जलाओ दीप मन में भी
दिवाली केवल रोशनी और परम्परा का पर्व नहीं, बल्कि मन और रिश्तों को उजाला देने का अवसर है। सफाई हमें भीतर हल्का करती है, दीपक उम्मीद जगाते हैं, प्रकृति से जुड़ाव जीवन की सच्ची समृद्धि है और संवेदना का...

आशा रामावत,
वरिष्ठ शिक्षिका एवं लेखिका
दिवाली आते ही मन अपने आप उजाले की तलाश में हो जाता है। घर-आंगन में सफाई और सजावट शुरू होते ही लगता है कि धूल केवल दीवारों से नहीं, बल्कि मन के भीतर जमा बोझ भी साफ़ हो रहा है। बचपन में मां की हिदायत कानों में गूंजती थी, “हर कोना चमकना चाहिए, तभी लक्ष्मी आएंगी।” उस समय यह केवल मेहनत लगती थी, पर अब समझ आता है कि सफाई केवल बाहरी नहीं, भीतरी भी होती है। जब मकड़ी के जाले और धूल हटती है, तो तनाव और चिंता के जाले भी टूट जाते हैं। यही शायद त्योहारों की असली ताकत है, हमें भीतर तक हल्का और उजला बनाने की। दीपक जलाने की परम्परा मेरे लिए हमेशा आत्मीय रही है। अंधेरे कमरे में एक छोटा-सा दीपक टिमटिमाता है और लगता है कि अंधकार कितना भी गहरा क्यों न हो, उम्मीद की लौ कभी हारती नहीं। यही दीपावली का सबसे बड़ा संदेश है, एक किरण ही काफ़ी है अंधकार से लड़ने को। हर दीपक मुझे कहता है कि हम अपने भीतर भी एक दीप जला सकते हैं, करुणा का, विश्वास का और संवेदना का।
अक्टूबर माह का पूरा अंक देखें..
https://heyzine.com/flip-book/09dd11dd07.html
“दीपक की लौ कहती है
हार मत मानो,
छोटा सा उजाला भी
अंधेरे को मात दे सकता है।”
जब हम दिवाली की परम्पराओं पर ध्यान देते हैं, तो पता चलता है कि हर रिवाज़ केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है। दीयों की रोशनी, घर की सफाई, गोवर्धन पूजा और उपहार देने जैसी क्रियाएं विज्ञान और जीवन के गहरे संदेशों से जुड़ी हैं। उदाहरण के लिए, दीपक की लौ केवल घर की चौखट सजाने के लिए नहीं, बल्कि वॉर्म लाइट के रूप में तनाव कम करने, नींद सुधारने और मानसिक शांति बढ़ाने का माध्यम है। घर की सफाई रोगाणुओं और कीटाणुओं को दूर करती है, जिससे बीमारियों का खतरा घटता है। गोवर्धन पूजा के पीछे पर्यावरण और पशुधन संरक्षण की सीख है। अन्नकूट से हमें सामूहिकता और फूड वेस्टेज कम करने का संदेश मिलता है। यही कारण है कि हमारे पूर्वज धार्मिक कर्मकांड के माध्यम से जीवन विज्ञान को भी समाहित करते थे। दिवाली महज पर्व नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, समाज और मनोविज्ञान का एक जागरूकता का त्योहार है।
बचपन में अन्नकूट और गोवर्धन पूजा का आनंद कुछ और ही था। गांव की चौपाल पर सब मिलकर प्रसाद बांटते थे। तब हमें पकवानों का स्वाद भाता था, पर आज लगता है कि यह परम्परा हमें धरती और अन्न से जोड़ती है। असली समृद्धि सोने-चांदी में नहीं, मिट्टी, पानी और अनाज में है। गाय, खेत और प्रकृति के बिना इंसान अधूरा है। दिवाली के इन उत्सवों का यही उद्देश्य रहा है, प्रकृति का सम्मान और सामूहिकता का भाव। त्योहार जब पटाखों और शोरगुल से घिर जाते हैं तो मन उदास हो उठता है। मैंने कई बार देखा है, तेज़ धमाकों से बुज़ुर्ग कांप जाते हैं, छोटे बच्चे डर से रो पड़ते हैं और पालतू जानवर सहम जाते हैं। तब लगता है कि हमारी खुशी किसी और की पीड़ा का कारण न बने। दिवाली तभी सुंदर है जब उसमें बच्चों की खिलखिलाहट गूंजे, न कि धुएं और धमाकों का डर।
“रोशनी हो दीपों की,
धुआं न हो पटाखों का,
खुशबू हो रिश्तों की,
शोर न हो धमाकों का।”
तोहफ़ों की बात आती है तो मेरा मन आज भी दादी की बनाई मिठाई पर ठहर जाता है। उसमें पैकिंग नहीं थी, लेकिन उसमें अपनापन भरा था। आज जब दिखावे से भरे गिफ्ट-हैम्पर देखते हैं तो लगता है कि असली उपहार वही है, जिसमें दिल की गर्माहट हो। दिवाली सिर्फ़ वस्तुएं बांटने का पर्व नहीं है, यह स्नेह और संवेदना बांटने का अवसर है।
अक्सर लगता है कि हमने त्योहारों का असली अर्थ खो दिया है। पूजा-पाठ और दिखावे की भागदौड़ में हम भूल जाते हैं कि दिवाली हमें भीतर की अंधकारमयी प्रवृत्तियों से लड़ना सिखाती है। यह त्योहार हमें कहता है कि घर की दीवारें ही नहीं, रिश्ते भी रोशनी से सजाओ। ग़लतफ़हमियां मिटाओ, मन का अंधेरा उजाले में बदलो, यही असली पूजा है।
आज समाज और परिवार को बदलते देख मेरा मन कहता है कि दिवाली केवल बिजली की लड़ियां सजाने का नाम नहीं। यह दिलों को जोड़ने का अवसर है, टूटे रिश्तों को संभालने का अवसर है और आत्मा को स्वच्छ करने का अवसर है। हर दीपक हमें याद दिलाता है कि अंधकार चाहे कितना भी गहरा हो, एक छोटी-सी लौ भी उम्मीद जगा सकती है। तो क्यों न इस बार हम अपने भीतर भी वह लौ जलाएं- करुणा की, संवेदना की और जिम्मेदारी की। यही दिवाली का सच्चा अर्थ है।
“जलाओ दीप मन में भी,
सिर्फ़ घर-आंगन में नहीं,
फैलाओ उजाला रिश्तों में,
सिर्फ़ गलियों-चौराहों में नहीं।”






No Comment! Be the first one.