माटी, संगीत व संवाद में सुनाई देती है ‘राजस्थानी’ की गूंज
क्या 'राजस्थानी' सचमुच कोई पुरातन भाषा-नाम है, या यह उपनिवेशकालीन प्रयोगशाला की उपज? यह आलेख एक रोचक भाषिक यात्रा है, जो ‘राजस्थानी’ शब्द के जन्म, इसके ऐतिहासिक सन्दर्भ और सांस्कृतिक विकास की परतें...

राजस्थानी: जिसे गियर्सन ने ‘भाषा’ कहा, पर हम चुप क्यों हैं?
बलवंत राज मेहता,
वरिष्ठ पत्रकार
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कभी आपने सोचा है कि हम जिस भाषा को आत्मगौरव से “राजस्थानी” कहते हैं, वह शब्द अस्तित्व में कब आया..? क्या हमारे दादाजी या उनके पूर्वजों ने इसे इसी नाम से जाना..? क्या किसी राजा की ताम्रपत्री आज्ञा “राजस्थानी भाषा” में लिखी गई थी..? या किसी लोकदेवता की ही वाणी इस नाम से पहचानी जाती थी..?
इन सवालों के उत्तर चौंकाते हैं। “राजस्थानी” शब्द, जैसा हम आज जानते हैं, प्रथम बार 1912 में एक अंग्रेज़ भाषाविद् जॉर्ज अब्राहम गियर्सन द्वारा प्रयोग में लाया गया। इससे पहले राजस्थान की सांस्कृतिक स्मृतियों, शिलालेखों, अभिलेखों, काव्य रचनाओं, मंदिरों की भाषा या दरबारों के आदेश, कहीं भी इस शब्द का उल्लेख नहीं मिलता। और यही बात इस शब्द को रहस्यमय, राजनीतिक और भाषाई विमर्श का केंद्र बना देती है।
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गियर्सन ब्रिटिश राज के अधीन एक भाषाशास्त्री थे, जिन्हें भारत की भाषाओं के सर्वेक्षण का उत्तरदायित्व सौंपा गया था। यह कार्य उन्होंने अपने विशाल ग्रंथ “लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया” के अंतर्गत किया, जो 1894 से 1928 तक विभिन्न खण्डों में प्रकाशित हुआ। उन्होंने 1912 में इस सर्वेक्षण के एक खण्ड में पहली बार “राजस्थानी” शब्द का प्रयोग किया और इसे राजस्थान क्षेत्र में बोली जाने वाली अनेक बोलियों के लिए एक सामूहिक नाम के रूप में प्रस्तुत किया।
पांच उपशाखाओं में बांटा
गियर्सन ने राजस्थानी भाषा को पांच उपशाखाओं में बांटा। पश्चिमी राजस्थानी जिसमें मारवाड़ी, मेवाड़ी, शेखावाटी और बागड़ी आती हैं; उत्तर-पूर्वी में मेवाती और अहीरवाटी; मध्य-पूर्वी में ढूंढाड़ी और हाड़ौती; दक्षिणी-पूर्वी में मालवी और निमाड़ी; तथा दक्षिणी राजस्थानी में डांग क्षेत्र की बोलियां। यह वर्गीकरण दर्शाता है कि उन्होंने भाषा को केवल राजनीतिक सीमाओं से नहीं, बल्कि उसके ध्वन्यात्मक, व्याकरणिक और सामाजिक आधार पर समझा। लेकिन गियर्सन द्वारा दिए गए इस नाम से पहले राजस्थानी भाषा के अस्तित्व को किसी ने इस रूप में नहीं देखा था। शिलालेखों में भाषा संस्कृत, प्राकृत या क्षेत्रीय लोकभाषा में होती थी। दरबारों में जो भाषा प्रचलित थी, वह मारवाड़ी या ब्रज मिश्रित शैली में होती थी। लोककथाओं, लोकगीतों और देववाणियों में तेजाजी, पाबूजी, गोगाजी की कथाएं क्षेत्रीय बोलियों में होती थीं, राजस्थानी नाम से नहीं। जैन ग्रंथों में भी भाषा को ‘मरुभाषा’ या क्षेत्र के नाम से जाना गया है।
प्राचीनतम साक्ष्य आठवीं शताब्दी में जैन आचार्य उद्योतन सूरी की “कुवलयमाला” में मिलता है, जहां भाषा को “मरुभाषा” कहा गया है। राजस्थानी का पहला ग्रंथ जैन आचार्य वज्रसेन सूरी द्वारा रचित “भरतेश्वर बाहुबलि घोर” माना जाता है। राजस्थानी साहित्य का स्वर्ण युग 1450 से 1850 के बीच माना गया है, जिसमें भक्ति आंदोलन, नाथपंथ, संत काव्य, जैन उपदेश और वीर रस की रचनाएं शामिल हैं। अबुल फज़ल की “आईन-ए-अकबरी” में भी मारवाड़ी को भारत की प्रमुख भाषाओं में स्थान मिला है। सत्रहवीं और अठारहवीं सदी की अनेक रचनाओं में भी “मरुभाषा” शब्द का प्रयोग होता है, “राजस्थानी” नहीं।
साहित्यिक चेतना का प्रतीक ‘राजस्थानी’
यानी ‘राजस्थानी’ नाम कोई पुरातन लोक-उद्गार नहीं था, बल्कि एक औपनिवेशिक दृष्टि से किया गया भाषा वैज्ञानिक वर्गीकरण था। परंतु यह नाम धीरे-धीरे एक चेतना, एक सांस्कृतिक पहचान और एक जनवाणी बन गया। राजस्थानी अब केवल भाषाशास्त्र का विषय नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्वाभिमान, साहित्यिक चेतना और लोक की अभिव्यक्ति का प्रतीक बन चुकी है।
आज भी लोग स्वयं को मारवाड़ी, मेवाड़ी, हाड़ौती या शेखावाटी भाषी कहते हैं, लेकिन “राजस्थानी” उस छतरी शब्द के रूप में स्थापित हो चुका है जो इन सभी विविधताओं को एक पहचान देता है। यह विविधता इस नाम के लिए चुनौती भी है और उसकी सबसे बड़ी शक्ति भी।
भले ही यह शब्द औपनिवेशिक प्रयोगशाला में जन्मा हो, लेकिन अब इसकी गूंज माटी, संगीत और संवाद में सुनाई देती है। भाषा का नाम चाहे जैसा हो, अगर लोग उसमें अपने मन की बात कहें, तो वह नाम भी असली हो जाता है। राजस्थानी अब केवल एक नाम नहीं, वह जन की वाणी बन चुकी है , गियर्सन की लेखनी से निकलकर माटी के मन तक।






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