स्मार्ट मीटर और ‘स्मार्ट’ राजनीति
राजस्थान में अब बिजली सिर्फ मीटर से नहीं, राजनीति से भी तपी हुई है। एक तरफ मीटर है जो हर यूनिट का हिसाब मांगता है। दूसरी तरफ नेता’जी हैं जो हर आरोप का जवाब सवाल से देते...

बात बेलगाम
– बलवंत राज मेहता,
वरिष्ठ व्यंग्यकार
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राजस्थान में अब बिजली सिर्फ मीटर से नहीं, राजनीति से भी तपी हुई है। एक तरफ मीटर है जो हर यूनिट का हिसाब मांगता है। दूसरी तरफ नेता’जी हैं जो हर आरोप का जवाब सवाल से देते हैं। कांग्रेस कहती है ये स्मार्ट मीटर गरीबों की जेब पर बोझ हैं, और भाजपा कहती है “भैया, ये तो तुम्हारी ही रसोई से पका पकाया आइडिया है!” अब जनता सोच रही है कि मीटर स्मार्ट है या सियासत? और एक नेता’जी के सरकारी बंगले का बिल देखकर तो ऐसा लग रहा है मानो बिजली नहीं, राजनीति करंट दे रही हो। मंत्री’जी कह रहे हैं “मैं तो अभी डेढ़ महीने पहले ही आया हूं”, जैसे बंगले के मीटर ने उनका स्वागत नहीं किया, बल्कि बिल का बवाल दे दिया। कुल मिलाकर मीटर हो या मंत्री सभी चालू हैं। और जनता… वह अब समझ नहीं पा रही कि मीटर बदले या मतदाता!
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इतिहास की छंटनी और पाठ्यपुस्तकों की सफाई
राजस्थान में शिक्षा अब ज्ञान का नहीं, विचारधारा का विषय बन चुकी है। मंत्री’जी को लगता है कि गांधी-नेहरू की बातें बच्चों के दिमाग में “बेकार का बोझ” हैं। अरे भैया! परीक्षा में नंबर नहीं आते तो क्या, बच्चों के मन में विचार तो आते थे। पर अब पाठ्यपुस्तकें भी पार्टी लाइन पर चलाई जाएंगी, जिनमें नेता वही होंगे, जो सत्ता पक्ष को सुहाते हों। मंत्री’जी का तर्क है: “अगर हड्डी में ज़हर हो, तो उसे खाना नहीं चाहिए।” यानी इतिहास वो पढ़ाया जाए जो मंत्री’जी के स्वाद के अनुकूल हो। बाकी गांधी-नेहरू तो अब पुराने चावल हो गए। नए इतिहास में फोटो सिर्फ स्वच्छ भारत और नोटबंदी के होंगे। बच्चे चाहे ये समझें ना समझें कि नोटबंदी में लाईन में खड़े होना क्रांति थी या सजा! कुल मिलाकर, अब पाठ्यपुस्तकें नहीं, पाठ्य-पट्टी बंधेगी, ताकि बच्चे वही याद करें, जो सत्ता चाहे। इतिहास अब सवालों से नहीं, सत्ता की सहूलियत से लिखा जाएगा।
छुट्टियों वाला शासक और आदेशों की आंधी
एमबीएम इंजीनियरिंग कॉलेज, जोधपुर में इन दिनों इंजीनियरिंग से ज़्यादा “इंटरनल पॉलिटिक्स” का कोर्स चल रहा है। कुलपति’जी छुट्टियों का सुख लेने सिंगापुर रवाना हो गए और पीछे छोड़ गए 12 आदेश, जैसे छुट्टी पर नहीं, कोई “विकास योजना” पर निकले हों। इन आदेशों में नियुक्तियों से लेकर स्टोर विभाग तक हर चीज़ को ‘ठीक’ करने का फरमान है। और इस ‘सुधार’ रूपी तूफान के बीच अकेले जूझ रहे हैं एक उच्च अधिकारी, जिनके पास हर घंटे नई जांच कमेटी गठित करने का काम है। अब एमबीएम कॉलेज पढ़ाई के लिए नहीं, फाइलें उलटने और साइन ढूंढने की प्रयोगशाला बन गया है। छात्र हैरान हैं, शिक्षक परेशान हैं और कर्मचारी सोच में हैं कि अगला आदेश किसके गले पड़ेगा। शिक्षा व्यवस्था छुट्टियों में है, और आदेश व्यवस्था ‘हॉलीडे मोड’ में क्रांतिकारी बन गई है।
सरिस्का में बाघ कम, बयान ज़्यादा
सरिस्का के जंगल में असली बाघ हैं या नहीं, ये तो कैमरे गिनते हैं। पर सियासत के जंगल में बाघों से भी बड़े शिकारी घूम रहे हैं बयानवीर नेता! पूर्व मुख्यमंत्री’जी को अचानक याद आया कि बाघ तो उन्होंने बचाए थे! जैसे जंगल में नहीं, घर की बालकनी में पाला हो। बोले– “हमने तो सरिस्का को जीवित किया!” अब कौन बताए कि बाघ बचाने के साथ-साथ कितने वनवासी उजड़े, और कितनी फाइलों ने जंगल की रफ्तार दबा दी? नई सरकार ने प्लान क्या बनाया, विपक्ष ने उसी में राजनीति का शिकार ढूंढ लिया। बाघों के नाम पर वोटों की बिसात बिछ गई। कभी सरिस्का को पर्यटन हब बनाने की बात, कभी सुरक्षा बढ़ाने की। और बाघ बेचारा सोचता रह गया “कभी शिकारी से डरते थे, अब नेता से डरते हैं।”
सेल्फी से सेवानिवृत्ति
जोधपुर के सरकारी कर्मचारियों की आजकल सबसे बड़ी चिंता ये नहीं कि फाइल समय पर पूरी हो रही है या नहीं, बल्कि ये है कि कहीं विधायक के कैमरे की नजर न पड़ जाए। विधायक’जी जब मुस्कराते हुए कहें “आओ सेल्फी लें,” तो सामने वाले की मुस्कान गायब हो जाती है। अब ये सेल्फी साधारण फोटो नहीं रही, ये तो तबादले का ट्रिगर बन चुकी है। हाल ही में नगर निगम के तीन कर्मचारियों ने मुस्कराकर फोटो क्या खिंचवाई, कुछ ही घंटों में एपीओ के आदेश आ गए। अब शहर में विधायक के कैमरे की आहट भी किसी इमरजेंसी अलार्म जैसी लगती है। कर्मचारी एक-दूसरे को सतर्क करते हैं “मोबाइल निकला है, सर आ रहे हैं, पीछे हो लो!” घंटाघर से त्रिपोलिया तक जहां-जहां गंदगी और अतिक्रमण फैला था, वहां अब डर की सफाई चल रही है। जोधपुर में फिलहाल विकास का नया मंत्र चल रहा है “सेल्फी लो और सुधर जाओ!”
राजनीति में गाना और संविधान का बहाना
सीकर के धोद की रैली में कांग्रेस ने ‘संविधान बचाओ’ का झंडा उठाया, और नेता प्रतिपक्ष ने गाना गाया- “तेरे जैसा यार कहां…” अब समझ नहीं आया, ये रैली संविधान के लिए थी या दोस्ती की महफिल? विपक्ष के नेता बोले, बीजेपी ने डेढ़ साल में कुछ नहीं किया। मानो खुद ने पांच साल में संसद की छत पर संविधान की गारंटी लिख दी थी! नेता प्रतिपक्ष तो और भी आगे निकले, बोले “बिजली-पानी काट देते हैं विरोधियों की!” भाईसाहब, जनता की तो पहले ही उम्मीदें कटी पड़ी हैं, अब कनेक्शन की दुहाई क्यों? कई दूसरे नेता’जी भी मंच पर थे, पर असली नज़ारा था राजनीति का तमाशा और संविधान का नाम। गाना चल रहा था, जनता सोच रही थी “संविधान बचे न बचे, नेता तो अच्छे से नाचे!”






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