पर्वत के पार: कैलाश यात्रा और आत्मा का साक्षात्कार
कैलाश मानसरोवर की यात्रा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मनुष्य की सीमाओं और सामर्थ्य की गहरी परीक्षा है। यह वह मार्ग है जहां आस्था और विज्ञान, राजनीति और अध्यात्म, कठिनाई और संतोष एक साथ चलते...

तीर्थ से आत्मा तक: आस्था, अनुशासन और अदृश्य शक्ति से संवाद का अनुभव
लेखक: माधव कृष्ण डागा
सहलेखिका: सुपुत्री सुश्री राधिका डागा
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“हिन्दू” शब्द केवल एक धर्म की पहचान नहीं, बल्कि सृष्टि के उस मूल को दर्शाता है जिसमें हर रचना, हर आस्था और हर धारा समाहित हो जाती है। समय-समय पर इसे अलग-अलग परिभाषाओं में समझाया गया है, परंतु मूल भाव यही है कि जीवन और मृत्यु का अंतिम निर्णय किसी अदृश्य शक्ति के हाथ में ही है। आधुनिक इंसान तकनीक और विज्ञान के बल पर कितना भी उन्नत हो जाए, परंतु यह सच कभी नहीं बदलता। हाल की कुछ विभीषिकाओं ने हमें बार-बार यह अहसास कराया है।
इसी सत्य को हमने (मैं माधव कृष्ण और मेरी सुपुत्री राधिका) अपनी तीर्थयात्रा में प्रत्यक्ष रूप से अनुभव किया। हमारे साथ गए अन्य यात्रियों ने भी इस अनुभूति को आत्मसात किया। इस यात्रा-वृत्तांत में हम केवल कठिन मार्ग या व्यवस्थाओं का वर्णन ही नहीं कर रहे, बल्कि उस आत्मिक संवाद को साझा कर रहे हैं जो कैलाश मानसरोवर जैसी पवित्र यात्रा में संभव हो पाता है।
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कैलाश का आह्वान
भारतीय परम्परा में तीर्थयात्राओं की अनेक कहावतें और मान्यताएं हैं। “सारे तीर्थ बार-बार, गंगा सागर एक बार” या “जय केदार बाबा”, ऐसी धारणाएं हर आस्तिक के मन में बसती हैं। परंतु इनके ऊपर एक ही तीर्थ है जो हर हिंदू की आकांक्षा और आजीवन सपना माना जाता है— कैलाश मानसरोवर।
कैलाश केवल हिमालय का एक पर्वत नहीं है। यह वह स्थान है जिसे शिव का निवास कहा जाता है, जहां जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ की तपस्या की मान्यता है, जहां बौद्ध और सिख धर्म से भी जुड़े प्रसंग हैं। यह स्थल चारों धर्मों के अनुयायियों को एक सूत्र में पिरो देता है।
तिब्बत और राजनीति की परछाई
इस यात्रा को समझने के लिए तिब्बत का संदर्भ अनिवार्य है। 19वीं शताब्दी में यह मंगोलिया के प्रभाव में था। 1949-51 में चीन ने जबरन इस पर कब्जा कर लिया। भारत के प्रयास के बावजूद तिब्बत को बचाना संभव नहीं हो पाया। इसका परिणाम 1962 के भारत-चीन युद्ध के रूप में सामने आया। तब से लेकर आज तक तिब्बत निर्वासित धर्मगुरु दलाई लामा के लिए दर्द का प्रतीक और चीन के लिए रणनीतिक संपदा बना हुआ है।
आज तिब्बत में यूरेनियम, लिथियम और अन्य खनिज संपदा प्रचुर मात्रा में है। वहां का जल भंडार भी चीन ने भविष्य की योजनाओं के लिए सुरक्षित कर रखा है। यह भी सच है कि विकास के मामले में चीन ने तिब्बत को जिस तरह बदला है, वह भारत की गति से कहीं आगे है।
परंतु इन राजनीतिक और सामरिक चर्चाओं के बीच जब कोई श्रद्धालु कैलाश की ओर कदम बढ़ाता है, तो उसे केवल आस्था का दीप मार्गदर्शन करता है।
यात्रा की शुरुआत
कोविड-19 महामारी के कारण वर्षों तक यह यात्रा स्थगित रही। 2025 पहला वर्ष है जब चीन ने भारतीय यात्रियों के लिए 650 वीज़ा परमिट जारी किए। 50-50 के समूहों में यात्रा आयोजित की गई, जिनके साथ विदेश मंत्रालय का एक रिटायर्ड अधिकारी बतौर लायजनिंग ऑफिसर, एक डॉक्टर और चार रसोइए साथ होते हैं।
हमारे समूह में भी यात्रा की तैयारी उत्साह से शुरू हुई। सबसे पहले गाजियाबाद स्थित कैलाश मानसरोवर भवन में ठहराव और मेडिकल परीक्षण की व्यवस्था केन्द्र सरकार द्वारा की गई। यह व्यवस्था इतनी उत्तम थी कि सभी यात्रियों ने दिल से आभार व्यक्त किया। यात्रा के लिए एक व्हाट्सएप ग्रुप बनाया गया, जिसमें आवश्यक सूचनाएं साझा की जाती थीं। कठोर चिकित्सा परीक्षण में कुछ यात्री अंतिम क्षणों में भी अयोग्य पाए गए और प्रतीक्षा सूची से अन्य शामिल किए गए।
फिर दिल्ली के प्रतिष्ठित अस्पताल में विस्तृत जांच हुई। उसके बाद आईटीबीपी (भारत-तिब्बत सीमा पुलिस) के प्रशिक्षण केंद्र में सेना के चिकित्सकों ने हमें और तैयार किया। उन्होंने ‘क्या करना है और क्या नहीं’ की सूची विस्तार से समझाई।
सिक्किम से चीन की सीमा तक
हमारा सफर बागडोगरा से गंगटोक और फिर नाथू-ला बॉर्डर तक पहुंचा। गंगटोक में होटल और सेना के गेस्ट हाउस में ठहरने का अवसर मिला। ऊंचाई के अनुकूल होने के लिए सुबह की सैर और अभ्यास भी कराया गया। नाथू-ला से पहले सभी यात्रियों को पुनः मेडिकल परीक्षण से गुजरना पड़ा। यह बार-बार की जांच डराती जरूर है, परंतु इसी से यात्रा सुरक्षित बनती है। भारतीय सीमा पर सेना ने भावभीनी विदाई दी। वहीं चीन की ओर से दूतावास अधिकारियों ने स्वागत किया। यहां से तिब्बत का कठिन, लेकिन अनुशासित सफर शुरू हुआ।
तिब्बत की ज़मीन पर
तिब्बत में प्रवेश करते ही नियमों की कठोरता स्पष्ट महसूस हुई। मोबाइल और दस्तावेजों की सघन जांच की गई। दलाई लामा या चीनी शासन के विरुद्ध कोई भी सामग्री सख्त वर्जित है।
यात्रा के दौरान होटल और बस की व्यवस्था चीन सरकार द्वारा की जाती है। परंतु पर्वतीय इलाकों के गेस्ट हाउसों की हालत अच्छी नहीं थी, विशेषकर शौचालयों की। भारतीय और नेपाली श्रद्धालुओं की भारी संख्या को देखते हुए चीन शायद जानबूझकर यहां सुविधाएं सीमित रखता है।
भाषा की समस्या भी सामने आई, हालांकि चीनी अधिकारी इशारों और टूटी-फूटी अंग्रेज़ी से उचित संवाद कर लेते थे। सौभाग्य से हमारे साथ भारतीय रसोइयों की टीम थी, जो हर सुबह तीन बजे उठकर नाश्ता और भोजन तैयार करती थी। यही हमारी सबसे बड़ी सहारा बनी।
कैलाश के साक्षात्कार में
अंततः वह क्षण आया जब हमने कैलाश पर्वत की परिक्रमा शुरू की। तीन दिनों की यह कठिन यात्रा जीवन का सबसे गहरा अनुभव साबित हुई। बिना पानी वाले खुले शौचालयों की कठिनाई से लेकर ऊंचाई पर सांस लेने की समस्या तक, हर चुनौती ने हमें परखा।
परंतु जब विशाल कैलाश हमारे सामने खड़ा था, तो सारी कठिनाइयां तुच्छ लगने लगीं। यह वही क्षण था जब आत्मा और परमात्मा का मिलन प्रतीत होता है। गौरीकुंड और मानसरोवर झील के दर्शन इस यात्रा की पराकाष्ठा थे। मानसरोवर के किनारे हमने पवित्र जल से स्नान किया। चीनी नियमों के अनुसार डुबकी नहीं लगा सकते थे, इसलिए बाल्टी से स्नान करना पड़ा। हमारे साथ आए विद्वान पंडितों ने यज्ञ-हवन किया। बरसात के बीच तंबू तानकर भी हमने मंत्रोच्चार जारी रखा। रात के अंतिम प्रहर में झील पर खड़े होकर हमने वह दिव्य आभास भी पाया, जैसे देवता स्वयं स्नान के लिए उतरते हों। यह अनुभव शब्दों से परे था।
वापसी और कृतज्ञता
तीन दिन की परिक्रमा और कैलाश पर्वत- मानसरोवर दर्शन के बाद जब हम बेस कैम्प लौटे तो मन हल्का और आत्मा समृद्ध महसूस कर रही थी। वापसी की यात्रा अपेक्षाकृत सहज लगी। भारतीय सीमा पर सेना ने गर्मजोशी से स्वागत किया। सिक्किम सरकार के विदाई समारोह और प्रमाण-पत्र वितरण ने हमें गौरव का अहसास कराया। हम सभी यात्री इस यात्रा को जीवन की सबसे बड़ी पूंजी मानते हैं। भारत सरकार, विदेश मंत्रालय, हमारे एलओ आलोक सूद, चिकित्सक डॉ. दीपक और पूरी रसोई टीम का हम हृदय से आभार व्यक्त करते हैं।
सबसे बढ़कर हम अपने सहयात्रियों के आभारी हैं, जिनके बीच सहयोग, प्रेम और विश्वास की मिसाल देखने को मिली। यही वह संदेश है जो इस यात्रा से हमें मिला- आस्था केवल ईश्वर तक पहुंचने का माध्यम नहीं, बल्कि मनुष्यों के बीच सेतु बनाने का भी मार्ग है।
कैलाश मानसरोवर की यात्रा हमें यह याद दिलाती है कि मनुष्य की उपलब्धियां चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हों, उसकी सीमाएं हैं। अंतिम सत्य वही है जो अदृश्य शक्ति के हाथ में है। यही शक्ति हमें विनम्र बनाती है और जीवन को उद्देश्य देती है। हम चाहते हैं कि हर भारतीय इस यात्रा के महत्व को समझे। श्रद्धा और नियमों का पालन करते हुए ही आस्था का सच्चा अर्थ मिलता है।
बाबा हरभजन सिंह मंदिर – सीमा का अदृश्य प्रहरी
नाथू-ला बॉर्डर के पास शेरटांग में स्थित यह मंदिर भारतीय सेना के लिए आस्था और श्रद्धा का प्रतीक है। बाबा हरभजन सिंह, जिन्हें ‘भारत का अदृश्य सैनिक’ भी कहा जाता है, वर्ष 1965 में सीमा पर ड्यूटी के दौरान लापता हो गए थे। उनका शरीर कभी नहीं मिला, लेकिन उनकी उपस्थिति आज भी सैनिकों को अनुभव होती है।
मान्यता है कि बाबा आज भी सीमा पर तैनात सैनिकों की रक्षा करते हैं। भारतीय सेना का हर जवान फ्रंट पर ड्यूटी के लिए जाने से पहले बाबा के दर्शन करता है। यह भी कहा जाता है कि यदि कोई ड्यूटी पर सो जाता है, तो बाबा स्वयं उसे झकझोरकर सावधान कर देते हैं।
बाबा के सम्मान में सेना ने उनका मंदिर, एक प्रतीकात्मक कार्यालय और विश्राम कक्ष भी बनाया है। यह सभी स्थान आज भी नियमित सेना की दिनचर्या के अनुसार खुलते और बंद होते हैं। आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि बाबा हरभजन सिंह को आज भी पेंशन और रिटायरमेंट लाभ दिए जाते हैं। इस आस्था से जुड़ा एक और विश्वास है कि बाबा के मंदिर से मिलने वाले ‘प्रसाद रूपी जल’ का इक्कीस दिन तक सेवन करने से कई बीमारियों में लाभ मिलता है। खास बात यह है कि बाबा की मान्यता केवल भारतीय सैनिकों तक सीमित नहीं है, बल्कि चीनी सेना भी उनके प्रभाव को मानती है।
इस तरह बाबा हरभजन सिंह का मंदिर केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि उन सैनिकों के लिए संबल है जो दिन-रात सीमा पर खड़े रहकर देश की रक्षा करते हैं।
शंभो… यही स्मरण हमें शक्ति भी देता है और मार्ग भी






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