आधुनिक युग का ‘लक्ष्मी पूजन’
हर साल जब दीपावली आती है, तो भारत में सोना और चांदी की चमक अपने चरम पर होती है। धनतेरस से लेकर लक्ष्मी पूजा तक, हर घर में स्वर्ण-रजत की खरीद-फरोख्त शुभ मानी जाती है। यह परंपरा केवल धार्मिक नहीं,...

अपनी बात
दिनेश रामावत,
प्रधान सम्पादक
ब्रिक्स देशों (ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) ने काफी समय पहले से यह विचार रखा था कि दुनिया को एक “वैकल्पिक आर्थिक ढांचा” चाहिए—जो पश्चिमी मुद्रा नियंत्रण, विशेष रूप से डॉलर के वर्चस्व से मुक्त हो। मॉस्को में आयोजित इस सम्मेलन में रूस ने इसी विचार को ठोस आकार दिया। रूस ने घोषणा की कि वह एक “कीमती धातु विनिमय मंच” स्थापित करेगा, जहाँ लेन-देन सोना, प्लेटिनम, हीरे और दुर्लभ धातु में किया जा सकेगा।
सम्पूर्ण दीपावली विशेषांक देखें-
RAJASTHAN TODAY DEEPAWALI EDITION
इसका अर्थ यह हुआ कि अब देश—विशेष रूप से ब्रिक्स सदस्य—अपने व्यापारिक भुगतान के लिए डॉलर या पश्चिमी वित्तीय प्रणाली -स्विफ्ट पर निर्भर नहीं रहेंगे। रूस ने यह स्पष्ट कर दिया है कि नई व्यवस्था “वास्तविक संपत्ति” पर आधारित होगी, न कि “काग़ज़ी मुद्रा” पर। अमेरिकी डॉलर पिछले अस्सी वर्षों से दुनिया की रिजर्व करेंसी है—यानी अंतरराष्ट्रीय व्यापार, तेल लेन-देन, और बैंकिंग का अधिकांश हिस्सा डॉलर में ही होता है। यह स्थिति अमेरिका को वैश्विक स्तर पर असाधारण आर्थिक और राजनीतिक शक्ति देती है। लेकिन अब ब्रिक्स का यह स्वर्ण-आधारित मॉडल उस वर्चस्व को धीरे-धीरे कमजोर कर सकता है।
रूस की यह पहल दो कारणों से रणनीतिक है:
1 प्रतिबंधों से बचाव: पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों के बाद, मॉस्को ने वैकल्पिक आर्थिक रास्ते खोजने शुरू किए थे।
2.विश्वसनीय मुद्रा: सोना और धातुएँ ऐसी संपत्तियाँ हैं जिनकी “अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति” किसी देश की नीतियों पर निर्भर नहीं करती।
यानी यह मंच डॉलर पर आधारित बैंकिंग नेटवर्क की जगह ऐसी प्रणाली बनाएगा जो “भौतिक संपत्ति” पर खड़ी हो—जो किसी राजनीतिक दबाव या अमेरिकी सेंट्रल बैंक के निर्णय से प्रभावित नहीं हो।
भारत के लिए यह कदम बेहद दिलचस्प और निर्णायक दोनों है। एक ओर, भारत ब्रिक्स का एक प्रमुख सदस्य है, जिसने “वैश्विक दक्षिण” की आवाज़ को आर्थिक ताकत देने में अग्रणी भूमिका निभाई है। दूसरी ओर, भारत की पूरी विदेशी व्यापार प्रणाली अभी भी बड़े पैमाने पर डॉलर पर निर्भर है। इसके कई लाभ हो सकते हैं-भारत स्वर्ण आधारित भुगतान प्रणाली का उपयोग कर अपनी ऊर्जा आयात बिल को स्थिर कर सकता है। रूस, ईरान और अफ्रीका के देशों के साथ व्यापार में डॉलर की कमी का बोझ घटेगा। भारतीय रुपये की स्थिरता को अप्रत्यक्ष समर्थन मिल सकता है, क्योंकि सोने पर आधारित भुगतान तंत्र मुद्रा उतार-चढ़ाव से अपेक्षाकृत सुरक्षित रहेगा।
वहीं संभावित चुनौतियाँ भी होगी- अमेरिका और यूरोपीय संघ भारत पर दबाव बना सकते हैं कि वह इस वैकल्पिक प्रणाली में आक्रामक रूप से शामिल न हो। भारत को अपने रिज़र्व मैनेजमेंट और विदेशी विनिमय नीतियों को पुनर्गठित करना पड़ेगा। तकनीकी और वित्तीय ढांचे -जैसे डिजिटल सोना, ब्लॉकचेन आधारित भुगतान को मज़बूत बनाना होगा। आज जब हम दीपावली पर सोना खरीदते हैं, तो यह केवल धार्मिक या पारंपरिक कर्मकांड नहीं होता। यह हमारे मन में एक “विश्वास” की पुनः पुष्टि होती है—कि परिवर्तनशील समय में भी “धन” का स्थायी रूप वही है, जो मिट्टी की तरह धरती से जुड़ा हो। रूस का यह कदम इसी सोच को वैश्विक स्तर पर मूर्त रूप देता दिख रहा है। यह एक तरह से आधुनिक युग का ‘लक्ष्मी पूजन’ है—जहाँ समृद्धि को डॉलर की मुद्रास्फीति से नहीं, बल्कि वास्तविक धातु की ठोस चमक से जोड़ा जा रहा है।
बीसवीं सदी की शुरुआत तक, दुनिया गोल्ड स्टैंडर्ड पर चलती थी—यानी हर देश की मुद्रा एक निश्चित मात्रा के सोने पर आधारित होती थी। लेकिन 1971 में अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन ने डॉलर को सोने से अलग कर दिया, और “फिएट करेंसी” का युग शुरू हुआ। अब ब्रिक्स का यह मॉडल उसी “स्वर्ण युग” की वापसी जैसा है, फर्क बस इतना है कि अब यह किसी एक देश नहीं, बल्कि बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की ओर बढ़ता कदम है। हालांकि यह बदलाव रातोंरात नहीं होगा। डॉलर अभी भी सबसे मजबूत मुद्रा है, और पश्चिमी बैंकिंग सिस्टम में दशकों का विश्वास जमा है। लेकिन अगर ब्रिक्स अपने नए मंच को सफल बनाता है, तो 2030 तक वैश्विक व्यापार का बड़ा हिस्सा “मल्टी-करेंसी” या “मेटल-सेटलमेंट” मॉडल में स्थानांतरित हो सकता है।
भारत ने पहले ही संकेत दे दिए हैं कि वह “मुद्रा विविधता” और “विकेंद्रीकृत भुगतान प्रणाली” का समर्थन करता है। हाल ही में भारतीय रिज़र्व बैंक ने सोने आधारित डिजिटल बॉन्ड और ई-रूपए जैसे प्रयोग किए हैं। इसलिए यदि ब्रिक्स का स्वर्ण मंच भारत के लिए व्यवहारिक लाभ दे, तो नई दिल्ली इसमें सक्रिय भूमिका निभा सकती है। इसके साथ ही भारत को यह संतुलन भी साधना होगा कि अमेरिका और पश्चिमी साझेदारों के साथ उसके संबंध प्रभावित न हों। एक संभावना यह भी है कि भारत “हाइब्रिड मॉडल” अपनाए—जहाँ डॉलर और स्वर्ण दोनों समानांतर भुगतान माध्यम के रूप में मौजूद रहें।
इस बार की दीपावली केवल घर-आंगन की नहीं, बल्कि आर्थिक सोच की भी रोशनी ला रही है। सोने के सिक्के, चांदी के दीपक, और वैश्विक मंच पर उठता “स्वर्ण मुद्रा का विचार”—तीनों एक साझा अर्थ की ओर इशारा करते हैं: समृद्धि का भविष्य केवल मुद्रा में नहीं, बल्कि विश्वास में छिपा है।
जैसे दीप जलाने से अंधकार मिटता है, वैसे ही यह नई आर्थिक व्यवस्था उस वित्तीय अंधकार को मिटाने की कोशिश है, जो दशकों से डॉलर वर्चस्व की छाया में छिपा था। मॉस्को से निकली यह “स्वर्ण चिंगारी” केवल रूस की रणनीति नहीं, बल्कि एक नए युग का संकेत है—जहाँ शक्ति का केंद्र पश्चिम से हटकर बहुध्रुवीय और वास्तविक मूल्य आधारित अर्थव्यवस्थाओं की ओर बढ़ रहा है। भारत जैसे देश के लिए यह अवसर भी है और चुनौती भी। यदि भारत अपनी पारंपरिक स्वर्ण संस्कृति को आधुनिक तकनीक और रणनीति से जोड़ सके, तो यह नई व्यवस्था उसके लिए आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम साबित हो सकती है।
दिवाली की रात जब घरों में दीप जलेंगे, तो शायद यह सोच भी मन में चमके— कहीं यह वैश्विक अर्थव्यवस्था भी अपनी नई “दीपावली” मना रही है,
जहाँ सोने की रौशनी में विश्व की वित्तीय व्यवस्था नया जन्म ले रही है।






No Comment! Be the first one.