सबक लेने के लिए हादसे का इंतजार आखिर क्यों..?
शिक्षा विभाग में बरसों तक प्रशासनिक अधिकारी के रूप में काम कर चुके शिक्षाविद् और साहित्यकार डा. राजेन्द्र मोहन शर्मा कहते हैं कि यह मसला अपेक्षा से ज्यादा उपेक्षा का है। सबकुछ जानते हुए भी जिम्मेदार...

प्रदेश की जर्जर सरकारी इमारतें उपेक्षा की शिकार
मनीष,
वरिष्ठ पत्रकार
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कहा जाता है कि अक्ल बादाम खाने से नहीं, ठोकर खाने से आती है और हमारे सरकारी सिस्टम पर यह कहावत पूरी तरह से फिट बैठती है। जब तक कोई हादसा ना हो, कुछ लोगों की जान ना जाए, कोई बड़ा नुकसान ना हो, तब तक हमारा सिस्टम सबकुछ देखते हुए भी आंखें मूंदे रहता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है हमारी सरकारी इमारतें। नब्बे प्रतिशत सरकारी स्कूल, काॅलेज, अस्पताल या दफ्तर पहली नजर में ही इस बात का आभास दे देते हैं कि ये सरकारी हैं और इनका हाल तभी सुधर सकता है, जब यहां कोई हादसा हो जाए या फिर संयोग से कोई अफसर या नेता ऐसा आ जाए। जो बेहतर कार्यदशाओं में काम करना चाहता हो या निर्माण कार्य से उसके “हित“ सीधे तौर पर जुड़े हों।
झालावाड़ के पिपलोदा स्कूल में पिछले दिनों जो हुआ, वह दुःखद तो था, लेकिन अप्रत्याशित नहीं। पूरे प्रदेश में ऐसा हादसा कहीं भी हो सकता था और आगे भी हो सकता है, क्योंकि ऐसे सरकारी भवन प्रदेश के हर गांव, तहसील और जिला मुख्यालय ही नहीं, राजधानी जयपुर में भी मौजूद हैं।
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कुछ उदाहरण देखिए
– उदयपुर में 13 उप स्वास्थ्य केन्द्र बेहद जर्जर स्थिति में, वहीं 264 स्वास्थ्य केंद्र ऐसे हैं, जहां छतों से पानी टपक रहा है। दीवारों पर सीलन आ रही है।
– कोटा जिले के अरण्डखेड़ा आदर्श प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र का भवन जर्जर हो चुका है। कमरों की दीवारों का प्लास्टर उखड़ चुका है।
– जयपुर के एसएमएस अस्पताल से तो अक्सर फॉल्स सीलिंग और प्लास्टर टूटकर गिरने की खबरें आती रहती हैं।
– अजमेर में राज्य बीमा एवं प्रावधायी निधि विभाग की इमारत इतनी जर्जर हो चुकी है कि अब उसके हिस्से गिरने लगे हैं। हाल ही में हुई बारिश के दौरान मुख्य द्वार के ऊपर का छज्जा भरभरा कर गिर पड़ा, जिससे विभाग को मुख्य द्वार बंद करना पड़ा।
– चौमूं में सरकारी स्कूल, पटवार भवन, पंचायत भवन कभी भी गिरने की स्थिति में आ चुके हैं।
ये सब तो बानगी भर है, जो झालावाड़ हादसे के बाद विभिन्न मीडिया रिपोर्ट में सामने आए हैं, लेकिन ऐसी इमारतों के बारे में जानने के लिए हमें किसी मीडिया रिपोर्ट की जरूरत नहीं है। प्रदेश के किसी भी हिस्से में चले जाइए, आपको कोई ना कोई बेहाल जर्जर सरकारी इमारत दिख ही जाएगी।
हादसे के बाद याद आई जर्जर सरकारी इमारतों की सूची
झालावाड़ हादसे के बाद सरकारी स्तर पर ताबड़-तोड़ बैठकें हुई और यह सामने आया कि प्रदेश में 2699 जर्जर सरकारी इमारतें चिन्हित की गई है, जिन पर अब बुलडोजर चलेगा। लेकिन, पीड़ादायक स्थिति यह है कि एक सूची महीनों से सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग की वेबसाइट पर पड़ी है। इस सूची में हर जिले के आवासीय और गैर आवासीय जर्जर सरकारी इमारतों की पूरी जानकारी है। इसमें यह भी बताया गया है कि इमारत जर्जर क्यों है, अभी किसी उपयोग में आ रही है या नहीं और इसका कोई उपयोग हो सकता है या इसे तोड़ना ही बेहतर है।
इस सूची में ज्यादातर जर्जर इमारतें या तो स्कूलों की है या पंचायत भवन, कृषि भवन या अस्पतालों की हैं। यह सूची कई माह से सरकार के पास है, लेकिन कार्रवाई के नाम पर वही सरकारी ढर्रा हावी है कि जब कोई हादसा होगा या कोई घटना सामने आएगी, तब इस सूची पर जमी धूल झाड़ी जाएगी।
हर जिले में बड़ी संख्या में है जर्जर इमारतें
यह सूची बताती है कि हर जिले में बड़ी संख्या में जर्जर सरकारी इमारतें मौजूद हैं। जयपुर जिले की ही बात करें तो यहां 371 गैर आवासीय व 16 आवासीय सरकारी जर्जर भवन है। वहीं प्रदेश के दो अन्य सबसे बड़े जिलों जोधपुर और कोटा की बात करें तो जोधपुर में 302 गैर आवासीय व 136 आवासीय तथा कोटा में 119 गैर आवासीय व 36 आवासीय जर्जर सरकारी भवन हैं। सबसे ज्यादा खराब हालात बाड़मेर के हैं, जहां करीब 1200 गैर आवासीय और आवासीय जर्जर भवन हैं।
जानकर भी अनजान क्यों
हर सरकारी भवन में प्रतिदिन में बड़ी संख्या में लोग आते हैं। सरकार के जनप्रतिनिधि और बड़े अधिकारियों का आवागमन भी रहता है। वे भवन के जर्जर हालात पर चिंता भी जाहिर करते हैं, लेकिन जब मरम्मत या नए निर्माण की बात आती है तो प्राथमिकताएं बदल जाती हैं। मरम्मत या नए निर्माण का पैसा तब तक नहीं मिलता, जब तक कोई हादसा ना हो जाए या संबंधित जनप्रतिनिधि या बड़े अधिकारी का ‘हित’ इससे ना जुड़ जाए। यही कारण है कि बरसों तक ये इमारतें जीर्ण-शीर्ण अवस्था में भी काम में ली जाती रहती हैं। शिक्षा विभाग में बरसों तक प्रशासनिक अधिकारी के रूप में काम कर चुके शिक्षाविद् और साहित्यकार डा. राजेन्द्र मोहन शर्मा कहते हैं कि यह मसला अपेक्षा से ज्यादा उपेक्षा का है। सबकुछ जानते हुए भी जिम्मेदार अधिकारी खामोश बने रहते हैं। इसका बड़ा कारण है प्रशासनिक उदासीनता, भ्रष्टाचार और प्राथमिकताओं का गलत चयन। अधिकारियों का मौन उनकी जवाबदेही की कमी को दर्शाता है और इसी के नतीजे के रूप में झालावाड़ जैसी घटनाएं सामने आती हैं।
क्या किया जाना चाहिए
यह बात सही है कि सरकार के पास करने के लिए और भी बहुत कुछ होता है। सरकार की प्राथमिकताएं बदलती रहती हैं, लेकिन सरकार को यह समझना चाहिए कि सिर्फ सचिवालय, मुख्यमंत्री कार्यालय या मंत्रियों और विभागों के मुख्यालय ही नहीं, बल्कि हर सरकारी इमारत अच्छी स्थिति में होनी चाहिए। बेहतर कार्यदशाएं कर्मचारियों को बेहतर काम करने के लिए प्रेरित करती हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है निजी कम्पनियों के चमचाते आॅफिस, जो वहां काम करने वाले कर्मचारियों की उत्पादकता को बढ़ा देते हैं। इसीलिए हर विभाग के बजट में उससे जुड़े सरकारी भवनों के निर्माण और मरम्मत का पर्याप्त इंतजाम होना चाहिए।
स्कूल और काॅलेजों के मामले में दानदाताओं और भामाशाहों का सहयोग हमेशा से मिलता रहा है। हालात तो ये ही कि दानदाताओं के सहयोग से बने भवनों की मरम्मत तक समय पर नहीं हो पाती। स्कूलों, संस्था प्रधानों और अस्पताल अधीक्षकों को इसे लेकर पूरी सक्रियता से काम करना होगा। इस मामले में अब तो निजी कम्पनियां भी सहयोग करती है, क्योंकि कार्पोरेट सोशल रिस्पांसबेलिटी यानी सीएसआर एक्टिविटी के तहत उन्हें भी ऐसे कामों पर खर्च करना पड़ता है।
सबसे बड़ी जिम्मेदारी जनप्रतिनिधियों की है। विधायकों और सांसदों के पास खुद का कोष होता है और वे दानदाताओं को भी प्रेरित कर सकते हैं। यदि हर जनप्रतिनिधि अपने क्षेत्र की सरकारी इमारतों की स्थिति को लेकर खुद सहयोग करें और सहयोग जुटाएं तो यह समस्या चुटकियों में खत्म हो सकती है।
सिर्फ बजट का प्रावधान काफी नहीं
इस पूरे मामले में एक बड़ा पहलू भ्रष्टाचार का है। सरकारी निर्माण या मरम्मत के काम में भ्रष्टाचार एक बहुत बड़ी समस्या है। राजेन्द्र मोहन शर्मा कहते हैं कि सरकारी निर्माण कार्यों का नियमित निरीक्षण और पैसे का सही उपयोग सुनिश्चित करना बड़ी चुनौती है। सरकार बजट का प्रावधान कर देती है, लेकिन यह पैसा सही ढंग से और समय पर काम नहीं आ पाता। निर्माण और मरम्मत में घटिया सामग्री का इस्तेमाल समस्या को कम करने के बजाए बढ़ा देते हैं। ऐसे में निर्माण और मरम्मत में पूरी सावधानी और ईमानदारी रखी जाए, तभी समस्या का स्थाई समाधान हो सकता है।
बहरहाल जर्जर सरकारी इमारतें एक ऐसा मुद्दा है, जिसके बारे में सिर्फ ईमानदार इच्छाशक्ति की जरूरत है। यदि जनप्रतिनिधि या जिम्मेदार अधिकारी समस्या को अनदेखा करने की प्रवृत्ति छोड़ दें। ये ऐसा मुद्दा ही नहीं है जो किसी हादसे का कारण बने।






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