ईरान में लुप्त हो रही गज़ल को हिन्दुस्तान में मिली सांसें
भारतीयता का अर्थ- वसुधैव कुटुंबकम की भावना, भारतीयता का अर्थ- जीवंतता, भारतीयता का अर्थ- समसामयिक संस्कृति है। गज़ल भले ही अरबी- फारसी से हिंदी में आई, पर हिंदी में आने के बाद वह भारतीय संस्कृति व...

गज़ल का स्वभाव : भारतीयता और हिंदी गज़ल
दिनेश सिंदल,
कवि, लेखक व गीतकार
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गज़ल प्रेम की कविता है। लगभग आठ सौ वर्ष पहले अरबी- फारसी से चलकर भारत में आई यह विधा अब पूरी तरह भारतीय बनाकर हिन्दी में पनप रही है। गज़ल की संरचना ऐसी है कि इसमें समसामयिकता होते हुए भी शाश्वतता का भाव पैदा कर देती है। यह भारतीय काव्य परम्परा के अनुरूप है। यही कारण है कि आज गज़ल ईरान में (जहां से चली थी) धीरे-धीरे लुप्त हो गई और हिन्दुस्तान में तरक्की करती जा रही है। फल- फूल रही है।
भारतीयता का अर्थ- वसुधैव कुटुंबकम की भावना, भारतीयता का अर्थ- जीवंतता, भारतीयता का अर्थ- समसामयिक संस्कृति है। गज़ल भले ही अरबी- फारसी से हिंदी में आई, पर हिंदी में आने के बाद वह भारतीय संस्कृति व भारतीय चेतना के साथ एक रूप हो गई।
हिंदी गज़ल को राज्याश्रय प्राप्त नहीं हुआ। उसने सड़क वासी राम की भाषा को अपनाया। आम आदमी की बोली में बात करने लगी। वह फुटपाथ पर पली- बढ़ी और संस्कारित हुई। वह जन साधारण की अभिव्यक्ति का माध्यम बनी। यही भाषा हिंदी गज़ल की ताकत बनी।
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गजल का अर्थ ‘ स्त्रियों से बातचीत’ है। कहीं- कहीं पर गज़ल का अर्थ ‘स्त्रियों की बातचीत’ भी कहा गया है। स्त्री का स्वर प्रेम का स्वर है। दया, करुणा, प्रार्थना व समर्पण उसका स्वभाव है जो गज़ल व भारतीयता की सर्वे भवन्तु सुखिनः की भावना से मेल खाता है।
ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के अनुसार- ‘गज़ल प्राचीन गीत- काव्य की ऐसी विधा है, जिसकी प्रकृति सामान्यतः प्रेम परख होती है।’ प्रेम का स्वभाव समर्पण का है, झुकने का है, विनम्रता का है, प्रार्थना का है। हमारे सभी प्राचीन ग्रंथ प्रार्थना से ही आरम्भ होते हैं। अतः गज़ल भारतीय जनमानस के बहुत करीब है।
गजाला से बना गज़ल
गज़ल शब्द गजाला से बना है। जिसका अर्थ है हिरण का बच्चा। उसके तीर लगे और उस तीर को निकलते वक्त पीड़ा से जो कराह निकलती है वह गज़ल है। लेकिन हिंदी में आकर उस पीड़ा ने विस्तार लिया। नीरज कहते हैं-
मुझे मिला है वहां अपना ही बदन जख्मी
कहीं जो तीर से घायल कोई हिरण देखा
गज़ल प्रेम की कविता है, लेकिन अब वो मात्र दैहिक प्रेम नहीं रहा। एक वह जमाना था कि लोग औरत के गोश्त पर राज्य और विवेक सब निसार कर देते थे। राजाओं और नवाबों को अफीम और गज़ल का नशा था। तब गज़ल में मखमल पर चलने से पैर छिल जाने की बातें हुआ करती थी। पुरानी दिल्ली में ऐसा कहा जाता था कि जब एक पड़ोसन जवान होती थी तो मोहल्ले में दस गजलें कही जाती थी। किंतु हिंदी ग़ज़ल में उस प्रेम ने विस्तार लिया। हिंदी गज़ल में निहित प्रेम मात्र प्रेमी- प्रेमिका या स्त्री- पुरुष का प्रेम नहीं रहा। अब वह प्रेम कहीं राष्ट्र के प्रति है, कहीं मेहनतकश श्रमिक के प्रति, कहीं पत्थर तोड़ते मजदूर के प्रति, कहीं धरती का सीना चीर कर अन्न उपजाते किसान के प्रति, तो कहीं मनुष्य मात्र के प्रति। हिंदी गज़ल में प्रेम के विविध रूप सामने आए। वह ममता, स्नेह, दया, करुणा, अनुराग, मातृत्व, अहिंसा, देश प्रेम, ईश्वर भक्ति, विश्व बंधुत्व, सुख- शांति, के सभी संदर्भों को समेटे हुए हैं।
भारतीयता और गज़ल में अत्यंत महत्वपूर्ण और अनिवार्य रूप से एक तत्व समान रूप से समाहित है वह है उसकी सामासिकता। सबको समेटने की ताकत। एकमेव हो जाने की कामना। और अपने इस लक्ष्य में दोनों ही सदैव कामयाब रहे हैं। दोनों ही आज के समय की विसंगति, विद्रूपता से परिचित हैं। दोनों ही गिरते हुए नैतिक मूल्य, भ्रष्टाचार और अत्याचार के प्रति आक्रोशित है। दोनों ही मानवता के पक्ष में खड़े हैं एवं विश्व शांति, विश्व कल्याण की कामना करते हैं। दोनों ही भाषाई नफरत को मिटाना चाहते है।
हिंदी गज़ल की बढ़ती हुई लोकप्रियता एवं दिन- प्रतिदिन समृद्ध हो रही इसकी परम्परा का एक उल्लेखनीय कारण यह भी है कि समसामयिक हिंदी कवि इसे मात्र एक उधार ली गई विधा के रूप में नहीं मानते, वरन अभिव्यक्ति के एक सक्षम, सूक्ष्म व समयानुकूल माध्यम के रूप में इसका उपयोग कर रहे हैं। वे गज़ल को हिंदी कविता के अनुरूप नया मुहावरा, नया संस्कार एवं नया चरित्र देने में संलग्न हैं।
गज़ल के विकास में दोहा विधा का योगदान
डॉ राही मासूम रजा का मानना है कि हमारी गज़ल फारसी गज़ल का विस्तार नहीं है, अपितु भारतीय साहित्यिक परम्पराओं का एक क्रमबद्ध विकसित रूप है और उसके विकास में दोहा और सोरठा विधाओं का योगदान स्पष्ट है। वह प्रवृत्ति जिसमें शेर को दो भागों में बांटा जाता है। एक में दलील प्रस्तुत की जाती है व दूसरे में उसको सिद्ध किया जाता है। यह प्रवृत्ति ब्रजभाषा के दोहों में अक्सर पाई जाती है। इसे भारतीय शैली की मुख्य विशेषता माना गया है।
गज़ल के शेर में दो पंक्तियों में एक पूरी बात कह जाना और हर शेर का कथ्य की दृष्टि से अलग होना हिन्दी कविता में दोहा परम्परा से प्राप्त हुआ है। दोहे में ‘गागर में सागर’ भरने की बात पहले से कही जाती रही है।
हिन्दी ग़ज़ल ने अपनाए हिन्दी के पौराणिक मिथक
हिन्दी ग़ज़ल ने भारतीय कविता की लम्बी परम्परा से अपने को जोड़ा। उससे आत्मसात किया। उसके बिम्ब, प्रतीक, उपमान, उपमेय व हिन्दी के पौराणिक मिथकों को अपनाया और अपने को समृद्ध किया।
हिन्दी ग़ज़ल ने न केवल विषयगत संकीर्णता को तोड़ा, नए-नए विषयों के साथ आत्मसात किया, बल्कि हिन्दी छन्दों के सम्पर्क में आने से कई नई-नई बहारें सामने आई। जब कोई रचनाकार दूसरी विद्या में हाथ आजमाता है, तब वह अपनी विद्या के तत्व भी साथ ले जाता है। नवगीतकार जब गज़ल की तरफ आए तो नवगीत की शब्दावली भी गज़ल को मिली। नवगीत के बिम्ब, प्रतीक, उपमान- उपमेय, नवगीत का भाषाई मुहावरा गज़ल को मिला और एक नई गज़ल का नया जन्म हुआ। यही हिंदी गज़ल है।
लो गज़ल की इक शमा चुपचाप जलने आ गई
बर्फ तेरी याद की मन में पिघलने आ गई
ये हवा दिन भर तो आवारा धुंए के साथ थी
शाम को ये बाग में कपड़े बदलने आ गई
अब तो चेहरों पर तुम्हारे झुर्रियां कुछ तो दिखे
अब तुम्हारे आईनो की उम्र ढलने आ गई






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