विदेशी डिग्री, ग्लोबल करियर
कभी दुनिया भर के छात्र भारत की तक्षशिला और नालंदा जैसी विश्वविद्यालयों में शिक्षा पाने आते थे, और आज भारतीय छात्र उसी ज्ञान–यात्रा को विदेश जाकर आगे बढ़ा रहे हैं। 2025 तक 18 लाख से ज़्यादा भारतीय...

18 लाख से ज़्यादा भारतीय अब दुनिया की यूनिवर्सिटीज़ में
मधुलिका सिंह,
वरिष्ठ पत्रकार
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कभी भारत ग्लोबल एजुकेशन का हब हुआ करता था। तक्षशिला और नालंदा इस बात का प्रतीक हैं। यहां दुनियाभर के छात्र शिक्षा हासिल करने आते थे। ये इस बात का भी प्रतीक है कि भारत में शिक्षा का आकर्षण कभी सीमाओं तक सीमित नहीं रहा। जैसे पहले विदेशी छात्र भारत आते थे, अब भारतीय छात्र विदेश जाना पसंद कर रहे हैं अपनी-अपनी तक्षशिला और नालंदा की खोज में।
विदेश में पढ़ाई भी सिर्फ अमीरों का शौक़ माना जाता था, लेकिन आज यह भारत के हायर से लेकर लोअर मिडिल क्लास का सपना बन चुका है। हर साल लाखों भारतीय छात्र अपने सपनों को हक़ीक़त में बदलने के लिए बैग पैक करते हैं और किसी न किसी विदेशी यूनिवर्सिटी का रुख करते हैं। सवाल यह है कि यह सफर अब कितना आसान है, कितनी मुश्किलें हैं, और आखिर क्यों इतनी बड़ी संख्या में भारतीय छात्र अपना देश छोड़कर विदेश पढ़ने जाते हैं? आइए जानते हैं इस स्पेशल स्टोरी में-
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18 लाख से अधिक स्टूडेंट पहुंचे विदेश
2025 के ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि 18 लाख से अधिक भारतीय छात्र विदेश में पढ़ाई कर रहे हैं। यह संख्या 2013 के मुकाबले लगभग तीन गुना है। इसका मतलब यह है कि अब हर 10 अंतरराष्ट्रीय छात्रों में से एक भारतीय है। यह ट्रेंड भारत को दुनिया का सबसे बड़ा छात्र-भेजने वाला देश बना देता है।
वृद्धि की गति
2010: लगभग 7 लाख छात्र
2015: करीब 10 लाख छात्र
2020: 13 लाख छात्र
2025: 18 लाख छात्र
यानी हर पांच साल में भारतीय छात्रों की विदेश जाने की संख्या औसतन 30–35 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है।
यूएसए सबसे ज़्यादा पॉपुलर
विदेश जाकर पढ़ाई का सपना देखने वाले भारतीय छात्रों के लिए कुछ देशों ने खुद को हॉट डेस्टिनेशन के रूप में स्थापित किया है।
देश – भारतीय छात्रों की संख्या (2025) – खास वजह
यूएसए – 3,31,602 – STEM शिक्षा, रिसर्च अवसर, ओपीटी वर्क वीजा
कनाडा – 1,37,608 – पीआर पाथवे, सस्ती ट्यूशन, मल्टीकल्चरल माहौल
यूके – 92,355 – 2 साल का पीएसडब्ल्यू वीजा, एमबीए लोकप्रिय
ऑस्ट्रेलिया – 1,18,109 – हाई-क्वालिटी एजुकेशन, पीआर अवसर
जर्मनी – 49,500- ट्यूशन-फ्री/कम फीस, इंजीनियरिंग और रिसर्च
जॉर्जिया – 20,000 – सस्ता एमबीबीएस, आसान एडमिशन प्रोसेस
उज्बेकिस्तान -15,000 किफायती मेडिकल शिक्षा
STEM कोर्स हैं सबसे डिमांड में
भारतीय छात्रों का झुकाव अब भी STEM की ओर सबसे अधिक है। आंकड़ों के अनुसार:
मेथ्स व कम्प्यूटर साइंस – 43 प्रतिशत
इंजीनियरिंग– 25 प्रतिशत
बिजनेस एंड मैनेजमेंट– 11 प्रतिशत
एमबीबीएस – रूस, जॉर्जिया, उज्बेकिस्तान में सबसे डिमांडिंग
डिजाइन, आर्ट और हॉस्पिटेलिटी – यूरोप और ऑस्ट्रेलिया में लोकप्रिय
STEM की लोकप्रियता का कारण है कि यह ग्लोबल जॉब मार्केट में सबसे ज़्यादा डिमांड वाला क्षेत्र है। वहीं मेडिकल शिक्षा भारत की सीमित सीटों और ऊंची फीस की वजह से विदेश में अपेक्षाकृत आसान और सस्ती मानी जाती है।
भारतीय छात्र क्यों जाना चाहते हैं विदेश?
1. बेहतर करियर और इंटरनेशनल एक्सपोज़र
– विदेश की डिग्री का मतलब है ग्लोबल कंपनियों में जॉब की बेहतर संभावना।
2. सीटों की कमी और प्रतियोगिता
– भारत में टॉप कॉलेजों में सीटें सीमित हैं, जिससे छात्रों को वैकल्पिक रास्ता ढूंढना पड़ता है।
3. बेहतर रिसर्च और टेक्नोलॉजी
– विदेशी यूनिवर्सिटी में एडवांस लैब्स, इंटरनेशनल रिसर्च प्रोजेक्ट्स और बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर मिलता है।
4. वर्क वीजा और PR के आकर्षक रास्ते
– कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और यूके जैसे देश पीआर (परमानेंट रेसिडेंसी) और वर्क वीज़ा की आसान पॉलिसी देते हैं।
5. संस्कृति और नेटवर्किंग
– विदेश पढ़ाई का मतलब है मल्टीकल्चरल माहौल और ग्लोबल नेटवर्किंग।
पीआर आकर्षित करता है
एक्सपर्ट्स के अनुसार, पीआर (परमानेंट रेजिडेंसी) यानी किसी देश में स्थायी निवास का अधिकार। छात्र पढ़ाई के बाद वर्क वीज़ा पर नौकरी करते हैं और फिर पीआर के लिए आवेदन करते हैं। पीआर मिलने पर लंबे समय तक उस देश में रहने का अधिकार मिलता है। नौकरी, हेल्थकेयर और एजुकेशन जैसी सुविधाएं नागरिकों जैसी मिलती हैं। फैमिली को भी बुलाने का विकल्प होता है। नागरिकता (सिटीजनशिप) का रास्ता खुलता है। इसलिए कनाडा और ऑस्ट्रेलिया भारतीय छात्रों के लिए बेहद आकर्षक गंतव्य हैं।
OPT और PSW वीज़ा: छात्रों की सबसे बड़ी ताक़त
OPT यानी (Optional Practical Training – USA)
इसमें पढ़ाई पूरी करने के बाद 12 महीने तक काम करने का अवसर, STEM छात्रों के लिए 24 महीने से ज्यादा का एक्सटेंशन, यानी कुल 3 साल तक काम की अनुमति और अमेरिकी कंपनियों में करियर की शुरुआत का बेहतरीन मौका माना जाता है।
PSW यानी (Post Study Work Visa – UK & Australia)
यूके में डिग्री के बाद 2 साल (PhD के लिए 3 साल) तक काम करने का मौका और ऑस्ट्रेलिया में टेम्पररी ग्रेजुएट वीज़ा से 2–4 साल तक काम की अनुमति और अक्सर यह परमानेंट रेसिडेंसी (PR) की ओर पहला कदम बनता है।
खर्च का गणित: कहां कितना?
USA: 40,000 – 60,000 डॉलर प्रति वर्ष (35–50 लाख रु. तक)
कनाडा: 30 – 40 लाख रु. प्रति वर्ष
यूके : 21 – 42 लाख रु.(शहर और यूनिवर्सिटी पर निर्भर)
ऑस्ट्रेलिया: 21 – 32 लाख रु. प्रति वर्ष
जर्मनी: 11 – 12 लाख रु.(ट्यूशन लगभग शून्य, केवल रहने का खर्च)
जॉर्जिया/उज्बेकिस्तान (MBBS): 6 – 10 लाख रु. प्रति वर्ष
कितना आसान और कितना मुश्किल?
आसान पहलू: स्कॉलरशिप और एजुकेशन लोन – आर्थिक बोझ हल्का।
एजुकेशन कंसल्टेंसी और ग्लोबल टाई-अप्स – एडमिशन आसान।
वर्क परमिट और PR पॉलिसी – करियर स्थिर।
मुश्किल पहलू:
उच्च खर्च – यूएस में मास्टर्स – 40,000 से 60,000 डॉलर
वीज़ा रिजेक्शन – कड़े नियमों और पॉलिसी बदलाव की चुनौती।
नीतिगत अस्थिरता – जैसे अमेरिका में ट्रम्प प्रशासन के दौरान।
मानसिक और सांस्कृतिक चुनौतियां – भाषा, मौसम और अकेलेपन की समस्या।
कुल मिलाकर विदेश में पढ़ाई भारतीय युवाओं के लिए अब सिर्फ़ डिग्री हासिल करने का रास्ता नहीं, बल्कि जीवन बदलने वाली यात्रा बन चुकी है। यह सफ़र उतना ही चुनौतीपूर्ण है, जितना आकर्षक। पैसे, वीज़ा और पॉलिसी जैसी मुश्किलें हैं, लेकिन करियर और जीवन के नए अवसर इस राह को अब भी सबसे बड़ा सपना बनाते हैं।






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