महाकुंभ से तय होगा राजनीति का नया सूर्य …
इस बार फिर कुंभ है संघ और सनातनी समुदाय एक बार फिर प्रधानमंत्री के लिए मोदी के बाद कौन पर मंथन कर रहा...

2013 में प्रयागराज में ही मोदी के चेहरे पर मोहर लगी थी अब महाकुंभ में राजनीतिक मंथन में संघ और संत समाज धर्म संसद में मोदी के विकल्प के नाम पर करेगा मंथन
योगी बनेंगे चेहरा
पंकज मुकाति
वरिष्ठ पत्रकार, राजनितिक विश्लेषक
महाकुंभ का प्रयागराज में आगाज़ हो गया है। 2013 में इसी जगह से कुम्भ में प्रधानमंत्री के लिए नरेंद्र मोदी के नाम पर मुहर लगी थी। इस बार फिर कुंभ है संघ और सनातनी समुदाय एक बार फिर प्रधानमंत्री के लिए मोदी के बाद कौन पर मंथन कर रहा है। दोनों कुम्भ के बीच बदला है तो सिर्फ एक बात इलाहबाद का नाम प्रयागराज हुआ और कुम्भ इस बार महाकुम्भ के रूप में है। 144 साल बाद बने इस योग को वो योग बताया जा रहा है जिसमे समुद्र मंथन से अमृत की प्राप्ति हुई थी। इस भारतीय राजनीति के समुद्र में से एक नया मोती सनातनी मोती निकालने का मंथन होगा। संघ और संतों की निगाह में उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मोदी का सबसे बेहतर विकल्प हो सकते है। महाकुंभ के लिए योगी की महा तैयारियों से भी इसकी झलक देखने को मिल रही है।
2013 के कुंभ में भाजपा के प्रधानमंत्री के लिए नरेंद्र मोदी के नाम पर मुहर लगी थी। नरेंद्र मोदी सौ फीसदी उम्मीदों पर खरे उतरे। वे आज भी सबसे लोकप्रिय नेता बने हुए हैं। उनका जादू तीसरे कार्यकाल के बावजूद बरक़रार है। पर 74 की उम्र पार कर चुके मोदी के विकल्प की तलाश शुरू हो गई है। सबसे कठिन है मोदी जैसा करिश्माई नेता तलाशना। सारी निगाहें इस मंथन में बार बार भगवाधारी योगी आदित्यनाथ पर ही ठहर रही है। हालाँकि अभी चुनाव में बहुत वक्त है फिर भी संघ मंथन और माहौल बहुत पहले से बनाना शुरू कर देता है। ये संघ को करीब से जानने वाले बेहतर ढंग से जानते हैं। संघ अचानक वाला कोई काम करता ही नहीं।
तमाम मीडिया रिपोर्ट्स भी इस और इशारा करती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रांत स्तर के एक पदाधिकारी ने कुछ दिन पहले स्पष्ट तौर पर कहा था कि प्रयागराज में होने वाले महाकुंभ मेंभाजपा के अगले प्रधानमंत्री के चेहरे के नाम का प्रस्ताव आ सकता है। योगी आदित्यनाथ के नाम पर सभी की रजामंदी है। अभी लोकसभा चुनाव दूर हैं, इसलिए सीधे तौर पर उनके नाम का ऐलान नहीं होगा। पर माहौल यही से बनेगा या बनना शुरू हो जाएगा।
बारह साल पहले प्रयागराज में ही संघ ने नरेंद्र मोदी का नाम संतों के सामने रखा था। उनके समर्थन के बाद नरेंद्र मोदी को भाजपा का प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनाया गया। संघ और उसके तमाम संगठन इस बात के संकेत दे रहे हैं कि योगी के नाम पर सहमति है। लोकसभा चुनाव हों या विधानसभा चुनाव, योगी आदित्यनाथ का नाम स्टार प्रचारकों की में शामिल है। वे राजस्थान, मध्यप्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड से लेकर साउथ में तमिलनाडु और तेलंगाना तक चुनावी रैलियां कर चुके हैं। एक तरह से वे पूरे भारत का जाना पहचाना चेहरा बन चुके है या पार्टी ने पूरे सुनियोजित तरीके से योगी को हिंदुस्तान का चेहरा बना दिया है। याद होगा कि 2010 से ही मोदी के नाम पर पूरे देश में प्रचार होना शुरू हो गया था। संघ ने रणनीति के साथ ऐसा माहौल बनाया था कि मोदी पूरे भारत और हिंदुत्व का चेहरा बन चुके थी। उनके नाम की घोषणा का पूरे देश ने स्वागत किया था।
मोदी भी उस वक्त गुजरात के मुख्यमंत्री थे। आज योगी उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री है। उत्तरप्रदेश देश में सरकार बनवाने वाला राज्य है। अयोध्या का मंदिर भी यही हैं और मथुरा, काशी भी राज्य में हैं। खुद मोदी ने अपना लोकसभा चुनाव इसी राज्य में आकर लड़ा था। वे गुजरात से यही उत्तरप्रदेश के वाराणसी से चुनाव लड़े। ऐसे में योगी तो उत्तरप्रदेश से ही हैं उनकी सम्भावना और मजबूत होती है।
नवंबर में हुए महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में योगी आदित्यनाथ के ‘बंटेंगे तो कटेंगे’ नारे का असर भी दिखा। यहां उन्होंने 11 रैलियां कर 17 कैंडिडेट के लिए वोट मांगे थे। इनमें 15 चुनाव जीत गए। योगी आदित्यनाथ ने ये नारा यूपी में 9 सीटों पर हुए उपचुनाव के दौरान बार-बार दोहराया। इसके बाद यही नारा महाराष्ट्र में इस्तेमाल हुआ। PM मोदी ने 5 अक्टूबर को ठाणे और वाशिम में हुई रैलियों में अलग ढंग से यही बात कही।
संघ के एक वर्ग का मानना है कि ‘बंटेंगे तो कटेंगे’ का नारा भले योगी आदित्यनाथ के मुंह से निकला हो, लेकिन इसके पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है। ये संघ की शाखाओं में गाया जाने वाला बहुत पुराना गीत है। इसे आजादी के समय से गाया जाता है। ये गीत था-
‘इतिहास कहता है कि हिंदू भाव को जब-जब भूले,
आई विपदा महान, भाई छूटे, धरती खोई, मिटे धर्म संस्थान’
संघ की रणनीति बहुत स्पष्ट है कुंभ में इस बार हिंदू एकता की चर्चा होगी । बंटेंगे तो कटेंगे योगी से बुलवाने का मकसद ही उनको स्थापित करना था। अब हिन्दू एकता और खांटी हिंदूवादी चेहरे का माहौल बन गया है। निश्चित ही योगी के नाम पर मोदी के नाम जैसे मुहर इस वक्त नहीं लगेगी क्योंकि ‘तब कुंभ के अगले साल लोकसभा चुनाव थे। इसलिए मोदी के चेहरे पर पक्की मुहर के लिए उस आयोजन से बेहतर कोई और वक्त नहीं हो सकता था।’ ‘इतने बड़े स्तर पर हिंदू समाज के संगठन और साधु-संतों का जमावड़ा फिर कहां मिलता। इस बार कुंभ और चुनाव के बीच 4 साल का फासला है। नाम पर तो चर्चा होगी, लेकिन सभी संगठनों के बीच एक प्रस्ताव की तरह इसे लाया जाएगा।’
संघ की सूची में सिर्फ एक और एक ही नाम है योगी आदित्यनाथ। प्रयागराज हिन्दू संगठन से जुड़े नेता योगी आदित्यनाथ का नाम और भी मजबूती से लेते हैं। वे कहते हैं, संघ किसी को ऐसे ही आगे नहीं लाता। उसके लिए जमीन तैयार होती है। जमीन पर खाद-पानी दिया जाता है। पहले छोटा सा अंकुर फूटता है और फिर पौधा। यही काम करने का तरीका है। योगी ही वो नाम है इसके लिए पिछले एक साल से राजनीतिक घटनाक्रम और कुंभ को मिल रहे आशीर्वाद से समझना होगा।
अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष और कुंभ मेले के आयोजकों में शामिल रविंद्र पुरी ने मीडिया से कहा योगी जी हिंदू धर्म और सनातन के सबसे मजबूत स्तंभ हैं। वे कतार में हैं। उनकी दावेदारी मजबूत है। कतार में तो अमित शाह का नाम भी है, लेकिन अभी मोदी जी बहुत सक्रिय हैं। किसी प्रधानमंत्री के पद पर रहते दूसरे उम्मीदवार की चर्चा ठीक नहीं। फिर भी हम भविष्य पर चर्चा करेंगे बस अंतर ये होगा कि 2013 की तरह मोदी-मोदी जैसे नारे नहीं लगेंगे। अभी बहुत वक्त है।
कुंभ में ऐसे आया था मोदी के नाम का प्रस्ताव
‘2012 से ही नरेंद्र मोदी के नाम पर अशोक सिंघल संघ प्रमुख मोहन भागवत से मुहर लगवाना चाहते थे। मोहन भागवत उनके नाम पर पूरी तरह आश्वस्त नहीं थे।’ बहुत कोशिशों के बाद अशोक सिंघल ने मोहन भागवत को नरेंद्र मोदी के नाम पर राजी कर लिया। उसके बाद कुंभ में धर्म संसद हुई। उसमें मोहन भागवत ने हिंदू और संत समाज के बीच पहली बार नरेंद्र मोदी का नाम लिया था। ‘धर्म संसद का आखिरी दिन था। तारीख 5 फरवरी, 2013 थी। करीब 10 हजार दंडी स्वामी मौजूद थे। सभी ने चिमटा बजाकर मोदी का नाम लिया। उनके नाम के नारे लगाए। कहा कि हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी होंगे। फिर यही नारे जनता के बीच भी लगे। ये जनता संतों की भक्त थी।
मोदी के नाम को आगे लाने का पूरा श्रेय अशोक सिंघल को ही जाता है। तोगड़िया जी इस विचार से पूरी तरह सहमत नहीं थे। हालांकि उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कभी असहमति नही जताई। धीरे-धीरे वे संगठन के कामों से दूर हो गए और अंतरराष्ट्रीय हिंदू परिषद नाम का नया संगठन बनाया। सिंघल जी और तोगड़िया जी के बीच वैसे भी कुछ बातों और विचारों पर भिन्नता थी। सिंघल जी ने भी इसे कभी सामने नहीं आने दिया।’
आडवाणी रेस में आगे थे, लेकिन संतों ने मोदी को चुना
मोदी उस वक्त गुजरात के मुख्यमंत्री थे। रविंद्र पुरी कहते हैं, ‘संत समाज ने 2010 से ही अलग-अलग मंचों पर नरेंद्र मोदी का नाम लेना शुरू कर दिया था। कुंभ की धर्म संसद में तो उनके नाम पर मुहर लगी थी। दावेदारों में लालकृष्ण आडवाणी बहुत आगे थे, लेकिन संत समाज मानता था कि नरेंद्र मोदी पक्के सनातनी हैं। सनातन धर्म की रक्षा वही कर सकते हैं। इसलिए संतों ने एकमत से उन्हें चुना।‘इस प्रस्ताव पर संघ प्रमुख मोहन भागवत ने सीधे कुछ नहीं कहा। इतना जरूर कहा कि संतों की वाणी ही देववाणी है। तब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे राजनाथ सिंह ने कहा कि संतों की भावना हम तक आई है। इससे अलग कोई फैसला नहीं लिया जा सकता। मैं ये प्रस्ताव ऊपर तक ले जाऊंगा।






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