डिजिटल युग में खो गई दीए की लौ
रंगोली की जगह एप्स और पटाखों की जगह वर्चुअल फायर वर्क्स आ गए हैं। अब पूजा करवाने पंडित जी नहीं आते। ऑनलाइन प्लेटफार्म्स की मदद से ही पूजा हो जाती है। आरती भी मोबाइल या टीवी ट्यून कर ली जाती है।...

सुरेश व्यास,
वरिष्ठ पत्रकार
Table Of Content
पिछले कुछ वर्षों से महसूस हो रहा है कि दीपावली का त्योहार अब पारम्परिक नहीं होकर आधुनिकता की आंधी में ओझल होता जा रहा है। मिट्टी के दीयों की जगह इलेक्ट्रिक झालरों और रंग बिरंगे बल्बों ने ले ली है। सोशल मीडिया पर शुभकामनाओं के आदान-प्रदान ने ग्रीटिंग कार्ड तो जैसे अलोप ही कर दिए हैं। पटाखें भी ‘ग्रीन’ हो चले हैं। आज के दौर में डिजिटल उपकरणों और आधुनिक तकनीक का बोलबाला क्या हुआ, दीपावली जैसा पारम्परिक त्योहार का वास्तविक स्वरूप भी धुंधला नजर आता है।
सम्पूर्ण दीपावली विशेषांक देखें-
RAJASTHAN TODAY DEEPAWALI EDITION
दीपावली का जो उत्सव आज से डेढ़-दो दशक तक जीवंत था। लगभग पूरा परिवार काफी पहले श्रम, समर्पण और उल्लास के साथ यह त्योहार मनाने की तैयारियों में जुट जाता है, लेकिन आज अब न वह उत्साह नजर आता है और न ही उल्लास। घरों में चूने-कळी से सफेदी की जगह ऑयल-डिस्टेम्पर पेंट ने ले ली है और कूंची की जगह ब्रुश आ गए हैं। सफेदी का भी अपना एक वैज्ञानिक आधार होता था और खास दिन खास स्थान की सफेदी या सफाई करने की परम्परा थी। मुझे याद है बचपन में दादाजी धनतेरस के दिन घर के बाहरी इलाके की सफेदी करते थे और हम चूना भरी बाल्टी लेकर खड़े रहते थे। इस सफेदी को कंवळा कहा जाता था, लेकिन आज ये शब्द मेरे बाद की पीढ़ी को शायद पता ही नहीं है। हां, किसी को फ्रंट एलिवेशन पूछो तक यह कंवळा तुरंत समझ आ जाएगा।
पहले न सिर्फ दिवाली, बल्कि हर पर्व-त्योहार में सांस्कृतिक धरोहर, परम्परा, आत्मीयता और सामूहिक उल्लास के भाव निहित थे, लेकिन आज यह सब आधुनिकता की भेंट चढ़ वर्चुअल प्रेम व आनन्द में सिमटते नजर आते हैं। पीढ़ियों से सहेजी और निभाई जा रही परम्पराएं और त्योहार की भावना ही अब तो खत्म होती नजर आती है। यानी त्योहार भी कोरी औपचारिकताएं भर रह गए लगते हैं। हमारे बचपन के दौर में दीपावली पर क्या ही उत्साह होता था हर एक के मन में। घरों में अशोक के पत्तों से वनरमाळ और मिट्टी से बने दीयों की दीपमालाएं सजाई जाती थी। कोना- कोना जगमग हो जाता था, लेकिन आज दीयों की जगह भी इलेक्ट्रिक झालरों और टिमटिमाते बल्बों ने ले ली है। पहले एक दूसरे के यहां जाकर शुभकामनाएं देने की परम्परा थी, आज जो सोशल मीडिया और वर्चुअल ग्रीटिंग्स से काम चला रहे हैं। पहले रिश्तेदारों और ओहदेदारों को दीपावली के कार्ड भेजने की परम्परा थी। कुछ लोग पोस्टकार्ड पर लिखकर शुभकामनाएं भेजते थे, उन पर कुंकुंम-केसर के छीटें डाले जाते थे। अब कार्ड तो बाजार में भी नहीं मिलते और पोस्टकार्ड तो क्या पूरा पोस्ट ऑफिस ही डिजिटल हो गया है।
ऑनलाइन पूजा पर जोर
रंगोली की जगह एप्स और पटाखों की जगह वर्चुअल फायर वर्क्स आ गए हैं। अब पूजा करवाने पंडित जी नहीं आते। ऑनलाइन प्लेटफार्म्स की मदद से ही पूजा हो जाती है। आरती भी मोबाइल या टीवी ट्यून कर ली जाती है। भागदौड़ के इस दौर में लोग पूजा करने भी घर-परिवार में एकत्रित नहीं होते। वीडियो कॉलिंग के जरिए जुड़कर साथ- साथ पूजा करते हैं। यानी पारम्परिक त्योहारों की सांस्कृतिक जड़ें और आत्मीयता खत्म होती जा रही है।
गनीमत है गांव बचे हुए हैं
कभी पंच पर्वा दिवाली का उत्सव स्वच्छता, धन, धार्मिक आस्था और पारिवारिक एकजुटता का प्रतीक होता था। शुरुआत धनतेरस से होती थी, जब घरों की साफ सफाई करने के साथ नए बर्तन, कपड़े और आभूषण आदि खरीदने के साथ देवी लक्ष्मी का स्वागत करने के लिए घर तैयार किए जाते थे। आंगन में रंगोली और पगलिए यानी पदचिह्न बनाए जाते थे। लगता था कि किसी मेहमान के स्वागत की तैयारी है। अगले दिन नरक चतुर्दशी या रूप चौदस के दिन महिलाएं सज-धज कर तैयार होने के बाद दीपमालिकाएं जगजमगाती थी। दीपावली के दिन लक्ष्मी पूजा के दौरान तो जैसे घर ही नहीं, पूरे शहर का कोना- कोना जगमग नजर आता था। कुल मिलाकर पारम्परिक दीपावली में आध्यात्मिकता और सांस्कृतिक विरासत का महत्व ज्यादा था। यह केवल भौतिक प्रसन्नता का त्योहार नहीं, बल्कि आत्मिकता और घर-परिवार में एकता की भावना को बढ़ावा देने का अवसर था। दीयों का प्रकाश अज्ञानता के अंधार को मिटाकर सत्य, ज्ञान और धर्म की राह पर चलने का संदेश देता था, लेकिन यह सब आज आधुनिकता की भेंट चढ़कर लुप्त सा होता जा रहा है। व्यावसायिक मजबूरियों के चलते अमेरिका और यूरोप में मनाई जाने वाली वर्चुअल दिवाली का स्वरूप महानगरों तक तो पहुंच ही गया है और धीरे- धीरे छोटे शहरों तक भी आने लगा है। गनीमत है, गांवों में वो उल्लास आज भी पारम्परिक नजर आता है।
अब कहां पारिवारिक ताकत
हमारे पूर्वजों की दीपावली सिर्फ एक त्योहार या उत्सव ही नहीं होती थी, मगर ये हमारी प्राचीन जीवनशैली और संस्कृति से ओतप्रोत होती थी। बड़े बुजुर्ग बच्चों को समझाते थे कि ये त्योहार कैसे और क्यों मनाए जाते हैं। इस मौके जब बाहर रहने वाले परिवार के सदस्य एक साथ मिलते थे और एक थाली में बैठकर भोजन करते थे तो परिवार की ताकत का भी अहसास होता था, लेकिन अब फोन पर ये शेयर किया जाता है कि हम पूजा करने के बाद फलां रेस्त्रां में डिनर के लिए जा रहे हैं।
नहीं बनते अब पारम्परिक व्यंजन
घरों में बेसन की चक्की, आटे के लड्डू, गुड़ से बना हलवा, सांकळिया-खाजलिया, शक्करपारे, गुजिया और मठरी जैसे पारम्परिक व्यंजन अब कहां बनते हैं। हमारे बचपन की बात करूं तो दीपवाली का त्योहार हमारे लिए स्कूल की पंद्रह दिन की छुट्टियां शुरू होने के साथ ही शुरू हो जाता था। बचाई हुई पॉकेट मनी से किस्तों में पटाखे रोज लाकर चलाते थे। छोटे लाल बम और लड़ालड़ की गूंज सभी को संकेत दे देती थी कि दीपावली आ गई है। दीपावली के दिन लक्ष्मी पूजा में चना-फूलियां, बेर, शकरकंदी, सिंघाड़े और शक्कर के बने खिलौने (मेहल माळिया), शक्कर की पेंसिल और चपड़ा चढ़ता था। ये प्रसाद सामग्री दीपावली की छुट्टियां खत्म होने के चार पांच दिन तक हमें त्योहार का अहसास करवाती थी, जब हम स्कूल यूनीफ़ॉर्म की जेबों में भरकर ये सामग्री ले जाते थे और चलती क्लास में थोड़ा थोड़ा निकाल कर टीचर से छिपकर चबाते रहते थे।
कई दिन रहती थी खुशी
दीपावली के दूसरे दिन रामा-स्यामा का भी अपना अलग महत्व था। सुबह जल्दी उठकर तैयार होते। नए कपड़े-जूते पहन कर निकल जाते। पहले पूरे मोहल्ले की फेरी होती थी बच्चों की टोली बनाकर। हर घर में जाते और बड़े बुजुर्ग मीठा खिलाने के साथ गोली-बिस्किट, टॉफियां और चवन्नी-अट्ठनी और कोई कोई तो एक रुपए के कलदार के रूप में खर्ची देते थे। उस दौर की चवन्नी-अठन्नी इकट्ठी करके लगभग एक महीने का काम तो चल ही जाता था। फिर हमारे घर आने वाले मेहमान और रिश्तेदार रिश्तों के साथ त्योहार की मधुरता को बढ़ाते थे। ये दौर पूरे दिन चलता था, लेकिन आज ये सब जैसे लुप्त सा हो गया है।
अब कौन निकलता है रोशनी देखने
दीपवाली के दिन घर ही नहीं, बाजारों को भी सजाया जाता था। देर रात-दो ढाई बजे तक रौनक रहती थी। शहर की संकड़ी गलियां और बाजार भी रंग-बिरंगे कपड़ों से सजे लोग-लुगाइयों और बच्चों की चहल पहल से गुलजार रहते थे। त्योहार का उल्लास निखर उठता था। हमारे शहर जोधपुर में रोशनी और सजावट के लिए बाजारों में प्रतिस्पर्धा रहती थी। लोग लक्ष्मी पूजन के बाद भोजन आदि करके रोशनी देखने निकलते थे। कई जगह झांकियां सजाने के साथ- साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे। रंग-बिरंगी रोशनी से चकाचौंध बाजारों में पैर रखने तक की जगह नहीं मिलती थी। फिर घर आकर और अगले दिन तक यह चर्चा होती थी कि किस इलाके की रोशनी अच्छी थी। उस दौर में कई बार स्थानीय निकाय भी सजावट और रोशनी की प्रतिस्पर्धा करवाते थे और दो दिन बाद परिणाम घोषित करते तो लोग अपने अपने अंदाज में कहते- मैंने कहा था ना, ये बाजार ही फर्स्ट आएगा।
अब ये स्थितियां बदल गई है। शहर के बाजार भी रात दस बजे तक ही मंगल हो जाते हैं। सड़कें सूनी होने लगती है। मुख्य सड़कों पर जरूर मामूली आवाजाही रहती है। कारण कि अब न रोशनी ऐसी होती है और न ही लोगों में वो उत्साह बचा है। अब रोशनी देखने निकलने की बजाय घर के लोग अपने- अपने कमरों में टीवी और मोबाइल में ही व्यस्त हो जाते हैं या फिर फोन पर मित्रों-परिजनों से बात करके शुभकामनाओं की हाजरी लगाते- लगाते सो जाते हैं। फिर सुबह उठकर वही फोन और वही मैसेज इस टेंशन के साथ कि कोई छूटा तो नहीं।
खो गई इलायची-सुपारी की महक
जोधपुर को यूं ही राजस्थान की सांस्कृतिक राजधानी नहीं कहा जाता। यहां के हर कोने में, हर गली में और हर नुक्कड़ में संस्कृति बची है। त्योहार हो या कोई उत्सव, सभी जगह संस्कृति की झलक मिल ही जाती है। हालांकि आधुनिकता और दुनिया में आ रहे बदलाव का असर यहां भी हुआ है, लेकिन फिर भी कई जगह संस्कृति अभी बची हुई है।
दीपावली का मौका है। वैसे तो हर त्योहार मनाने का अपना अपना तरीका हर जगह अलग होता है, लेकिन कुछ बातें ऐसी होती हैं जो उस स्थान की खासियत बन जाती है। जोधपुर की बात करें तो यहां की मीठी बोली और अपणायत की छाप तो यहां त्योहारों पर भी दिख जाती है। दीपावली पर अपनों से मिलना और शुभकामनाएं देना, हमारी सुदीर्घ परम्परा का हिस्सा रहा है। पहले एक दूसरे से मिलकर त्योहार की बधाई देते थे। खुशियां बांटते थे। अब दूरियां बढ़ रही हैं तो वर्चुअली ग्रिटिंग्स का दौर आ गया है। इसे लेकर ही मुझे दीपावली का एक अनूठा किस्सा याद आ रहा है, जब नेता लोग दल बल के साथ दीपावली की रात शहर की सड़कों पर निकलते थे और आम लोगों व व्यापारियों के साथ त्योहारी खुशियां बांटते थे। अब हालांकि यह परम्परा कुछ कमजोर पड़ गई है। कुछ नेता निकलते हैं, लेकिन थोड़ी देर के लिए और कई नेताओं ने निकलना ही बंद कर दिया है। वे भी वर्चुअलिटी के जाल में उलझ चुके हैं।
तो हम बात कर रहे थे त्योहारों और खासकर दीपावली पर नेताओं के मेल मुलाकात की। जोधपुर में इसकी शुरुआत की थी तीन बार राजस्थान के मुख्यमंत्री और पांच बार सांसद रहे अशोक गहलोत ने। गहलोत सांसद बनने से पहले भी अलग तरह की समाजसेवा के जरिए अपनी एक अलग पहचान बना चुके थे। उन्होंने 1980 में जब पहली बार लोकसभा का चुनाव जीता तो वे युवा ही थे। उन्होंने अपने क्षेत्र के लोगों से मिलने के लिए पत्र- व्यवहार को तो प्रमुख जरिया बना ही रखा था, लेकिन जब भी मौका आता तो वे आमजन से मिलने से नहीं चूकते। दीपावली का मौका आया तो गहलोत अपने कुछ सहयोगियों के साथ सोजतीगेट से पैदल ही निकल पड़े शहर की ओर। रास्ते में जो भी मिलता, मुस्कुरा कर वे अभिवादन करते और आगे बढ़ते जाते। दुकानदार भी मनवार करते और लोग अपने सांसद को इस तरह से मिलकर त्योहार की शुभकामनाएं देते देखकर सुखद आश्चर्य में खो जाते। इस दौरान किसी परिचित का घर आता तो वे खुद बेल बजाकर या दरवाजा खटखटा कर अंदर जाते और परिवार के सभी सदस्यों से मिलते।
यह सिलसिला कई बरसों तक चलता रहा। वे 1998 में पहली बार राजस्थान के मुख्यमंत्री बने, तब भी यह सिलसिला नहीं रुका। कारों का काफिला सोजतीगेट पर छोड़कर वे ऑटो रिक्शा में सवार होकर त्रिपोलिया होते हुए कन्दोई बाजार, कटला बाजार और सिरे बाजार होते हुए जालोरीगेट पहुंचे। एक बार वे नहीं निकल सके तो आधी रात बाद सड़कें सूनी होने के बाद अपने परिचितों से मिलने उनके घर पहुंच गए। शहर के कई लोग दीपावली की रात गहलोत के आने के किस्से याद करते हैं।
गहलोत के बाद सांसद बने जसवंतसिंह विश्नोई ने भी यह परम्परा कायम रखी। अब केंद्रीय मंत्री और तीन बार से सांसद गजेंद्रसिंह शेखावत भी निकलते हैं शहर में लोगों को शुभकामनाएं देने, लेकिन गहलोत या तो दीपावली पर जोधपुर नहीं आते और आते भी हैं तो बाजार में दीपावली पर पैदल घूमने का उनका यह क्रम पिछले कुछ बरसों से जैसे थमा हुआ है। हां, सोजतीगेट पर अपने मित्र की दुकान पर कुछ देर बैठकर जरूर आने-जाने वालों से मिल लेते हैं।
नेता और जनप्रतिनिधि जब दीपावली पर लोगों से मिलने निकलते थे तो मिठाई या ड्राई फ्रूट के साथ पान-सुपारी की मनुहार जरूर होती थी। अब तो पानी सुपारी की महक भी आधुनिकता के इत्र में कहीं खो गई लगती है।






No Comment! Be the first one.