दोस्ती इम्तिहान लेती है…
राष्ट्रपति पद की दूसरी पारी में दुनिया पर धाक जमाने की डोनाल्ड ट्रंप की जिद अमेरिका पर ही भारी पड़ रही है। अपने सभी बड़े फैसलों पर देश के अंदर ही आलोचना का शिकार बनने वाले ट्रंप भारत पर दबाव बनाने के...

नया अवसर : अमेरिका के टैरिफ टेरर के बाद भारत के करीब आया चीन
राजेश कसेरा,
वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक
Table Of Content
- नया अवसर : अमेरिका के टैरिफ टेरर के बाद भारत के करीब आया चीन
- रूस-चीन से रिश्तों को और बेहतर बनाने में जुटा भारत
- अमेरिका के सारे तर्क बेमानी, खुल गई पोल
- भारत-रूस और चीन बदल रहे दुनिया का समीकरण
- ब्रिक्स और एससीओ संगठनों ने दी अमेरिका को चुनौती
- भारत के चीन के साथ संबंधों में आने लगी नरमी
- अपने ही बुने जाल में फंस गए ट्रंप
- महाशक्ति पर बेरोजगारी और महंगाई का बढ़ा खतरा
भारत को लेकर बीते कई समय से आक्रमक रूख रखने वाले राष्ट्रपति ट्रंप ने बार-बार भारत को संकट में डालने का काम किया। इसकी शुरुआत उन्होंने अप्रैल में पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद की। भारत और पाकिस्तान के बीच शुरू हुए तनाव को कम करने की बजाय उन्होंने आग के भड़कने का इंतजार किया। उन्होंने आतंकवादी हमले की तो आलोचना की, पर खुले तौर पर पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराने से बचते रहे। परदे के पीछे से पाकिस्तान को सहयोग भी देते रहे। यह सोचकर की भारत उसकी मदद के बिना कुछ नहीं कर पाएगा। लेकिन भारत ने पाकिस्तान पर कड़ी पाबंदियां लगाने और ऑपरेशन सिंदूर को जिस तरह से अंजाम दिया, उसने अमेरिका को हिलाकर रख दिया। भारत ने छद्म रूप से पाकिस्तान का सहयोग कर रहे अमेरिका, चीन और तुर्किए को कड़ा और करारा जवाब दिया। इसके बाद पाकिस्तान ने महज 48 घंटे में सरेंडर कर सीजफायर की गुहार लगाई तो ट्रंप ने इस मौके को लपकते हुए भारत को फिर घेरने का काम किया। उन्होंने भारत और पाकिस्तान के द्विपक्षीय मुद्दे पर खुलेआम हस्तक्षेप किया। दोनों देशों से पहले खुद ने सोशल मीडिया पोस्ट से सीजफायर का ऐलान कर दिया। ट्रैड और टैरिफ का टेरर दिखाकर भारत पर दबाव बनाने की कोशिश की। भारत में राजनीतिक भूचाल लाने और भ्रम फैलाने जैसा महापाप किया। ट्रंप को लगा कि भारत में इस तरह की चिंगारी को लगाकर वे बड़ी आग को फैला देंगे। लेकिन भारत और यहां की सरकार ने फिर ट्रंप की चाल को नाकाम किया। शांत रहकर और प्रभावी तरीके से हर नकारात्मक संदेश का अपने अंदाज में जवाब दिया।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्पष्ट किया कि भारत को हल्के में आंकना भूल होगी। भारत ने राजनीतिक और कूटनीतिक दूरदर्शिता का परिचय देकर विपरीत हालात को काबू में कर लिया। ट्रंप ने बार-बार मिल रही शिकस्त को बर्दाश्त नहीं किया और भारत पर 50 फीसदी टैरिफ का बोझ लाद दिया। इतना ही नहीं, पाकिस्तान को अपनी गोद में बैठाकर भारत को अप्रत्यक्ष चुनौती देने का बेजा काम किया। रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध विराम कराने में नाकाम रहे अमेरिकन राष्ट्रपति ने भारत पर अपनी खीझ उतारी। टैरिफ लगाने के पीछे भी रूस से तेल की खरीद का कारण बताया। हालांकि ट्रंप के इस झूठ का खुलासा भी कुछ दिनों में हो गया और सारा सच सामने आ गया। रूस पर कोई बस नहीं चलने पर भारत को निशाने पर लेने का कुत्सित प्रयास किया गया।
रूस-चीन से रिश्तों को और बेहतर बनाने में जुटा भारत
भारत पर लगातार कूटनीतिक प्रहार करके अमेरिका ने खुद ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली। बार-बार भारत की रणनीति को समझने में नाकाम रहे ट्रंप ये तक नहीं भांप पाए कि भारत उनकी सोच, समझ और योजना से कहीं आगे पहुंच गया है। इस समय अमेरिका अपने ही बुने गए जाल में फंस चुका है। उसने कल्पना तक नहीं की होगी कि भारत इतनी जल्दी सारे विकल्प खोलकर सामने रख देगा। रूस के साथ चीन का भी साथ उसको मिल जाएगा। इन परिस्थितियों में यदि ट्रंप अपना रूख बदलने की भी सोचते हैं तो भी उनको और अमेरिका को काफी नुकसान हो चुका है। दुनिया के सामने एक्सपोज हो गया कि ट्रंप ने भारत के साथ क्या-क्या किया। वहीं भारत भी अमेरिका के असली रंग पहचान गया।
भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अमेरिकन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को अपना अच्छा दोस्त माना। दोनों की दोस्ती के बारे में विश्वभर में चर्चाएं चलीं। इसके बावजूद ट्रंप ने जो किया वह अविश्वसनीय है। जिसे उसने अपना दोस्त कहा, उसके साथ इस तरह का व्यवहार कैसे किया, ये सवाल तो जरूर पूछे जाएंगे? ट्रंप के ऐसे फैसलों से अमेरिका को लेकर भारत पूर्णतया सतर्क हो गया। साथ ही रूस और चीन से अपने रिश्तों को और बेहतर करने की दिशा में रोडमैप बनाने का काम भी शुरू कर दिया। इसका असर भी दिखने लगा है। तभी तो अमेरिकी अर्थशास्त्री जेफरी सैक्स ने ट्रंप प्रशासन के फैसले की खुलकर आलोचना की। उन्होंने ट्रंप के भारत पर लगाए गए 50 फीसदी के फैसले को राजनीतिक और कूटनीतिक मूर्खतापूर्ण कदम बताया। वहीं, वरिष्ठ अमेरिकी कांग्रेस सदस्य ग्रेगरी मीक्स ने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच बेहतर संबंध बनने में दो दशक लगे, लेकिन ट्रंप के फैसले से इस रिश्ते पर असर पड़ेगा। भारत पर लगाए टैरिफ पर रिपब्लिकन नेताओं ने भी चिंता जाहिर की। रिपब्लिकन नेता निक्की हेली ने इसको गलत और चिंतापूर्ण बताया। हेली ने भारत और अमेरिका के बीच साझेदारी में दरार को वाशिंगटन की ओर से बड़ी भूल करार दिया।
अमेरिका के सारे तर्क बेमानी, खुल गई पोल
ट्रंप प्रशासन ने भारत पर एक्स्ट्रा टैरिफ लगाने के पीछे अजीबोगरीब तर्क दिए। अमेरिका ने बताया कि भारत, रूस से तेल खरीद रहा है, जिसकी वजह से भारत अप्रत्यक्ष तौर पर यूक्रेन युद्ध में उसकी मदद कर रहा है। इसके जवाब में भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने स्पष्ट कहा कि अमेरिका का यह फैसला समझ से परे है, क्योंकि भारत की तुलना में चीन, रूस से ज्यादा कच्चा तेल खरीदता है। ऐसे में अमेरिका, चीन के रूस से तेल खरीदने पर कार्रवाई क्यों नहीं कर रहा है, जबकि पहले अमेरिका ने भारत को रूस से तेल खरीदने के लिए कहा था, ताकि वैश्विक तेल की कीमतें कम रहें। इसी तरह से अमेरिका का पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन ने भी कहा कि रूसी तेल की खरीदारी के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराना और उस पर 25 फीसदी के टैरिफ को 50 फीसदी तक बढ़ाना ट्रंप की एक गलती है। उन्होंने अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा काम किया। उन्हें ध्यान रखना होगा कि यह कोई ऐसा फैसला नहीं, जिसे अमेरिकी कांग्रेस या जनता ने व्यापक रूप से समर्थन दिया हो।
भारत-रूस और चीन बदल रहे दुनिया का समीकरण
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी व्यवस्था में अमेरिका और सोवियत संघ शक्ति के दो बड़े केंद्र थे। 1990 के बाद विघटन होने से रूस इस दौड़ से बाहर हो गया। इसके बाद संयुक्त राज्य अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा शक्तिशाली देश बन गया। वर्ष 2000 के बाद उदारवाद और वैश्वीकरण की सीढ़ी पर सवार भारत की अर्थव्यवस्था ने आर्थिक चमत्कार किए। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में 8 फीसदी की विकास दर ने भारत की इकोनॉमी की तस्वीर बदली। आज भारत दुनिया की सप्लाई चेन का अहम हिस्सा है। चार ट्रिलियन डॉलर के साथ दुनिया की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था है और तीसरे पायदान तक पहुंचने के करीब है।
इधर, चीन ने ढाई दशक में आश्चर्यजनक आर्थिक तरक्की हासिल की। 2001 में डब्ल्यूटीओ में शामिल होने के बाद वैश्विक व्यापार में हिस्सेदारी बढ़ाई। ग्लोबल एक्सपोर्ट में उसकी हिस्सेदारी करीब 15 फीसदी हो गई। बुनियादी ढांचे और औद्योगीकरण में उसने भारी निवेश कर वैश्विक आपूर्ति शृंखला का केंद्र बना गया। तकनीकी उन्नति, विकास, सेमीकंडक्टर और एआइ के क्षेत्र में चीन के किए गए नवाचारों ने उसको दुनिया में अग्रणी बना दिया। करीब 19 ट्रिलियन डॉलर के आर्थिक ढांचे के साथ वह अमेरिका के बाद दूसरे नम्बर पर आ गया। जल्द उसे पछाड़ने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
ब्रिक्स और एससीओ संगठनों ने दी अमेरिका को चुनौती
अमेरिका से अलग ब्रिक्स और एससीओ जैसे संगठनों में मजबूत साझेदार बनकर भारत, चीन और रूस ने गैर-डॉलर व्यापार को बढ़ावा दिया और अमेरिकी वित्तीय प्रभुत्व को चुनौती दी। विश्व बैंक की मानें तो ब्रिक्स देश वैश्विक जीडीपी का 26 प्रतिशत हिस्सा रखते हैं, जो जी-7 के 44 प्रतिशत से कम है। लेकिन यह डेटा तेजी से बढ़ रहा है। भारत और चीन रूस का 80 फीसदी से अधिक कच्चा तेल खरीदते हैं। चीन के साथ सीमा विवाद और प्रतिस्पर्धा के बावजूद भारत रणनीतिक और कूटनीतिक स्वायत्तता बनाकर रखता है। यानी भारत न तो अमेरिकी खेमे में पूरी तरह से शामिल है और न ही चीन-रूस के खेमे में। ब्रिक्स और एससीओ के फैलते दायरे से पश्चिमी दबदबे का संतुलन बिगड़ गया है। ट्रंप का असली डर यही है कि यदि भारत और चीन जैसे देश रूस के साथ मिलकर वैश्विक संस्थाओं, व्यापार और फाइनेंस में अमेरिका को दरकिनार करने लगे तो उनकी पकड़ कमजोर पड़ जाएगी। भारत, चीन और रूस के बीच कूटनीतिक और रणनीतिक गतिविधियां तेजी से बदल रही हैं। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सात साल बाद चीन यात्रा पर जा रहे हैं, तो पुतिन भी लम्बे समय बाद भारत आ रहे हैं। भारत अपनी विदेश और आर्थिक नीति में पहले से कहीं ज्यादा निर्भीक और आत्मनिर्भर बन रहा है और अमेरिका की यही सबसे बड़ी चिंता है।
भारत के चीन के साथ संबंधों में आने लगी नरमी
अमेरिका के टैरिफ ने भारत के रणनीतिक दृष्टिकोण को बदल दिया है। इससे जहां भारत के अमेरिका के साथ संबंधों में कड़वाहट आने लगी है, वहीं चीन से संबंधों में सुधार हो रहा है। हाल में चीनी विदेश मंत्री वांग यी की भारत यात्रा ने इसकी सकारात्मक शुरुआत की। वे भारत की तीन दिवसीय यात्रा पर आए। यहां विदेश मंत्री एस. जयशंकर, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के साथ सीमा मुद्दों पर विशेष प्रतिनिधियों की नए दौर की वार्ता की तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी मिले। चीनी विदेश मंत्री ने भारत पर लगाए गए 50 फीसदी टैक्स को अमेरिका का मनमाना रवैया करार दिया। टैरिफ के इस्तेमाल को अन्य देशों को दबाने के हथियार के रूप में इस्तेमाल करने पर अमेरिका की निंदा की। भारत में चीन के राजदूत शू फेइहोंग ने कहा कि धमकाने वाले को एक इंच भी दो, वह एक मील ले लेगा। गलवान घाटी में मई 2020 हुए सैन्य गतिरोध के बाद दोनों देशों में तनाव बढ़ा था। इसके बाद अक्टूबर-2024 में डेमचोक और देपसांग में अंतिम संघर्ष बिंदुओं से सैनिकों की वापसी के लिए हुए समझौते के बाद गतिरोध कम होना शुरू हुआ जो तेजी से आगे बढ़ा। भारत ने हाल ही चीनी नागरिकों को पर्यटक वीजा देना शुरू किया, जो यात्रा और आदान-प्रदान को बहाल करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम रहा। चीन ने भी पांच वर्षों में पहली बार भारतीय नागरिकों के लिए कैलाश मानसरोवर यात्रा खोलकर संबंधों को बेहतर करने का काम किया। उत्तराखंड में लिपुलेख, हिमाचल प्रदेश में शिपकी ला और सिक्किम में नाथू ला दर्रे से भी सीमा व्यापार बहाल करने के प्रयास जारी हैं। कोविड-19 महामारी के दौरान दोनों देशों के बीच निलंबित हुईं हवाई सेवाएं सितम्बर से शुरू होने को है। सरकार ने भारतीय एयरलाइंस को इसके लिए तैयार रहने को कहा है। चीन ने भारत को यूरिया निर्यात पर प्रतिबंधों में भी ढील दी।
अपने ही बुने जाल में फंस गए ट्रंप
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने देश को कर्ज के जाल से बाहर निकालने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपना रहे हैं। उन्होंने दुनिया भर के देशों पर जमकर टैरिफ लगाया। लेकिन इसका उल्टा असर होने लगा। इस साल अमेरिका में 446 बड़ी कम्पनियां दिवालिया हो चुकीं है। यह 2020 में कोरोना काल के आंकड़े से 12 फीसदी ज्यादा है। केवल जुलाई में 71 बड़ी कम्पनियां दिवालिया हुईं। ट्रंप ने विदेशी सामान पर अप्रैल में 10 प्रतिशत टैरिफ लगाया था। इसके बाद अमेरिका में दिवालिया होने वाली कम्पनियों की संख्या में तेजी आई। साल 2025 की पहली छमाही में 371 बड़ी अमेरिकी कम्पनियां दिवालिया हुईं। जून में 63 कम्पनियों ने बैंकरप्सी के लिए आवेदन किया। इस साल दिवालिया होने वाली कम्पनियों में 1990 और 2000 के दशक के कई पॉपुलर ब्रांड्स शामिल हैं। ट्रंप के फैसलों की सबसे ज्यादा मार स्मॉलकैप कम्पनियों पर पड़ी। 2024 के अंत में नुकसान में चल रही रसेल 2000 कम्पनियों की संख्या बढ़कर 43 फीसदी पहुंच गई जो 2020 के बाद सबसे ज्यादा है। 2008 के संकट के समय यह आंकड़ा 41 फीसदी था। कई बार के बदलाव के बावजूद अमेरिका में टैरिफ अभी बहुत ज्यादा है। अमेरिका का इफेक्टिव टैरिफ 17.3 फीसदी है जो 1935 के बाद सबसे ज्यादा है। इस साल इंडस्ट्रियल सेक्टर की 70 कम्पनियां दिवालिया हुईं, जबकि कन्ज्यूमर डिस्क्रेशनरी सेक्टर की 61 कम्पनियां पर ताले लग गए। हेल्थकेयर सेक्टर की 32, कन्ज्यूमर स्टैपल्स की 22, आईटी की 21, फाइनेंशियल की 13, रियल एस्टेट की 11, कम्यूनिकेशन सर्विसेज के 11, मटीरियल्स की 7, यूटिलिटीज तथा एनर्जी सेक्टर की चार कम्पनियां बंद हो गईं।
महाशक्ति पर बेरोजगारी और महंगाई का बढ़ा खतरा
टैरिफ से देश में महंगाई और बेरोजगारी बढ़ने का भी खतरा है। जुलाई में 11 फीसदी छोटी कम्पनियों ने कहा कि उनकी बिक्री बहुत खराब रही है। यह अमेरिका में बेरोजगारी का अहम संकेत है। अमेरिका में छोटी कम्पनियां 6.23 करोड़ लोगों, यानी 45.9 फीसदी लोगों को रोजगार मिला है। अमेरिका में 20 से 24 साल के युवाओं की बेरोजगारी पिछले तीन महीने में औसतन 8.1 फीसदी रही, जो चार साल में सबसे ज्यादा है। यह 2008 के स्तर पर है। लागत कम करने के लिए कम्पनियां एआइ का सहारा ले रही हैं और एंट्री लेवल पर जॉब कटौती कर रही हैं। महंगाई भी सिर उठाने लगी है। पीपीआई महंगाई में 0.9 फीसदी तेजी आई है जो 2022 के बाद सबसे ज्यादा है। कोर सीपीआई मंहगाई भी 3 फीसदी के ऊपर चली गई है। इससे फेडरल रिजर्व के लिए ब्याज दरों में कटौती करना मुश्किल हो गया है।






No Comment! Be the first one.