झालावाड़ और नागौर हादसे: जर्जर स्कूल भवनों से बच्चों की जान पर खतरा
झालावाड़ जिले में सरकारी स्कूल भवन गिरने से 7 बच्चों की मौत और 21 घायल हो गए, वहीं अगली सुबह नागौर में भी एक सरकारी स्कूल की छत गिर गई। सौभाग्य से वहां कोई बच्चा मौजूद नहीं था। ये घटनाएं राजस्थान में...

झालावाड़ में 7 बच्चों की मौत, नागौर में अगली सुबह स्कूल की छत गिरी, शिक्षा मंत्री के स्वागत ने बढ़ाया आक्रोश
अजय अस्थाना,
वरिष्ठ पत्रकार
Table Of Content
- झालावाड़ में 7 बच्चों की मौत, नागौर में अगली सुबह स्कूल की छत गिरी, शिक्षा मंत्री के स्वागत ने बढ़ाया आक्रोश
- नागौर में भी हादसा, सौभाग्य से बची जनहानि
- मुस्कुराते हुए आए थे, चिर निंद्रा में लौटे बच्चे
- दर्द के बीच संवेदनहीनता का प्रदर्शन
- राजस्थान में स्कूल भवनों के हालात
- चेतावनियों के प्रति गंभीरता नहीं
- बच्चों की शिक्षा और सुरक्षा पर असर
- नियमित जांच व मरम्मत जरूरी
- समाज की भूमिका भी जरूरी
- सबक और भविष्य की दिशा
झालावाड़ जिले में गत माह 25 जुलाई को हुआ दर्दनाक हादसा एक बार फिर शिक्षा व्यवस्था की नींव को झकझोर गया है। एक सरकारी स्कूल की जर्जर इमारत गिरने से सात मासूम बच्चों ने अपनी जान गंवा दी और 21 बच्चे घायल हो गए। यह घटना सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि इसे वर्षों से चली आ रही अनदेखी, लापरवाही और ढिलाई का परिणाम मान सकते हैं। इस घटना ने राजस्थान में शिक्षा के बुनियादी ढांचे पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हर पांच साल में नई सरकार आती है, बड़े-बड़े वादे करती है, लेकिन हालात में कोई बदलाव नहीं आता। यहां तक कि संबंधित अधिकारी कागजी खानापूर्ति कर इतिश्री कर लेते हैं। नतीजतन मासूमों पर हर वक्त जान का खतरा मंडराता रहता है।
नागौर में भी हादसा, सौभाग्य से बची जनहानि
झालावाड़ हादसे की गूंज अभी थमी भी नहीं थी कि अगले ही दिन नागौर जिले के खारियावास गांव में एक सरकारी स्कूल की छत का हिस्सा गिर गया। उस समय स्कूल में बच्चे मौजूद नहीं थे, इसलिए कोई बड़ी जनहानि नहीं हुई। लेकिन इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया कि राज्य के जर्जर स्कूल भवन हर दिन बच्चों की जान के लिए खतरा बने हुए हैं। झालावाड़ में जहां सात बच्चों की लाशें घर लौटीं, वहीं नागौर में यह महज किस्मत थी कि हादसा बच्चों की जान नहीं ले पाया।
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मुस्कुराते हुए आए थे, चिर निंद्रा में लौटे बच्चे
झालावाड़ के ग्रामीण इलाके में स्थित यह प्राथमिक विद्यालय कई वर्षों से खराब हालत में था। दीवारों पर दरारें साफ दिख रही थीं और छत टपकती थी। शिक्षकों ने कई बार संबंधित विभाग को इसकी मरम्मत या नई इमारत निर्माण की मांग की थी, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। घटना वाले दिन अचानक तेज बारिश के बीच इमारत का एक हिस्सा भरभराकर गिर पड़ा, जिससे सात बच्चों की मौके पर ही मौत हो गई और 21 घायल हो गए। पीड़ित परिवारों में मातम पसरा है। जिन बच्चों ने सुबह मुस्कुराते हुए स्कूल की ओर कदम बढ़ाए थे, शाम को वे चिर निंद्रा में घर लौटे। यह हादसा हर अभिभावक के मन में यह सवाल छोड़ गया है कि क्या उनके बच्चे स्कूल में सुरक्षित हैं?
दर्द के बीच संवेदनहीनता का प्रदर्शन
झालावाड़ हादसे के बाद जब पूरे प्रदेश में शोक और गुस्से का माहौल था, उसी समय शिक्षामंत्री मदन दिलावर का भारी-भरकम मालाओं से स्वागत किया जा रहा था। हादसे के अगले दिन आयोजित इस भव्य स्वागत पर विपक्ष ने भी कड़ी प्रतिक्रिया दी। पीड़ित परिवारों का दर्द और प्रशासन की संवेदनहीनता का यह विरोधाभास समाज के सामने बड़ा सवाल खड़ा करता है कि क्या सत्ता प्रतिष्ठान बच्चों की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर गंभीर है?
राजस्थान में स्कूल भवनों के हालात
झालावाड़ और नागौर की ये घटनाएं अपवाद नहीं हैं। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि राजस्थान में 7500 से अधिक स्कूल भवनों को जर्जर घोषित कर मरम्मत या गिराने के आदेश दिए जा चुके हैं। राज्य सरकार ने इसके लिए लगभग 150 करोड़ रुपए का बजट भी तय किया है, लेकिन ज्यादातर जगह यह कार्यवाही अब तक पूरी नहीं हो पाई है। कई स्कूल भवन ऐसे हैं, जिनकी उम्र 50 से 60 साल से अधिक हो चुकी है, और न तो उनकी समय पर मरम्मत होती है और न ही पुनर्निर्माण।
ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में यह स्थिति ज्यादा गंभीर है। यहां के स्कूल अक्सर एक या दो कमरों में चल रहे हैं। बरसात के दिनों में हालात बदतर हो जाते हैं, क्योंकि छतें टपकती हैं, दीवारें कमजोर हैं और बिजली की व्यवस्था न होने से बच्चों को अंधेरे में पढ़ना पड़ता है।
चेतावनियों के प्रति गंभीरता नहीं
शिक्षा विभाग और सार्वजनिक निर्माण विभाग पर इसकी बड़ी जिम्मेदारी है। जब किसी भवन के जर्जर होने की रिपोर्ट आती है तो इसे मरम्मत या गिराने के लिए सूचीबद्ध कर दिया जाता है, लेकिन अक्सर फण्ड की कमी या प्रक्रियात्मक देरी के कारण सालों तक काम नहीं हो पाता। शिक्षकों और ग्राम पंचायतों की चेतावनी को भी गंभीरता से नहीं लिया जाता। कई जगहों पर भवन को खतरनाक घोषित करने के बावजूद बच्चे उन्हीं में पढ़ने को मजबूर होते हैं, क्योंकि कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं होती। इस लापरवाही का खामियाजा झालावाड़ और नागौर जैसे हादसों के रूप में सामने आ रहा है।
बच्चों की शिक्षा और सुरक्षा पर असर
जर्जर स्कूल भवन न केवल बच्चों की जान के लिए खतरा हैं, बल्कि उनकी शिक्षा पर भी गहरा असर डालते हैं। जब बच्चे असुरक्षित महसूस करते हैं तो उनका ध्यान पढ़ाई में नहीं लग पाता। कई बार अभिभावक भी डर के कारण बच्चों को स्कूल भेजना बंद कर देते हैं। इसके अलावा जब किसी स्कूल भवन को अस्थायी रूप से बंद किया जाता है तो बच्चों को दूसरे गांवों के स्कूलों में भेजना पड़ता है। लम्बी दूरी और परिवहन की समस्या के कारण कई बच्चे पढ़ाई छोड़ देते हैं। यह स्थिति विशेषकर बालिकाओं के लिए गंभीर हो जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में कई बालिकाएं दूरी के कारण स्कूल छोड़ने को मजबूर हो जाती है।
नियमित जांच व मरम्मत जरूरी
- प्रदेश के सभी स्कूली भवनों का हर साल तकनीकी निरीक्षण जरूरी है। कमजोर या खतरनाक घोषित भवनों की सूची सार्वजनिक की जाए, ताकि अभिभावक भी सतर्क रहें
- जर्जर भवनों की मरम्मत या पुनर्निर्माण के लिए शिक्षा विभाग को विशेष फण्ड उपलब्ध कराना जरूरी
- जब तक भवन तैयार न हो जाए, तब तक बच्चों के लिए सुरक्षित वैकल्पिक जगह पर पढ़ाई की व्यवस्था हो
- इस तरह के हादसों में जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई जरूरी है। सिर्फ निलंबन या नोटिस से बात नहीं बनेगी, बल्कि लापरवाही को दंडनीय अपराध की श्रेणी में लाना होगा
समाज की भूमिका भी जरूरी
अब सवाल ये उठता है कि क्या यह केवल सरकार की जिम्मेदारी है? बिल्कुल नहीं, समाज, अभिभावक और पंचायत स्तर पर भी जागरूकता बढ़नी चाहिए। यदि किसी स्कूल भवन की हालत खराब है तो समय रहते इसकी सूचना प्रशासन तक पहुंचाई जाए और कार्रवाई के लिए दबाव बनाया जाए। कई जगह पंचायत फण्ड या कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी के तहत भी भवनों का नवीनीकरण किया जा सकता है।
सबक और भविष्य की दिशा
झालावाड़ और नागौर के हादसे सरकार व प्रशासन के लिए एक सबक हैं। ये हादसे हमें याद दिलाते हैं कि विकास केवल बड़ी-बड़ी योजनाओं या शहरों की चमक-दमक से नहीं होता। असली विकास तब है जब गांव का बच्चा भी सुरक्षित वातावरण में पढ़ सके। राजस्थान सरकार को इन हादसों को चेतावनी की तरह लेना होगा। जिन 7500 स्कूल भवनों को मरम्मत या गिराने के आदेश हो चुके हैं, उन पर तत्काल कार्रवाई भी जरूरी है। साथ ही बाकी भवनों के लिए एक समयबद्ध पुनर्निर्माण योजना बनानी होगी। यह काम केवल कागजों पर नहीं, जमीनी स्तर पर दिखना चाहिए। शिक्षा का अधिकार तभी सार्थक है जब स्कूल बच्चों के लिए सुरक्षित हों। सरकार व प्रशासन को यह याद रखना चाहिए कि हर बच्चा देश का भविष्य है और उनकी सुरक्षा पर समझौता किसी भी कीमत पर नहीं होना चाहिए।
उदयपुर जिले में गिरी स्कूल की छत
झालावाड़ में हुए स्कूल हादसे के बाद हर रोज किसी न किसी स्कूल की छत, दीवार, प्लास्टर या बरामदा गिरने की खबरें आ रही हैं। उदयपुर जिला मुख्यालय से सटे वल्लभनगर क्षेत्र के रूपावली गांव के राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय की छत भरभरा कर गिर गई। गनीमत रही कि रविवार को छुट्टी होने से स्कूल बंद था। वरना वहां पढ़ने वाले करीब 90 बच्चों की जान पर बन आती। प्रधानाध्यापक के अनुसार भवन की जर्जर स्थिति के बारे में शिक्षा विभाग को पहले ही अवगत कराया जा चुका था और मरम्मत के लिए बजट भी स्वीकृत हो गया है, लेकिन अभी तक काम शुरू नहीं हुआ।
7500 स्कूलों की होगी मरम्मत
शिक्षा विभाग अब प्रदेश के 7500 सरकारी स्कूलों की मरम्मत कराएगा। इसके लिए 150 करोड़ का प्रस्ताव स्वीकृत किया गया है। इसके अलावा जर्जर स्कूल भवनों को तोड़कर बच्चों को वैकल्पिक तौर पर कंटेनर क्लासरूम में पढ़ाया जाएगा। साथ ही उन्होंने निजी स्कूल भवनों के सर्वे कराने की बात कही।
‘घर का काम नहीं, जो जेब से रुपए दें’
झालावाड़ जिले में सरकारी स्कूल की छत गिरने से 7 मासूमों बच्चों की मौत के बाद लगातार जर्जर स्कूल भवनों की मरम्मत की मांग उठ रही है। इसी बीच शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने सरकारी स्कूलों की मरम्मत के सवाल पर कहा कि ये कोई घर का काम तो है नहीं कि जेब से पैसे निकाल कर दें। भरतपुर दौरे के दौरान दिलावर ने स्कूलों को मिलने वाले बजट के सवाल पर कहा, ‘ये सरकारी प्रोसेस होता है, टेंडर होता है। मैंने नैतिकता के आधार पर घटना की जिम्मेदारी ली है। हमारे पास जर्जर स्कूलों की सूची आई, उसमें झालावाड़ के स्कूल का नाम नहीं था। पिछली बार मरम्मत के लिए 80 करोड़ रुपए दिए और इस बार भी 80 करोड़ रुपए दिए थे।’
छुट्टी होने से टला हादसा
आनंदपुरी (बांसवाड़ा) के सल्लोपाट थाना क्षेत्र के राजकीय प्राथमिक विद्यालय कलाजी मंदिर, मोनाडूंगर में स्कूल भवन के आगे का बरामदा भरभराकर गिर गया। गनीमत रही कि अवकाश था, अन्यथा हादसा गंभीर हो सकता था। जिले में कई सरकारी स्कूलों की इमारतें वर्षों पुरानी हो चुकी हैं और लगातार उपेक्षा के कारण अब जानलेवा बनती जा रही हैं।
स्कूल के पुराने स्टोर रूम की छत गिरी
पिड़ावा (झालावाड़) में राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय दांता के एक पुराने स्टोर रूम की छत की पट्टियां तेज बारिश के कारण टूट गईं। रविवार का अवकाश होने के कारण वहां कोई मौजूद नहीं था, जिससे बड़ा हादसा टल गया। यह कमरा 13 वर्ष पहले ही जर्जर घोषित कर दिया गया था, तब से इसका उपयोग स्टोर रूम के रूप में किया जा रहा था, जिसमें स्कूल का कबाड़ रखा हुआ था। लम्बे समय से इस कमरे का ताला भी नहीं खोला गया।






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