दिवाली पर जगमगा उठता था जयपुर
जयगढ़, नाहरगढ़, गलता, सूर्य मंदिर, हवा महल, त्रिपोलिया दरवाजा, सरगासूली और रानियां के निवास जनानी ड्योढी भी दीपों से दमकती थी। शोरगारों की आतिश के नायाब हुनर का जादू मानो आकाश छूने को मचल उठता...

जितेन्द्र सिंह शेखावत,
वरिष्ठ पत्रकार
वह भी क्या दिवाली थी। तब आज जितना शोर और मोटरों की पौ- पौ नहीं थी। तब चार दिवारी के परकोटे में बसे जयपुर में शांति और सकून का माहौल था। किले, महल हवेलियों और मंदिरों के झरोखों से जगमगाती दीपकों की रंगीन रोशनी इंद्र धनुषी रंग बरसाती थी। राजा और प्रजा का यह मिला- जुला आयोजन था। आयोजनों में प्रजा की पूरी भागीदारी थी। सार्वजनिक स्थलों की सजावट सभी में जनता शामिल थी। गोविंददेव जी का मंदिर के साथ और पूरा नगर जगमगा उठता था। जयगढ़, नाहरगढ़, गलता, सूर्य मंदिर, हवा महल, त्रिपोलिया दरवाजा, सरगासूली और रानियां के निवास जनानी ड्योढी भी दीपों से दमकती थी। शोरगारों की आतिश के नायाब हुनर का जादू मानो आकाश छूने को मचल उठता था।
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आज घर-घर में दिवाली पहले से ज्यादा धूम धड़ाके से मनती है, लेकिन सार्वजनिक आनंद का जो भाव उस समय था। वह आज कहीं खो गया है। बाजारों में रोशनी है, लेकिन वह पुराना प्रेम का भाव अब कहीं नहीं दिखता। पहले इस त्योंहार का स्वरूप आज जैसी व्यावसायिकता से ओत-प्रोत नहीं था। मिलना जुलना और प्रेम का अच्छा माहौल था। राम सवाई राम सिंह के जमाने में जयपुर की दिवाली के त्योहार पर राजा और प्रजा दोनों मिलकर ऐसे ही उल्लास भर अंदाज में मानते थे। सवाई मानसिंह के समय तक इस त्योहार का यह ऐतिहासिक नजारे का माहौल ऐसी ही रंगीनियों से भरा था। नाहरगढ़ की पहाड़ी पर लक्ष्मी का पूजन करने के बाद रियासत के गुणवंत कलाकार बक्शी जी लक्ष्मी का चित्र पहाड़ पर उकेरते और इसकी रेखाओं में शाम को दीए जलते तो सारे शहर को पहाड़ से ही लक्ष्मी जी का स्वरूप दिखाई देता था। इतिहासकार राघवेन्द्र सिंह मनोहर के मुताबिक रियासत में श्रेष्ठ कार्य करने वाले अफसरों और कर्मचारियों को दिवाली दरबार में सम्मानित किया जाता था। दूसरे दिन महाराजा हाथी पर बैठ प्रजा के साथ दिवाली की राम राम करने निकलते थे। दिवाली पर पहला दीपक सिटी पैलेस में जलने के बाद झिलमिल दीयों से सारा शहर दमक उठता था।
दुल्हन की भांति सज जाते चन्द्र महल
जनानी ड्योढ़ी और चन्द्र महल तो नई दुल्हन की भांति सज जाते। चंद्र महल का प्रीतम निवास गीत और वाद्य संगीत के सुरों से सरोबार हो जाता। शरद पूर्णिमा नगर में दिवाली धूमधाम से मनाने की तैयारी शुरू हो जाती। सर्बता निवास की खुली छत पर सफेद बिछायत होती। दरबार सामंत दरबारी विशिष्ट नागरिक सभी काली पोशाक में होते। चांदी के वर्क में लिपटी खीर मलाई और ठंडाई से स्वागत होता। नगर में सुबह से ही दिवाली की चहल-पहल शुरू हो जाती थी। माणक चौक पर मांगलिक लोक वाद्य की स्वर लहरियां गूंजती। महाराजा काली जरी का कमरबंद अचकन जरी की लहर का साफा पहन अपने खास मेहमानों के साथ सिटी पैलेस के रंग महल की छत पर इस रोशनी के नजारे को देखते थे। चंद्र महल के अलग-अलग महल कक्षों में भिन्न-भिन्न तरह से रोशनी होती। नाहरगढ़ किले की चोटी पर सबसे पहले राज्य की ओर से पूजा होती। महारानी भी काली झिलमिल पोशाक और आभूषण पहन कर महाराजा के साथ लक्ष्मी जी का पूजन करती।
सूनी पड़ी जनानी ड्योढ़ी को कौन रोशन करे..
जयपुर रियासत की जनानी ड्योढ़ी में आज भले ही सन्नाटा छाया हो, लेकिन जब यह ड्योढ़ी आबाद थी तब ड्योढी में राजसी परंपरा के हिसाब से दिवाली मनाई जाती थी। दिवाली के पहले शरद पूर्णिमा से ही कई मण मेहंदी घोल दी जाती। ड्योढ़ी की सेविकाएं महारानी साहिबा आदि महिलाओं के हाथ पांव में गीत गाते हुए मेहंदी मांडती। सेविकाएं भी सलमा सितारे लगी पोशाकें और जेवर पहन कर दीपक जलाने का काम करती। वे दीप मलिक का स्वागत करने के काम में उत्साह के साथ पलक पांवड़े बिछा देती थी। सन् 1942 में दिवाली का त्योहार 8 नवम्बर को था। सात नवम्बर को रूप चतुर्दशी यानी छोटी दिवाली के दिन खासा रसोवड़ों के मेहरों ने जयपुर के सत्ताइस कुओं का पवित्र जल लाकर पूजा के लिए रखा। सियाशरण लश्करी के मुताबिक लक्ष्मी पूजन के लिए हाथियों के ठाण की पवित्र मिट्टी मंगाकर रखी गई। वृक्षों के पत्ते आदि पूजा का सामान रावले के हाकीम को सौंपते। महालक्ष्मी माता के पूजन का पाना भी सुथार और प्रजापति कुम्हार लाता। जनानी ड्योढ़ी की सेविकाओं और कर्मचारियों को मिठाई व उपहार दिए जाते।






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