परिवार की ओर लौटते कदम
संयुक्त परिवार की यादें अब भी हमारे भीतर जीवित हैं। इस दीपावली, चलिए पुराने संबंधों को फिर से रोशन...

रंजना विजय गांधी,
लेखिका
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दीपों की कतारें जब आंगन में जलती हैं, तो लगता है जैसे घर ने अपनी सांसें फिर से पा ली हों।
वो उजाला सिर्फ़ बिजली का नहीं होता, वह दिलों का उजाला होता है। ये उजाला होता है रिश्तों का, अपनापन का और एक साथ होने की अनुभूति का।
कभी यही दीपावली संयुक्त परिवारों की आत्मा हुआ करती थी।
आंगन में दीया सजाते हुए हंसी की आवाज़ों से पूरा घर गूंजता था।
कोई दीया उल्टा रख देता, कोई तेल ज़्यादा डाल देता, पर उस ‘गलती’ में भी अपनापन होता था।
हर पीढ़ी, दादा-दादी से लेकर बच्चों तक इस त्यौहार में समान रूप से जुड़ी रहती थी।
उस समय दीपावली कर्मकांड नहीं, एक परिवार की सामूहिक धड़कन थी।
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बदलते समय की चमक और सन्नाटा
समय बदला और परिवार भी।
संयुक्त परिवार अब यादों में बस गए, और जीवन “हम दो हमारे दो” में सिमट गया।
त्योहार अब कुछ घंटों का कार्यक्रम बन गए हैं। सुबह सफाई, दोपहर मिठाई, शाम पूजा और रात को सोशल मीडिया पर पोस्ट।
इस कृत्रिम जगमग में वह अनकही गर्माहट कहीं खो सी गई है।
पर क्या यह अंत है?
नहीं। यह बस एक विराम है।
हमारे भीतर अब भी उस मिलन की आकांक्षा जीवित है।
वक्त और तकनीक ने भले हमें दूर किया हो, पर मन के रिश्ते अब भी वहीं हैं। बस उन्हें फिर से छूने की देर है।
संयुक्त परिवार: सिर्फ़ साथ नहीं, एक अनुभव
संयुक्त परिवार केवल एक व्यवस्था नहीं था, वह जीवन जीने की कला थी।
वह सिखाता था बांटना, सुनना, समझना और मिलकर रहना।
दीपावली में जब दादी पूजा की थाली सजातीं, तो सिर्फ़ देवी-देवताओं के लिए नहीं, हर सदस्य के सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना करतीं।
बच्चे जब मिठाई बांटते, तो उसमें रिश्तों की मिठास घुली होती थी।
यह “एक साथ रहना” केवल परंपरा नहीं था, बल्कि मनोवैज्ञानिक सुरक्षा का आधार भी था।
हर पीढ़ी को अपनी जगह मिलती थी, जैसे वृद्धों को सम्मान, युवाओं को दिशा और बच्चों को संस्कार।
उजाले की वापसी संभव है
अकेलापन हमारी नियति नहीं, बस एक अस्थायी दौर है।
आज भी अगर कोई परिवार निर्णय ले कि “इस बार दीपावली सब साथ मनाएंगे”,
तो यकीन मानिए, घर की दीवारें भी मुस्कुरा उठेंगी।
एक कमरे का घर भी तब महल लगता है, जब वहां हंसी साझा होती है।
संयुक्त परिवार फिर से बन सकते हैं। भले एक ही छत के नीचे न सही, पर दिलों के नेटवर्क में तो ज़रूर।
नई पीढ़ी के लिए नई परंपराएं
आज के बच्चे और युवा पारिवारिक बंधनों से उतने दूर नहीं, जितना हम समझते हैं।
उन्हें बस यह महसूस करवाने की ज़रूरत है कि परिवार कोई “बंधन” नहीं, बल्कि “सहारा” है।
त्योहार इसका सबसे अच्छा माध्यम बन सकते हैं।
क्यों न इस बार दीपावली पर घर के युवा यह तय करें कि
– पूजा के बाद सब मिलकर एक “फैमिली डिनर” करें।
– बच्चों को अपने बड़ों की बचपन की दीपावली की कहानियां सुनाई जाएं।
– दीये जलाने के साथ एक धन्यवाद दीप भी रखा जाए और हर उस रिश्ते के नाम जो जीवन को उजाला देते हैं।
ऐसे छोटे-छोटे कदम संयुक्तता की लौ फिर से जगा सकते हैं।
मोबाइल से मन तक का सफर
तकनीक को दोष देने के बजाय उसे संवेदना से जोड़ना ही समाधान है।
क्यों न मोबाइल पर “शुभ दीपावली” भेजने की जगह, उसी व्यक्ति को कॉल करके पूछा जाए,
“इस बार आपने क्या नए पकवान बनाए?”
एक सच्ची बात, एक आत्मीय हंसी किसी भी कृत्रिम रोशनी से ज़्यादा चमकदार होती है।
सिर्फ़ घर सजाने का नहीं, रिश्ते जगाने का अवसर हैं त्योहार
दीपावली का अर्थ ही है, अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ना।
और आज के समय में यह प्रकाश सबसे पहले रिश्तों में लौटना चाहिए।
क्योंकि असली उजाला वहीं है, जहां अपनापन बसता है।
चलो इस दीपावली फिर से वही दीया जलाएं,
जो दीवार पर नहीं, रिश्तों के बीच जले।
फिर से वही आवाजें लौटें, वही एक साथ भोजन करने का आनंद, वही हंसी जो दिल से उठे।
क्योंकि अंततः
“घर तब नहीं जगमगाता जब बल्ब जलते हैं,
घर तब जगमगाता है जब लोग साथ बैठते हैं।”






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