तिजोरी से डिज़ीटल वॉलेट तक
सोने-चांदी से लेकर डिज़िटल स्क्रीन तक का सफर तय करती लक्ष्मी, बदलते समय में भी वही पुराना सत्य कहती है: “मैं वहीं ठहरती हूं, जहां श्रम और ईमानदारी का दीप जलता...

लक्ष्मी जी की आत्मकथा
बलवंत राज मेहता,
वरिष्ठ पत्रकार
मैं लक्ष्मी हूं। कभी आप सभी की तिजोरियों की खनक, कभी खेतों की हरियाली, कभी गृहस्थी की सुखद छांव। मुझे चंचला कहा गया, क्योंकि मैं टिकती नहीं। चपला कहा गया, क्योंकि मैं तेज़ी से दौड़ती हूं। और हां, मेरे वाहन के रूप में उल्लू को बताया गया। शायद इसलिए कि जिसके पास मैं आती हूं, वह अकसर आंख मूंद कर अपने ही नशे में डूब जाता है। समय बदलता गया और मेरी सूरत भी। पहले मैं सोने की ठोस मुद्राओं में दमकती थी। फिर चांदी के सिक्कों में गूंजती थी। कागज़ के नोटों में मैंने अपने आप को समेटा। हरे, गुलाबी, नीले, बैंगनी… हर रंग में मैं थी। पर धीरे-धीरे कुछ लोगों ने मेरी सूरत काली कर दी। सत्ता और समाज में अजीब ताक़त मिली उन्हें। मेरा काला रूप अंडर टेबल ही चला, पर चल तो मैं ही रही थी।
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आज मैं और भी बदल चुकी हूं। अब मैं ना सोने की चमक मात्र हूं, ना गड्डियों की खनक। अब मैं डिज़िटल वॉलेट की स्क्रीन पर चमकती हूं। यूपीआई के क्यूआर कोड में छिपी हूं। तुम मुझे स्कैन करते हो, और मैं बिजली की तरह खाते से खाते में दौड़ जाती हूं। पहले बही-खातों की लाल बहियों पर पूजन होता था, अब लैपटॉप, मोबाइल और टैबलेट पर मेरा स्वागत होता है। कहते हैं मैं चंचला हूं, मगर असल में तुम चंचल हो। मैं तो वहीं जाती हूं, जहां मेहनत और ईमानदारी से बुलावा आता है। किसान की पसीने की बूंद हो, मजदूर का परिश्रम, व्यापारी की सूझ-बूझ या कलाकार की साधना। मैं वहीं ठहरती हूं।
मैं विरोधाभासों की देवी भी हूं। पालनहार भी हूं, भोजन, वस्त्र, शिक्षा, दवा सब देती हूं। पर कंजूस भी हूं। हर किसी के हिस्से में समान रूप से नहीं आती। कोई मुझे गिन नहीं पाता, और कोई मेरी तलाश में जीवन गंवा देता है।
कभी कंगाल की रोटी में तो कभी बड़ी हवेली में
आप सभी ने मुझे देवी कहा, पर अपने लोभ से वस्तु बना दिया। मुझे मां माना, पर रिश्वत के लिफ़ाफ़े में भी बांध दिया। मेरे ही नाम पर जुए के पत्ते फेंटे जाते हैं, और मेरे लिए भाई-भाई का खून भी बहा। पर मैं वही हूं। कभी कंगाल की रोटी में छिपी, कभी अमीर की हवेली में ठहरी।
आज के जमाने में मैं डिज़िटल सोना भी हूं। क्रिप्टोकरेंसी, ई-वॉलेट्स, ऑनलाइन शेयर… आप सभी की कल्पना ने मुझे और भी मायावी बना दिया है। पर याद रहे, चाहे मैं सोने की ठोस ईंट बनूं या स्क्रीन की रोशनी, मैं टिकती वहीं हूं जहां श्रम, संयम और संतोष का दीपक जलता है।
दीपावली के पर्व पर जब आप लोग मेरे स्वागत में दीये जलाते हो, मुझे सबसे ज़्यादा खुशी तब होती है, जब घर का हर सदस्य मुस्कुराता है, जब पड़ोसी के आंगन में भी रोशनी होती है, और जब भीतर से अंधकार मिटता है।
याद रखो, मैं जितनी चंचला हूं, उतनी ही स्थिर भी। पकड़ना मुश्किल है, पर संभालना उससे भी कठिन।






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