भारतीय संविधान: निर्माण की यशस्वी गाथा
यह आलेख भारतीय संविधान के निर्माण की ऐतिहासिक और प्रेरणादायक यात्रा का विस्तृत ब्यौरा प्रस्तुत करता है। यह बताता है कि कैसे भारत की आजादी के बाद एक स्वतंत्र, लोकतांत्रिक और समावेशी राष्ट्र की नींव...

प्रोफेसर (डॉ.) एम.के. भंडारी,
वरिष्ठ आचार्य, विधि तथा तकनीकी शोध एवं शिक्षा विशेषज्ञ
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लेख की शुरुआत पंडित जवाहरलाल नेहरू के प्रसिद्ध “ट्रिस्ट विद डेस्टिनी” (भाग्य के साथ गठबंधन) संबोधन से होती है, जो उन्होंने 14-15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि को संविधान सभा में दिया था। इस संबोधन में उन्होंने भारत को पुराने युग से नए युग में कदम रखने वाला बताया और सभी से देश, उसके लोगों और मानवता की सेवा का संकल्प लेने का आह्वान किया। उन्होंने यह भी कहा कि भारत का भविष्य संघर्ष का है, जिसमें गरीबी, अज्ञानता और असमानता को खत्म करना है।
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संविधान सभा का गठन और कार्यप्रणाली
संविधान निर्माण की प्रक्रिया की शुरुआत कैबिनेट मिशन योजना (1946) के तहत हुई, जिसके द्वारा संविधान सभा का गठन किया गया। इस सभा में 389 सदस्य थे, जिनमें से 292 ब्रिटिश प्रांतों से, 93 रियासतों से और 4 केंद्र शासित प्रदेशों से थे। भारत के विभाजन के बाद सदस्यों की संख्या 299 रह गई।
संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर, 1946 को हुई, जिसमें डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा को अस्थायी अध्यक्ष चुना गया। इसके दो दिन बाद, 11 दिसंबर, 1946 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद को स्थायी अध्यक्ष बनाया गया। सभा ने विश्व के कई प्रमुख संविधानों का गहन अध्ययन किया और 2 वर्ष, 11 माह और 18 दिन में संविधान का निर्माण पूरा किया। इस दौरान कुल 11 सत्र और 165 बैठकें हुईं।
प्रारूप समिति और डॉ. बी.आर. अंबेडकर की भूमिका
संविधान निर्माण में प्रारूप समिति (Drafting Committee) की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण थी, जिसके अध्यक्ष डॉ. बी.आर. अम्बेडकर थे। उन्हें भारतीय संविधान का प्रमुख शिल्पी माना जाता है। समिति ने विभिन्न उप-समितियों की सिफारिशों और जनता के सुझावों को ध्यान में रखते हुए संविधान का अंतिम प्रारूप तैयार किया।
इस प्रक्रिया के दौरान कई चुनौतियां थीं, जिनमें भारत की विशाल विविधता, विभाजन और सांप्रदायिक हिंसा शामिल थी। इन चुनौतियों के बावजूद, संविधान सभा ने एक ऐसा ढांचा तैयार किया जो सभी वर्गों के हितों को प्रतिनिधित्व दे सके।
रोचक तथ्य और संविधान की विशिष्टताएं
आलेख में संविधान निर्माण से जुड़े कुछ रोचक तथ्यों का भी उल्लेख है:
हिंदी राजभाषा पर बहस (1949) : संविधान सभा में हिंदी को राजभाषा बनाने पर तीखी बहस हुई, जिसके बाद हिंदी को राजभाषा और अंग्रेजी को सहायक भाषा के रूप में जारी रखा गया।
संशोधन और बहस : मूल प्रारूप पर 2,473 संशोधनों पर गहन बहस हुई, जो यह दर्शाता है कि यह एक अत्यंत लोकतांत्रिक प्रक्रिया थी।
हस्तलिखित संविधान : प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की इच्छा पर यह संविधान हस्तलिखित बनाया गया। इसका लेखन प्रेम बिहारी नारायण रायजादा ने किया था। उन्होंने 251 पृष्ठों को इटैलिक शैली में लिखा, जिसमें 432 पेन-निब्स का इस्तेमाल हुआ।
कलात्मक सजावट : संविधान के हर पृष्ठ की सीमाओं को शांति निकेतन के प्रसिद्ध चित्रकार नंदलाल बोस और उनके शिष्यों ने सजाया। इसमें मोहनजो-दारो, महाभारत, रामायण और अजंता-एलोरा जैसी भारतीय संस्कृति की छवियां शामिल हैं।
संरक्षण : मूल कॉपी का वजन 3.75 किलोग्राम है और इसे हीलियम से भरे विशेष संदूक में संसद पुस्तकालय में सुरक्षित रखा गया है।
अनुच्छेद और अनुसूचियां : मूल संविधान (26 नवंबर 1949) में 395 अनुच्छेद और 8 अनुसूचियां थीं। वर्तमान में, सितंबर 2025 तक, इसमें 448 अनुच्छेद और 12 अनुसूचियां हैं, और 106 संशोधन हो चुके हैं।
उद्देश्य प्रस्ताव
लेख में पंडित नेहरू द्वारा 13 दिसंबर 1946 को प्रस्तुत किए गए उद्देश्य प्रस्ताव का भी हिंदी अनुवाद दिया गया है। यह प्रस्ताव संविधान की मूल भावना को दर्शाता है, जिसमें भारत को एक स्वतंत्र संप्रभु गणराज्य बनाना, सभी नागरिकों को न्याय, समानता और स्वतंत्रता की गारंटी देना, अल्पसंख्यकों के अधिकारों की सुरक्षा करना, और भारत को विश्व में एक सम्मानित स्थान दिलाना शामिल था।
आलेख का सार यह है कि भारतीय संविधान का निर्माण केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि भारत की एकता, विविधता और लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रतीक है। यह एक ऐसा दस्तावेज है जो समानता, स्वतंत्रता और न्याय के सिद्धांतों पर आधारित एक ऐसे भारत के सपने को साकार करता है जो आज विश्व भर में लोकतंत्र का एक आदर्श मॉडल है। यह कहानी हमें यह भी सिखाती है कि एकता और सहयोग से बड़ी से बड़ी चुनौतियों का समाधान किया जा सकता है।






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