सन्नाटे, सनक और सिस्टम का संगम
राजस्थान आजकल किसी एक खबर से नहीं, बल्कि तमाम अजीबोगरीब घटनाओं से गूंज रहा है। गूंज भी ऐसी, जो कभी हॉस्टल के खाली कमरों में प्रतिध्वनित होती है, तो कभी स्कूल के गलियारों में थप्पड़ों की ताल...

बात- बेलगाम
बलवंत राज मेहता,
वरिष्ठ व्यंग्यकार
राजस्थान आजकल किसी एक खबर से नहीं, बल्कि तमाम अजीबोगरीब घटनाओं से गूंज रहा है। गूंज भी ऐसी, जो कभी हॉस्टल के खाली कमरों में प्रतिध्वनित होती है, तो कभी स्कूल के गलियारों में थप्पड़ों की ताल से। कहीं डॉक्टर बिना डिग्री के इलाज कर रहे हैं, तो कहीं बिना दिव्यांगता के दिव्यांग बनकर लोग सरकारी नौकरी में आराम फरमा रहे हैं। और हां, अंतिम यात्रा में भी कीचड़ का ऐसा स्वागत कि वैराग्य की अनुभूति ‘घुटनों तक’ पहुंच जाए। इन सब घटनाओं में एक बात साफ है। राजस्थान में कभी शिक्षा, कभी चिकित्सा, कभी व्यवस्था और कभी संवेदना… सब बेलगाम हो जाती है। कहीं सन्नाटा, कहीं सनक, कहीं साज़िश और कहीं संयोग। राजस्थान का यह चेहरा हंसाता भी है, चौंकाता भी है, और सोचने पर मजबूर भी करता है।
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कोटा का कोचिंग.. सन्नाटा
कभी जो शहर “आईआईटी-एम्स की फैक्ट्री” कहलाता था, वो आज हॉस्टलों के खाली कमरों में गूंजते सन्नाटों से पूछ रहा है, “बच्चों, हमसे क्या भूल हुई?” बात ही कुछ ऐसी है। अब बच्चे ऑनलाइन पढ़ने लगे हैं, और माता-पिता भी समझदार हो गए.., “बेटा, कोटा भेजने से अच्छा है घर में ही दाल-रोटी खा के डॉक्टर-इंजीनियर बन जा। कम से कम किराया तो नहीं देना पड़ेगा।” हॉस्टल मालिक जो कभी 12 हज़ार रुपये लेकर “छोटा कमरा, बड़ी उम्मीदें” बेचते थे, अब 1500 रुपये में “कूलर फ्री, कैंसिलेशन फ्री” ऑफर दे रहे हैं। मेस में जहां पहले बच्चे लाइन में खड़े रहते थे, अब रोटियां खुद टेबल पर बैठी सोचती हैं, “आज कोई आएगा भी या नहीं?” और कोटा? वो अब भी अपने पुराने पोस्टरों के साए में बैठा है, उम्मीद करते हुए “शायद अगला सत्र मेरा हो!”
जहां गुरु घण्टी नहीं, घूंसे बजते हैं!
रींगस के सबसे बड़े स्कूल में भामाशाह सम्मान समारोह तो हुआ, लेकिन माहौल ऐसा बना कि लगता था ज्ञान का नहीं, कुश्ती का अखाड़ा सजा हो। बच्चों को सम्मानित करने की सूची पर बहस शुरू हुई और देखते-ही-देखते “विचार-विमर्श” ने “हाथापाई” का रूप ले लिया। गुरुजन अपने-अपने तर्क नहीं, एक-दूसरे की कॉलर पकड़ रहे थे। छात्र सम्मानित होते-होते खुद डर गए, ये सम्मान है या सज़ा? जिस समारोह में शिक्षा के उजाले की बात होनी थी, वहां तमाचे गूंज रहे थे। बाजार के लोग समझ नहीं पाए कि ये स्कूल है या कोई नया धारावाहिक “गुरु-गद्दार” ऑन एयर हो गया है। पुलिस आई तो स्कूल वीरान था। कुछ गुरुजन ऐसे गायब मिले जैसे परीक्षा में नकल पकड़े जाने पर स्टूडेंट क्लास छोड़ते हैं। शिक्षा मंत्रालय को चाहिए कि अगली बार स्कूलों में “गुस्सा प्रबंधन” भी पढ़ाया जाए, क्योंकि अब स्कूलों में ज्ञान कम, ग्लैडिएटर भावना ज्यादा दिखती है!
इलाज से ज़्यादा इजाज़त जरूरी है!
बांसवाड़ा की छोटी सरवन धरती पर चिकित्सा चमत्कारों का बोलबाला था। जहां डॉक्टर नहीं, “डॉक्टरी का जज्बा” इलाज कर रहा था। बिना डिग्री, बिना पंजीकरण और बिना अनुमति के। कुछ सज्जन सेवा-भाव में इतने लीन थे कि गली-गली क्लीनिक खोल रखे थे। मरीज आते थे, इलाज होता था, और कई बार बीमारी की जगह भगवान सीधे बुला लेते थे। जैसे ही मेडिकल विभाग की नींद खुली, टीम पहुंची, तो एक-एक कर “जादूगर डॉक्टर” धुएं की तरह उड़ गए! कुछ ने तो मौके पर गायब होने का ऐसा हुनर दिखाया कि हॉलीवुड भी शर्मिंदा हो जाए। जिनके पास स्टेथोस्कोप था, उनके पास डिग्री नहीं थी। जिनके पास दवा थी, उनकी पहचान पर भी शक था। सवाल ये नहीं कि इलाज हो रहा था, सवाल ये है कि इलाज किससे हो रहा था? शुक्र है चिकित्सा विभाग ने मुहिम चलाई, वरना अगला अस्पताल शायद नींबू-मिर्च टांग कर चलने लगता। अब देखना ये है कि अगली बार “डॉक्टर साहब” कौन से मोहल्ले में रहस्यमयी वापसी करते हैं!
दिव्यांगता का फर्जी लाइसेंस
जयपुर में एसओजी ने ऐसा फर्जीवाड़ा पकड़ा है, जिसे सुनकर असली दिव्यांग भी हैरान हैं। नौकरी पाने का नया शॉर्टकट यही है। न पढ़ाई, न कोचिंग, न इंटरव्यू की टेंशन…, बस एक फर्जी दिव्यांग प्रमाण-पत्र बनवाइए और सरकारी सेवा में आराम फरमाइए। जांच में 24 ऐसे ‘काबिल’ लोग निकले, जिनकी दिव्यांगता सिर्फ कागज पर थी, चाल-ढाल में तो मानो दौड़ प्रतियोगिता का अभ्यास चल रहा हो। एसएमएस मेडिकल कॉलेज, जयपुर के विशेषज्ञ डॉक्टरों ने इनकी ‘कागजी बैसाखियां’ तोड़ दीं, लेकिन असली दिव्यांगों का हक कौन लौटाएगा? अगर फर्जीवाड़े के लिए कोई ओलंपिक होता, तो ये खिलाड़ी स्वर्ण पदक लाते। इवेंट का नाम होता “पेपर बैसाखी स्प्रिंट”। असली संघर्ष करने वाले आज भी कतार में हैं, और ये लोग अब तक वेतन भोग रहे थे। यह दिव्यांगता नहीं, व्यवस्था की मजबूरी का सबसे बड़ा तमाशा है।
शिक्षा का बल्ला टेस्ट मैच में
चूरू जिले के झारिया गांव के सरकारी स्कूल में आज किताबों की जगह बल्ला चला और पाठ्यक्रम की जगह ‘क्रिकेट प्रैक्टिकल’ शुरू हो गया। गुरुजी ने नशे की तरावट के साथ ऐसा पीटी पीरियड लिया कि बच्चे भी समझ न पाए। ये खेल का समय है या आईपीएल ऑडिशन। गली-मोहल्ले में तो बल्लेबाज़ी देखी थी, पर यहां तो स्कूल का मैदान गवाह बना। ग्रामीण विरोध में पहुंचे तो खुद को अचानक से फील्डिंग पोज़िशन में पाया। कवर, प्वाइंट, मिडऑन सब सेट। दो घंटे तक यह अजीबो-गरीब मैच चला, और जब पुलिस उतरी तो लगा मानो थर्ड अंपायर ने फैसला सुना दिया हो। शिक्षा का स्तर भले ऊपर-नीचे हो, पर नशा और बल्ला मिलकर कितना ‘मारक पाठ’ पढ़ा सकते हैं, इसका लाइव डेमो सबको मिल गया। अब जांच कमेटी तय करेगी कि अगली क्लास फिर होगी या गुरुजी रिटायर होकर ‘मैदान’ छोड़ देंगे।
गुरुजी का प्रेम पत्राचार
बीकानेर जिले के खाजूवाला ब्लॉक में केएलडी राजकीय विद्यालय आज शिक्षा से ज्यादा शर्म का सबक पढ़ाने लगा। आरोप है कि गुरुजी ने ब्लैकबोर्ड छोड़ ‘लव लेटर’ लिखने का नया सिलेबस अपनाया। छात्रा ने जब ये ‘पाठ्य सामग्री’ घर में पढ़ी, तो अभिभावक किताब छोड़ गुस्से का बस्ता उठाकर स्कूल आ पहुंचे। गांव वाले भी क्लास में दाखिल हो गए। कोई नामांकन के लिए नहीं, बल्कि निलंबन के लिए। गेट पर ताला जड़ा गया, मानो यह इमारत अब केवल नैतिकता की कक्षाएं ही लेगी। पुलिस और अफसर आए, मगर जनता का एक ही उत्तर। ऐसे शिक्षक को शिक्षा के मंदिर से बाहर का रास्ता दिखाओ। अंततः विभाग ने गुरुजी को ‘अनिच्छा अवकाश’ पर भेज दिया। अब सवाल यह है कि क्या अगली पीढ़ी को ज्ञान मिलेगा या ऐसे ‘प्रेम-पत्राचार’ के पाठ पढ़ने पड़ेंगे।
शमसान में शमसानी वैराग्य और कीचड़ का दर्शन
जोधपुर के प्रतापनगर स्थित श्मशान में वरिष्ठ पत्रकार की अंतिम यात्रा एक आध्यात्मिक अनुभव कम, कीचड़-कुश्ती ज़्यादा साबित हुई। हाल ही में हुई बरसात ने रास्ते में ऐसा दलदल रचाया कि शवयात्रा में शामिल लोग शोक से पहले संतुलन साधते दिखे। पायजामे और पतलून टांगे, नेता से लेकर उद्योगपति तक सब गीले गड्ढों में जीवन की नश्वरता पर मनन कर रहे थे। असली श्मसानी वैराग्य तब आया, जब लोगों ने देखा कि अंतिम सत्य तक पहुंचने के मार्ग में भी स्थायी कीचड़ है। शरीर की नहीं, व्यवस्था की असंवेदनशीलता की! निगाहें अर्थी पर थीं, पर ध्यान पैरों में फंसे कीचड़ पर। बाद में किसी ने धीरे से कहा, “अरे ये आज का नहीं, बरसात का कीचड़ है।” लेकिन यह सुनकर वैराग्य और भी गहरा गया कि मौत अटल है, पर मोक्षधाम तक पहुंचना प्रशासनिक कृपा पर निर्भर है।






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