुर्ग पत्रकारों और सामाजिक सुरक्षा पेंशन की याद क्यों आई है?
प्रधानमंत्री के साल में पांच दौरे
बिहार में राजनीतिक दलों ने गतिविधियां बढ़ा दी है। प्रधानमंत्री इस साल जनवरी से अब तक पांच बार बिहार का दौरा कर चुके हैं। बीते 18 जुलाई को मोतिहारी की अपनी जनसभा में प्रधानमंत्री ने मोतिहारी को मुंबई, पटना को पुणे व गयाजी को गुरुग्राम सरीखा बनाने की घोषणा की। उन्होंने कहा कि आने वाले पांच वर्षों में नया बिहार बनाया जाएगा। उसी दिन दुर्गापुर (पश्चिम बंगाल) की सभा में प्रधानमंत्री ने नया बंगाल बनाने की बात कही। इससे पहले वह नया इंडिया बनाने की बात कहा करते थे। इस पर लालू यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर प्रधानमंत्री से पूछा, ‘बताइए ना, अगली बार जुमला सुनाने कब आइएगा।’
आठ अगस्त को गृहमंत्री अमित शाह बिहार के सीतामढ़ी जाने वाले हैं। वह पुनौराधाम में 882 करोड़ से बनने वाले जानकी मंदिर का शिलान्यास करेंगे। भाजपा की कोशिश अयोध्या के राम मंदिर की तरह जानकी मंदिर को चुनावी मुद्दा बनाने की है। बिहार में हर तीसरे दिन कोई न कोई केंद्रीय मंत्री डेरा डाले रहता है। जनसम्पर्क में भाजपा सबसे आगे दिखाई देती है। विपक्ष की कौन कहे, जदयू के नेता भी भाजपा की गतिविधियों से भौंचक्के हैं। एनडीए में ऊपरी तौर पर एकता है, लेकिन भीतरी तौर पर असंतोष है। पिछले दिनों एनडीए की बैठक में उप मुख्यमंत्री विजय सिन्हा ने जदयू के नेता और राज्य के ग्रामीण विकास मंत्री अशोक चौधरी को सार्वजनिक रूप से फटकार दिया था, तब भी बैठक में मौजूद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार चुप रहे। लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के सुप्रीमो चिराग पासवान क़ानून व्यवस्था को लेकर कहते हैं, ‘शर्म आती है की मुझे ऐसी सरकार का समर्थन करना पड़ रहा है जो अपराध रोकने में विफल है।’ बता देना जरूरी है कि राज्य में गृह विभाग नीतीश कुमार के पास है। हालांकि हिन्दुस्तान अवाम मोर्चा (हम) के नेता और केन्द्रीय मंत्री जीतनराम मांझी मुख्यमंत्री का बचाव करते रहते हैं। उधर, राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के अध्यक्ष उपेन्द्र कुशवाहा उम्र का हवाला देकर नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री अथवा जदयू अध्यक्ष में से एक पद छोड़ने की सलाह देते हैं। यह सब कुछ सीटों की हिस्सेदारी के लिए ताकत बढ़ाने की खातिर हो रहा है।
बिहार में चतुष्कोणीय मुकाबले की आहट
इधर, महागठबंधन में सीटों का पेंच सुलझने के संकेत मिले हैं। राजद के वोट बैंक में सेंधमारी के डर से असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन को महागठबंधन में शामिल करने से मना कर दिया गया है। ऐसे में इस बार बिहार में चतुष्कोणीय मुकाबले के आसार बन रहे हैं। इसमें एनडीए, महागठबंधन, प्रशांत किशोर की जनसुराज और बाकी बचे अन्य दल हैं। इस बीच चुनाव सर्वेक्षण करने वाली संस्था ‘सी वोटर’ के सर्वे में प्रशांत किशोर की लोकप्रियता में करीब 6 फीसदी का उछाल बताया गया है।






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