प्रगति का असली पैमाना: भौतिकता से परे आध्यात्मिकता
आज की दुनिया में बड़ी गाड़ी, आलीशान मकान और विदेशी यात्राएं ही सफलता का प्रतीक मानी जाने लगी हैं। लेकिन इतिहास और वर्तमान यह बताते हैं कि भौतिक संपत्ति के बावजूद मानसिक शांति का अभाव जीवन को अधूरा...

संसाधन जीवन को सुविधाजनक बना सकते हैं, लेकिन सच्ची प्रगति के लिए आत्मा का विकास जरूरी
डॉ. ज्ञानानंददास स्वामी,
सहायक निदेशक, बीएपीएस स्वामीनारायण अनुसंधान संस्थान, अक्षरधाम, नई दिल्ली
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आज की तेज़ दौड़ती दुनिया में धन, संपत्ति और भौतिक सुख-सुविधाएं ही सफलता का मुख्य मापदंड मानी जा रही हैं। जिसे जितनी बड़ी गाड़ी, महंगा बंगला या विदेशी दौरे हैं, वह उतना ही ‘प्रगतिशील’ कहलाता है। आर्थिक वृद्धि और तकनीकी विकास को ही ‘समृद्धि’ का पर्याय मान लिया गया है। पर क्या यह सच है..?
सन 1923, शिकागो। एडवाटर बीच होटल में बैठक के लिए नौ व्यक्ति एकत्र हुए। इन नौ व्यक्तियों में ‘विश्व के सबसे सफल वित्तीय महारथियों, जिन्होंने धन के बल पर लगभग पूरी दुनिया को नियंत्रित किया’’, वे दुनिया के सबसे सफल पूंजीपति और निवेशक थे। अपार संपत्ति के धनी ये नौ व्यक्ति उस समय दुनिया पर राज कर रहे थे।’
ग्लेन ब्लैंड नाम के एक लेखक ने अपनी पुस्तक ‘सक्सेस’ में इस घटना का उल्लेख किया है। इन नौ व्यक्तियों के जीवन के उत्तरार्ध जीवन की जांच से पता चला कि 25 साल बाद, इन नौ व्यक्तियों में से तीन ने आत्महत्या की, 2 लोग जैल में थे और तीन दिवालिया हो गए थे।
आप भी ऐसे कई लोगों को जानते होंगे जो कभी अपने क्षेत्र में बेताज बादशाह थे, लेकिन जल्द ही असफलता के गर्त में गिरे और फिर विलीन हो गए।
यहां स्वाभाविक रूप से एक प्रश्न उठता है कि उनके विनाश का कारण क्या था? शिक्षा, सत्ता और धन के शीर्ष पर बैठे इन प्रभावशाली लोगों के जीवन में क्या कमी थी? असीमित संसाधनों का अनवरत योग करने वालों का योगफल शून्य क्यों हुआ? केवल भौतिक संपत्ति, साधनों, सुविधाओं को प्रगति का आधार मानने वाले अंतत: निराश तथा नि:शेष क्यों होते जा रहे हैं? तो आखिर क्या है प्रगति का सच्चा पैमाना?
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अध्यात्म के बिना सब शून्य
इस प्रश्न के उत्तर में मध्यकालीन संत गुरु नानकजी कहते हैं-
राम नाम एक अंक है, सब साधन है शून्य;
एक गए सब गए, एक रहे दस गुन;
इस पंक्ति का आशय है कि जिस प्रकार एक अंक के बिना शून्य का कोई मूल्य नहीं है, उसी प्रकार अध्यात्म के बिना अन्य साधन भी अर्थविहीन हैं। भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन कहते हैं- “हमारी प्रगति की आत्मा हमारी आत्मा की प्रगति है”, आध्यात्मिक विकास ही सच्चा विकास है।
इन महापुरुषों, विचारकों या कवियों का प्रगति के साधन या उपकरणों से कोई विरोध नहीं है। पर हां, उनका मत है कि ये साधन-उपकरण भी मूल्यवान होंगे, यदि इन्हें आध्यात्मिकता के साथ जोड़ दिया जाए।
कलाम और प्रमुख स्वामी महाराज का संवाद : छठा बिंदु – आध्यात्मिकता
भारत को विकसित देशों की श्रेणी में लाने के लिए विश्व प्रसिद्ध परमाणु वैज्ञानिक और खगोलशास्त्री अब्दुल कलाम के नेतृत्व में देश के 500 बुद्धिजीवियों ने एक साथ विचार-विमर्श और अनुसंधान करके विकास के पांच क्षेत्रों को निश्चित किया। कलाम साहब इस विषय को लेकर 30 जून 2001 को दिल्ली में स्वामी महाराज से मिलने पहुंचे। कलाम ने देश के विकास के पांच बिन्दुओं को स्वामीजी के समक्ष रखा- 1. शिक्षा और स्वास्थ्य सुरक्षा, 2. कृषि और संबंधित क्षेत्र, 3. सूचना और संचार, 4. बुनियादी ढांचा (इंफ्रास्ट्रक्चर) और 5. महत्त्वपूर्ण तकनीकी संरचना। उनकी बात सुनकर प्रमुख स्वामी महाराज ने तुरंत कहा, “पांच बिंदुओं के साथ छठा बिंदु जोड़ें- ईश्वर में श्रद्धा और आध्यात्मिकता। इससे ही ऐसे योग्य नागरिक तैयार होंगे जो भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने में योगदान देंगे। आध्यात्मिक धन जितना मजबूत होगा, उतना ही यह सांसारिक धन उसके साथ आएगा।”
कलाम ने कहा, “श्रेष्ठ नागरिक केवल सरकारी नियमों से नहीं बनते, यह तो आप जैसे संतों के आशीर्वाद से ही बनते हैं, आपके द्वारा निर्मित अक्षरधाम जैसे संस्कार केन्द्रों को देखकर ऐसा लगता है कि आप प्रतिवर्ष एक लाख संस्कारी युवा तैयार कर सकते हैं।”
श्रेष्ठ नागरिक निर्माण का आधार: संस्कार और सद्गुण
स्वामी महाराज ने अपनी कीर्ति और प्रशंसा के पुष्पों को गुरु योगीजी महाराज के चरणों में अर्पण करते हुए बताया, “हमारे गुरु कहते थे कि संस्कार और सद्गुणों को बाल-मानस में ही दृढ़ करवाकर एक पूर्ण विकसित राष्ट्र की नींव रखी जा सकती है।”
कलाम साहब ने भी इस मार्गदर्शन को सहर्ष स्वीकार कर लिया और फिर आगे पूछा, “पहले लोगों को धार्मिक बनाकर काम शुरू करना चाहिए या फिर दोनों कार्य समानांतर करें?” स्वामीजी ने कहा, “दोनों समानांतर करें, विकास के कार्य को जारी रखना आवश्यक है। परा और अपरा विद्या दोनों को स्वीकार कर हमारी संस्कृति ने विकास का मार्ग प्रशस्त किया है।”
स्वामीजी के इस विरल तथा सर्वजीवहितावह मार्गदर्शन की ऋणाभिव्यक्ति कलाम साहब ने ‘तेजस्वी मन’ नामक अपनी पुस्तक में विशदतापूर्वक की है। वे जीवन के अंत तक स्वामीजी की इस आध्यात्मिक ऊर्जा से प्रभावित रहे। आइए, हम भी अपने दैनिक जीवन में प्रगति के लिए अध्यात्म को पैमाना बनाकर जीवन के प्रत्येक क्षण को आनंदमय उत्सव बनाएं।






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