दिल पर भारी घर का तनाव
राजस्थान जैसे पारम्परिक समाज में परिवार केवल एक सामाजिक इकाई नहीं, बल्कि सुरक्षा और पहचान का मूल स्तंभ रहा है। लेकिन बदलते समय और आधुनिक सोच के चलते इस संरचना में बदलाव आया है। संयुक्त परिवारों की...

‘जब तक अहंकार टूटता है, तब तक अक्सर सबकुछ बिखर चुका होता है…’
डाॅ. आर.के. शर्मा,
मनोचिकित्सक
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राजस्थान जैसे पारम्परिक समाज में परिवार केवल एक सामाजिक इकाई नहीं, बल्कि सुरक्षा और पहचान का मूल स्तंभ रहा है। लेकिन बदलते समय और आधुनिक सोच के चलते इस संरचना में बदलाव आया है। संयुक्त परिवारों की जगह छोटे, न्यूक्लियर परिवारों ने ले ली है, फिर भी पारम्परिक नियम और जिम्मेदारियां अब भी गहरे जड़ें जमा रही हैं। यही जड़ें अक्सर सास-बहू के बीच तनाव का कारण बनती हैं और सबसे बड़ा बोझ पति/बेटा पर आता है। कई मामलों में देखा गया है कि लगातार तनावपूर्ण वातावरण में जीने वाला व्यक्ति मानसिक और शारीरिक रूप से धीरे-धीरे टूटता है। कई बार यह इतना गंभीर हो जाता है कि सामान्य कार्यों में भी असहनीय दबाव बन जाता है, जिससे डिप्रेशन, एंग्जाइटी और हाई ब्लड प्रेशर जैसी समस्याओं के साथ अचानक हृदयाघात का खतरा भी बढ़ जाता है।
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घर की जंग में फंसा आदमी
पति का दिन अक्सर दो मोर्चों पर लड़ाई लड़ते हुए गुजरता है। पहला कार्यस्थल का दबाव और दूसरा घर का तनावपूर्ण माहौल। वह मां को सम्मान देना चाहता है और पत्नी को समझाने की कोशिश करता है, लेकिन दोनों पक्ष अहंकार और जिद में डटे रहने पर उसका मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है। लंबे समय तक ऐसा होने पर डिप्रेशन, हाई ब्लड प्रेशर और एंग्जाइटी डिसऑर्डर जैसी समस्याएं जन्म लेती हैं। सास और बहू के बीच संघर्ष की जड़ अक्सर अहंकार होती है। आधुनिक और स्वतंत्र माहौल में पली-बढ़ी बहू अक्सर पारम्परिक नियमों और जिम्मेदारियों में खुद को असहज महसूस करती है। वह स्वतंत्र होना चाहती है और अपनी राय रखने में जिद करती है। वहीं, परिवार की मुखिया रही सास अपने सम्मान और सत्ता को खोना नहीं चाहती।
जब ‘समानता’ बन जाए ‘अहंकार’ की वजह
आज की बहुएं आर्थिक और सामाजिक रूप से पुरुषों के बराबर खड़ी हैं, लेकिन यही बराबरी कई बार अहंकार और शक्ति-संघर्ष में बदल जाती है। महिलाएं जहां वित्तीय और कार्यक्षेत्र में मजबूत हो रही हैं, वहीं कई बार यह ‘समानता’ अनजाने में पुरुष और सास दोनों के साथ टकराव का कारण बन जाती है। कई पति अपनी पत्नी की सफलता पर गर्व महसूस करने के बजाय अनजाने में ही हीनभावना और ईर्ष्या अनुभव करने लगते हैं। वहीं सास को भी लगता है कि उसका बेटा बहू से कमतर हो गया है, जिससे घर में तनाव और बढ़ जाता है। अधिकतर मामले में पति मानसिक संतुलन बनाए रखने के लिए बीच में फंस जाता है। घर में बने तनाव और अहंकार से पुरुष में डिप्रेशन और हार्ट अटैक का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। महिलाएं चाहे कितनी भी आधुनिक क्यों न हों, पारिवारिक संवाद और समझौते की क्षमता बनाए रखना जरूरी है। लंबे समय तक पारिवारिक तनाव में जीना सिर्फ मानसिक नहीं, बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य के लिए भी खतरनाक है। हार्मोनल असंतुलन, नींद की कमी और लगातार चिंता से हृदय पर दबाव बढ़ता है, जो कभी-कभी अचानक हृदयाघात का कारण बन सकता है।
सीधे हृदय व मस्तिष्क पर असर
तनाव केवल मानसिक समस्या नहीं है। यह शरीर में हार्मोनल असंतुलन पैदा करता है, जो सीधे हृदय और मस्तिष्क पर असर डालता है। लंबे समय तक पारिवारिक तनाव झेलने वाले पुरुषों में डिप्रेशन और हार्ट अटैक का खतरा सामान्य व्यक्तियों की तुलना में 50 प्रतिशत अधिक होता है।
एक मौत, जो कई जिंदगियां बिखेर देती है
– पति की असमय मौत के बाद परिवार पूरी तरह बिखर जाता है।
– बच्चे मानसिक आघात झेलते हैं और अपराधबोध में जीने लगते हैं।
– विधवा पत्नी और वृद्ध मां आर्थिक-सामाजिक संकट में फंस जाती हैं।
– परिवार की नींव हिल जाती है।
हृदय रोग और तनाव पर चौंकाने वाले तथ्य :
– 30 से 45 वर्ष के पुरुषों में हृदयाघात के मामलों में 20-25 प्रतिशत वृद्धि (पिछले 5 सालों में)
– इंडियन हार्ट एसोसिएशन के अनुसार, भारतीय पुरुषों में 50 प्रतिशत हृदयाघात 50 वर्ष से पहले, और 25 प्रतिशत हृदयाघात 40 वर्ष से पहले हो रहे हैं
– जयपुर जिले के अध्ययन में सामने आया कि 18+ आयु वर्ग के 39 प्रतिशत युवाओं को हाई ब्लड प्रेशर है और 5 प्रतिशत स्पष्ट रूप से हाइपरसेंसेटिव पाए गए।
– पश्चिमी देशों की तुलना में भारत में यह दर कहीं अधिक चिंताजनक।
इस चक्रव्यूह से बाहर कैसे निकलें?
खुला संवाद : सास और बहू दोनों को बातचीत से समाधान निकालना चाहिए।
फैमिली काउंसलिंग : शहरों में यह सुविधा मौजूद है, ग्रामीण क्षेत्रों में सरकार को बढ़ावा देना चाहिए।
पति का बोझ कम करना : उसे अकेला समाधानकर्ता मानना गलत है।
अहंकार त्याग : जब तक परिवार के सदस्य अपने अहंकार से ऊपर नहीं उठेंगे, घर का माहौल शांत नहीं हो पाएगा।






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