टेसूरा टेसूरा घंटार बजइयो, …
भारत की लोकसंस्कृति में हर पर्व केवल उत्सव नहीं, बल्कि जीवन दर्शन है। ब्रज और बुंदेलखंड की धरती पर खेली जाने वाली टेसू–झांझी की परंपरा भी ऐसी ही एक कथा कहती है — जहां प्रेम, वीरता और लोकगीतों का...

बाज़ारवाद ने औपचारिकता बना दिया है त्योहारों को
मणिमाला शर्मा,
वरिष्ठ पत्रकार
Table Of Content
आज के समय में जब हमारे त्योहार बाजारवाद के शोर में दबते जा रहे हैं, वहीं टेसू–झांझी जैसी लोक परंपराएं हमें याद दिलाती हैं कि पुरातन संस्कृति हमारे जीवन में केवल इतिहास नहीं, बल्कि हमारी पहचान है। भारत की मिट्टी में त्योहार केवल उत्सव नहीं, बल्कि संस्कार और सामूहिकता के जीवंत प्रतीक हैं। हर लोकपर्व अपने भीतर कोई कथा, कोई लोकस्मृति और कोई नैतिक शिक्षा समेटे होता है। गांवों की शामों में जब परंपराओं की लौ टिमटिमाती थी, तो उनमें एक विशिष्ट आभा होती थी। वह आभा जो मनुष्य को उसकी जड़ों से जोड़ती थी। अफ़सोस, अब यह सब धीरे- धीरे स्मृतियों में सिमटता जा रहा है।
सम्पूर्ण दीपावली विशेषांक देखें-
RAJASTHAN TODAY DEEPAWALI EDITION
बचपन की झंकार और लोकगीतों की मिठास
टेसू–झांझी का नाम लेते ही गांवों की गलियों में गूंजते बालस्वर, झनकती झांझियों की आवाज़ें और दीयों की मद्धम रोशनी आंखों के सामने आ जाती हैं। बच्चे शाम ढलते ही झांझियां लेकर घर- घर जाते थे। उनकी झांझियों के साथ ही लोकगीतों की मधुर तानें गूंज उठती थीं,
“टेसूरा टेसूरा घंटार बजइयो, दस नगरी दस गांव बजईयो…”
टेसूरा, टेसूरा, घंटा बजइयो,
नौ नगरी, दस गांव बसइयो,
बस गए तीतर, बस गए मोर,
बूढ़ी डुकरिया लै गए चोर!
चोरन के घर खेती भई,
खाए डुकरिया मोटी भई!
मोटी है के, पीहर गई,
पीहर में मिले भाई भौजाई!
सबने मिलि कर दई बधाई!!
बच्चों की टोलियां नवरात्र की अष्टमी से लेकर दशहरे तक गलियों में घूमती थीं। घर-घर गाना गाने पर लोग उन्हें मिठाई, गुड़ या कुछ पैसे देते थे। यह केवल मनोरंजन नहीं था, बल्कि साझेपन, सामूहिकता और आनंद का उत्सव था।
क्या हैं टेसू और झांझी?
टेसू एक आकर्षक मिट्टी का पुतला होता है, जिसके तीन पैर होते हैं। उसका स्वरूप अत्यंत रंगीन और जीवंत होता है। मूंछों पर ताव, सिर पर पगड़ी, आंखों में काजल और हाथों में तोता या हुक्का। दूसरी ओर, झांझी एक मिट्टी का रंगीन घड़ा होता है, जिसमें छेद होते हैं। उसके भीतर दीपक जलाया जाता है और बाहर से उसे लाल चुनरी, शीशे और फूलों से सजाया जाता है। कई लोकविदों के अनुसार यह टेसू और झांझी जीव और चेतना के प्रतीक हैं, जहां झांझी आत्मा या प्रकाश का रूप मानी जाती है।
नवरात्र के दौरान लड़के टेसू की पूजा करते हैं और लड़कियां झांझी सजाती हैं। इस प्रकार यह लोकपर्व स्त्री और पुरुष दोनों की सहभागिता का उत्सव बन जाता है।
वीरता और प्रेम की लोककथा
ब्रज और बुंदेलखंड की लोककथाओं में टेसू–झांझी को महाभारत काल के वीर बर्बरीक से जोड़ा गया है। कथा है कि बर्बरीक घटोत्कच और मोरवी के पुत्र थे और उनके पास केवल तीन बाणों से पूरी सेना को परास्त करने की शक्ति थी। जब वे युद्ध में उतरने चले, तो श्रीकृष्ण ने उनसे पूछा कि वे किस पक्ष का साथ देंगे। बर्बरीक ने उत्तर दिया, “मैं उस पक्ष का साथ दूंगा जो हारता दिखेगा।”
कृष्ण समझ गए कि बर्बरीक की यह प्रतिज्ञा युद्ध का संतुलन बिगाड़ देगी। इसलिए उन्होंने उनसे शीशदान मांगा। वीर बर्बरीक ने बिना संकोच अपना शीश अर्पित कर दिया, किंतु यह इच्छा जताई कि वे युद्ध का साक्षी बनें।
लोकश्रुति में आगे यह भी कहा गया है कि बर्बरीक का मरणोपरांत विवाह उनकी प्रेयसी झांझी से किया गया।
यह प्रसंग धार्मिक ग्रंथों में नहीं, परंतु ब्रज–बुंदेलखंड के लोकगीतों और आख्यानों में आज भी गाया जाता है।
इसी कथा से “टेसू–झांझी” उत्सव की लोकधारा प्रवाहित होती है।
परंपरा का उत्सव रूप
ब्रज क्षेत्र, बुंदेलखंड और राजस्थान की कुछ सीमांत बस्तियों में आज भी टेसू और झांझी को शरद पूर्णिमा या दशहरे के दिन विवाह रूप में पूजित किया जाता है।
लड़कियां झांझी सजाती हैं, लड़के टेसू बनाते हैं, और फिर सामूहिक रूप से दोनों का मिलन करवा कर लोकगीत गाए जाते हैं। यह परंपरा वीरता, प्रेम और त्याग की याद के साथ-साथ सामूहिक आनंद का प्रतीक भी है।
लुप्त होती परंपरा, बदलता बचपन
आज गांवों में झांझियों की झंकार सुनाई नहीं देती। मोबाइल और टीवी ने बच्चों के खेल और गीत दोनों छीन लिए हैं। बाज़ारवाद के इस दौर में बच्चे “हैलोवीन” तो जानते हैं, पर “टेसू–झांझी” क्या है, यह नहीं।
यह केवल मनोरंजन के स्वरूप का बदलाव नहीं, बल्कि संस्कारों के क्षरण की कहानी है।
जब कोई परंपरा मरती है, तो उसके साथ एक सामाजिक चेतना भी मरती है।
संस्कृति से दूरी का असर
जहां पहले दीप जलते थे, वहां अब एलईडी की लाइटें हैं, जहां लोकगीत गूंजते थे, वहां अब डीजे की आवाज़ है।
त्योहार अब आस्था का नहीं, आयोजन का विषय बन गए हैं।
बच्चे अब साझा आनंद के बजाय व्यक्तिगत स्क्रीन पर खुशियां खोजते हैं। यही संवेदनाओं के क्षय की प्रक्रिया है, जो समाज को भीतर से खोखला बना रही है।
संस्कृति अब केवल अतीत नहीं, पहचान भी
झांझी जैसी परंपराएं यह सिखाती हैं कि संस्कृति केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि हमारी पहचान का जीवंत रूप है। यदि बच्चों को अपनी लोककथाओं, गीतों और रीति-रिवाजों की जानकारी नहीं होगी, तो वे अपनी जड़ों से कट जाएंगे। बिना जड़ों वाला वृक्ष चाहे कितना भी ऊंचा क्यों न हो, टिकता नहीं।
संरक्षण और पुनर्जीवन की राह
राजस्थान के उत्तरप्रदेश से लगते ब्रज क्षेत्र से लेकर मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड के कुछ गांवों में यह परंपरा अब भी जीवित है।
कुछ स्थानों पर झांझी खेली जाती है, टेसू तैयार किए जाते हैं और उनका विवाह शरद पूर्णिमा को संपन्न कराया जाता है। परंतु यह परंपरा केवल स्मृति में न रहे, इसके लिए ये आयोजन किए जाने चाहिए-
स्कूलों में “झांझी गीत प्रतियोगिता”
– पंचायतों में सामूहिक आयोजन
– माता-पिता अपने बच्चों को इन लोककथाओं से जोड़ें
अगर हमने समय रहते इसे सहेजा नहीं, तो आने वाले वर्षों में हमारे गांवों की पहचान केवल यादों में रह जाएगी। और अगर हम अपनी जड़ों की ओर लौट पाए, तो शायद फिर किसी संध्या में बच्चों की तानें गूंजें,
“टेसूरा टेसूरा घंटार बजइयो, दस नगरी दस गांव बजईयो…”
क्योंकि जब तक यह गीत गाया जाता रहेगा, भारत की आत्मा और उसकी परंपराएं सांस लेती रहेंगी।






No Comment! Be the first one.