रेत की रेखाओं से खींची नई लकीरें
कभी चौखट तक सीमित मानी जाने वाली महिलाएं आज पंचायत से लेकर प्रबंधन तक में अपनी दमदार मौजूदगी दर्ज करवा रही हैं। ये महिलाएं न सिर्फ आत्मनिर्भरता की मिसाल बन रही हैं, बल्कि गांव की आर्थिक, सामाजिक और...

स्वरोजगार, महिला स्व-सहायता समूह और पंचायत राजनीति में महिलाओं की बढ़ती भूमिका
डॉ. मधु बनर्जी,
पत्रकार एवं लेखिका
राजस्थान की मिट्टी में सिर्फ रेत के टीले नहीं, संघर्ष और सशक्तिकरण की कहानियां भी गहराई से दबी हैं। एक समय था जब ग्रामीण महिलाएं परम्पराओं की बेड़ियों में जकड़ी हुई थीं, लेकिन आज वे इन्हीं परम्पराओं को चुनौती देती हुई नए सामाजिक प्रतिमान रच रही हैं। सिलाई, बुनाई, कृषि, दुग्ध उत्पादन, पंचायती नेतृत्व से लेकर डिजिटल साक्षरता तक, इन महिलाओं ने अपने सामर्थ्य से सिद्ध कर दिया है कि बदलाव केवल शहरों से नहीं आता, गांव की गली से भी क्रांति जन्म ले सकती है। रेतीली धरती पर जब कोई महिला आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ाती है, तो वह अपने साथ- साथ पूरे गांव और समाज की दिशा का रुख भी बदल देती है। यह बदलाव केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक, राजनीतिक और मानसिक चेतना का परिचायक है।
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वह समय अब काफी पीछे छूटता जा रहा है, जब ग्रामीण महिला का कार्यक्षेत्र केवल घर-आंगन तक सीमित था। लेकिन अब वह खेती से लेकर हस्तशिल्प, शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्राम शासन तक में निर्णायक भूमिका निभा रही है। राजस्थान के गांवों में यह बदलाव न केवल महिला सशक्तिकरण की मिसाल है, बल्कि एक नया सामाजिक विमर्श भी गढ़ रहा है, जिसमें नारी अब ‘दया की पात्र’ नहीं, बल्कि ‘निर्णय की धुरी’ बन रही है।
स्वरोजगार की नई राहें
राजस्थान के कई जिलों में महिलाएं पारम्परिक शिल्प और घरेलू उत्पादों को व्यावसायिक रूप देकर स्वरोजगार की मिसाल पेश कर रही हैं। जयपुर, जोधपुर, बाड़मेर, बांसवाड़ा और उदयपुर जैसे इलाकों में महिलाएं आज मनरेगा से लेकर डेयरी फार्मिंग, जैविक खेती, बुटीक, मसाला उद्योग, पापड़-अचार निर्माण और यहां तक कि ऑनलाइन सेलिंग में भी भागीदारी निभा रही हैं। बाड़मेर की महिला बुनकरों द्वारा बनाए गए ऊनी शॉल और कालीन देश-विदेश में सराहे जा रहे हैं। वहीं उदयपुर की आदिवासी महिलाएं अपने परम्परागत जंगल उत्पादों को स्थानीय बाजारों तक पहुंचाकर आर्थिक रूप से सशक्त हो रही हैं।
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स्वयं सहायता समूह
महिला स्वयं सहायता समूह ने राजस्थान में ग्रामीण महिलाओं के जीवन को नई दिशा दी है। ये समूह महिलाओं को आपसी सहयोग से बचत करने, ऋण लेने, उत्पादन कार्य शुरू करने और अपने व्यवसाय को आगे बढ़ाने का प्रशिक्षण देते हैं। राजीविका योजना के तहत गठित हजारों एसएचजी आज लाखों महिलाओं के जीवन में बदलाव ला चुके हैं। अकेले जोधपुर जिले में हजारों महिलाएं विभिन्न स्वयं सहायता समूहों से जुड़कर परचून, सिलाई, फूड प्रोसेसिंग और हस्तकला जैसे कामों से सालाना लाखों की आमदनी अर्जित कर रही हैं।
पंचायत राजनीति में सशक्त भागीदारी
73वें संविधान संशोधन के तहत पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं को मिले आरक्षण ने राजस्थान में सत्ता के समीकरण बदल दिए हैं। अब महिलाएं केवल नाम भर की सरपंच नहीं रहीं, बल्कि नीतिगत निर्णयों में सक्रिय भागीदारी निभा रही हैं। “सरपंच पति” की छवि को तोड़ते हुए अब महिलाएं खुद फील्ड में जाकर स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र, पेयजल योजनाओं, सड़कों और विकास कार्यों की निगरानी कर रही हैं। जैसलमेर की सरपंच जेस्सी देवी, टोंक की अनिता मीणा, और चूरू की रुबीना खातून जैसी महिलाओं ने अपने नेतृत्व से यह साबित कर दिया है कि राजनीतिक मंच अब केवल पुरुषों का एकाधिकार नहीं रहा।
तकनीक से मिली नई दृष्टि
आज ग्रामीण महिलाएं न केवल साक्षर हो रही हैं, बल्कि डिजिटल दुनिया से जुड़कर शासन और बाजार से सीधा संवाद स्थापित कर रही हैं। ई-मित्र, मोबाइल बैंकिंग, डिजिटल ट्रेनिंग, यूपीआई पेमेंट और सोशल मीडिया के ज़रिए वे अपने उत्पाद बेच रही हैं और सरकारी योजनाओं की जानकारी भी ले रही हैं।
‘दिग्गज दादी’ जैसे उदाहरण, जो अपने फोन से ऑर्डर बुक करती हैं या ऑनलाइन बुटीक चलाती हैं, यह साबित करते हैं कि तकनीक ने गांव की महिला को नई दृष्टि दी है।
चुनौतियां अभी बाकी हैं…
हालांकि ग्रामीण महिलाओं की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ है, पर अब भी कई चुनौतियां कायम हैं, जैसे पारिवारिक विरोध, संसाधनों की कमी, वित्तीय सहायता की जटिलता, लैंगिक असमानता और सामाजिक रूढ़ियां। इसके अलावा, कई बार महिलाएं प्रतिनिधि तो बन जाती हैं, लेकिन पुरुष निर्णयों में हस्तक्षेप करते हैं।
गांव की शक्ति ही देश की असल शक्ति
राजस्थान सरकार की कई योजनाएं जैसे राजीविका योजना, मुख्यमंत्री लघु उद्योग प्रोत्साहन योजना, भामाशाह योजना, सखी योजना, और महिला स्वरोजगार योजना ने महिलाओं को आर्थिक, तकनीकी और सामाजिक रूप से मजबूत बनाने का प्रयास किया है। इन योजनाओं का सही क्रियान्वयन और निगरानी ही बदलाव की स्थायित्व की गारंटी बन सकता है। राजस्थान की ग्रामीण महिलाएं अब सिर्फ घरेलू जिम्मेदारियों तक सीमित नहीं हैं। वे सुई से लेकर संविधान तक, हर स्तर पर बदलाव की वाहक बन चुकी हैं। उनकी मेहनत, एकजुटता और आत्मबल ने यह दिखा दिया है कि गांव की शक्ति ही असल में देश की शक्ति है। अब समय आ गया है कि हम सिर्फ “नारी सशक्तिकरण” की बात न करें, बल्कि “नारी नेतृत्व” को पहचानें, स्वीकारें और सम्मान दें। राजस्थान का भविष्य उन गांवों से निकलेगा, जहां महिलाएं केवल चूल्हा नहीं जलातीं, बल्कि समाज को दिशा देने वाली मशाल भी बन चुकी हैं।
स्वयं सहायता समूह में महिलाएं
– राजस्थान में लगभग 3.2 लाख स्वयं सहायता समूह सक्रिय हैं (राजीविका योजना के अंतर्गत), जिनसे 40 लाख से अधिक महिलाएं जुड़ी हुई हैं।
– अकेले जोधपुर ज़िले में 25,000 से अधिक एसएचजी कार्यरत हैं, जो कृषि, डेयरी, फूड प्रोसेसिंग, सिलाई, वाणिज्य आदि में सक्रिय हैं।
मनरेगा में महिला भागीदारी:
– राजस्थान में मनरेगा के तहत कुल कार्यदिवसों का लगभग 55 प्रतिशत कार्य महिलाओं द्वारा किया गया, जो राष्ट्रीय औसत (50 प्रतिशत) से अधिक है।
राजस्थान में पंचायती राज में महिला प्रतिनिधित्व:
-73वें संविधान संशोधन के तहत पंचायती राज में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण लागू होने के बाद
-33,000 से अधिक ग्राम पंचायतों में महिलाएं निर्वाचित प्रतिनिधि हैं।
-राज्य में 60 प्रतिशत से अधिक सरपंच पदों पर अब महिलाएं काबिज हैं, जिनमें अनुसूचित जाति, जनजाति और मुस्लिम वर्ग की महिलाएं भी बड़ी संख्या में हैं।
महिला उद्यमिता और कौशल विकास:
– मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना और भामाशाह योजना के तहत 2019-2024 के बीच 1.5 लाख से अधिक महिलाओं को व्यवसाय शुरू करने के लिए ऋण और प्रशिक्षण प्रदान किया गया।
– “सखी” योजना के तहत राजस्थान के 33 जिलों में डिजिटल साक्षरता शिविरों के माध्यम से 1.2 लाख महिलाओं को डिजिटल ट्रेनिंग दी गई।
महिला तकनीकी भागीदारी:
-ई-मित्र पोर्टल से जुड़ने वाली महिलाओं की संख्या में पिछले 5 वर्षों में 220 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।
-60 प्रतिशत महिला वेंडर्स अब मोबाइल बैंकिंग और UPI पेमेंट का इस्तेमाल कर रही हैं (विशेषकर शहरी-ग्रामीण सीमा क्षेत्रों में)।






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