ट्रम्प का शांति नाटक, दुनिया का तमाशा
डोनाल्ड ट्रम्प का इस्राइल संसद में दिया गया भाषण “शांति” के नाम पर एक सुनियोजित नाटक भर था। जब असली पक्ष – फ़िलिस्तीन – को ही बातचीत से बाहर रखा गया है, तब किसी “नए युग” की बात महज़ छलावा है। ट्रम्प...

मध्यपूर्व फिर एक बार ‘शांति’ के नाम पर भ्रमजाल में फँस गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इस्राइल की संसद में खड़े होकर घोषणा की – “इस्राइल ने अब हथियारों से जितना जीतना था, जीत लिया है। अब समय है शांति का।” यह वाक्य सुनने में जितना भावुक और ऐतिहासिक लगता है, उतना ही खोखला भी है। क्योंकि युद्ध के मैदान पर जब तक इंसान मर रहा है, तब तक कोई शांति नहीं होती। और जब तक फ़िलिस्तीन को बराबर की आवाज़ नहीं मिलेगी, तब तक मध्यपूर्व का सूरज कभी उजला नहीं होगा।
ट्रम्प का भाषण, एक नाटक से ज़्यादा कुछ नहीं
ट्रम्प का भाषण किसी वास्तविक संवाद की तरह नहीं, बल्कि एक तैयार पटकथा जैसा लगा – जिसका उद्देश्य शांति नहीं, बल्कि अमेरिका और इस्राइल की राजनीतिक स्थिति को वैध ठहराना था। उन्होंने इस्राइल की “पूर्ण सैन्य विजय” का दावा किया और कहा कि “अब हथियारों की जगह सहयोग होगा।” लेकिन प्रश्न यह है — सहयोग किससे? फ़िलिस्तीन से तो बातचीत ही नहीं हुई, हमास को “मिटा देने” की घोषणा कर दी गई, गाज़ा का प्रतिनिधि कोई मेज़ पर मौजूद नहीं था। तो फिर यह “शांति” किसके बीच है? क्या यह वही शांति नहीं जो शक्तिशाली अपने लाभ के लिए घोषित करता है, जबकि पीड़ित का दर्द दबा दिया जाता है?
फ़िलिस्तीन को नज़रअंदाज़ करने की साजिश
ट्रम्प की पूरी योजना में एक चीज़ साफ़ झलकती है —फ़िलिस्तीन की आवाज़ को सुनने या मान्यता देने की कोई मंशा नहीं। उन्होंने अपने पूरे भाषण में ‘फ़िलिस्तीनी राज्य’ या ‘स्वतंत्रता’ जैसे शब्द तक नहीं बोले। उनका हर वाक्य इस्राइल की “सफलता” और “नए युग” की बात करता रहा।
यह वही नीति है जो दशकों से अमेरिका अपनाता आया है – जहां “शांति” का मतलब होता है इस्राइल को मजबूत बनाना और अरब जगत को असहमत लेकिन शांत रखना। ट्रम्प की भाषा में मानवीयता नहीं, बल्कि प्रभुत्व का आत्मविश्वास था — जैसे उन्होंने किसी युद्ध को “पूरा” नहीं, बल्कि “अपने हिसाब से समाप्त” किया हो।
जब शांति से ज़्यादा प्रचार मायने रखता है
ट्रम्प की राजनीति हमेशा से प्रदर्शन पर टिकी रही है। उनके लिए हर अंतरराष्ट्रीय मुद्दा एक शो है — जहां कैमरे, भाषण और तालियाँ ही असली लक्ष्य हैं। इस्राइल की संसद में दिया गया यह भाषण भी उसी शैली का था। उन्होंने खुद को “शांति निर्माता” के रूप में पेश किया, जबकि हकीकत यह है कि अमेरिका ने ही इस्राइल को युद्ध के हर दौर में हथियार, खुफिया सहयोग और कूटनीतिक संरक्षण दिया।
गाज़ा की तबाही के बाद, जब हजारों घर राख हो गए, जब बच्चों की लाशें स्कूलों से उठाई जा रही थीं — उसी समय ट्रम्प ने इसे “आतंकवाद पर ऐतिहासिक जीत” कहा। क्या यही शांति का रूप है? जहां एक पक्ष की चुप्पी को जीत और दूसरे के विनाश को सुरक्षा कहा जाए?
अरब जगत की खामोशी – मजबूरी या डर?
ट्रम्प के इस ‘नए युग’ को लेकर अरब देशों ने जो प्रतिक्रिया दी, वह भी कुछ कम चिंताजनक नहीं। सऊदी अरब, मिस्र, जॉर्डन और यूएई जैसे देशों ने “संयमित स्वागत” किया। किसी ने यह नहीं पूछा कि फ़िलिस्तीन का भविष्य क्या होगा। क्योंकि सभी जानते हैं — अमेरिका से टकराना तेल, व्यापार और सत्ता के समीकरणों से टकराना है।
मध्यपूर्व के शासक अब न तो स्वतंत्र नीति बना पा रहे हैं, न अपने लोगों की भावनाओं का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं । इस्राइल-फ़िलिस्तीन संघर्ष अब केवल मानवीय त्रासदी नहीं, बल्कि अरब राजनीति की आत्मसमर्पण गाथा बन चुका है।
ईरान का नाम – डराने की रणनीति
ट्रम्प ने अपने भाषण में यह भी कहा कि “शांति की यह लहर शायद ईरान तक पहुंचे।” यह वाक्य शांति की नहीं, बल्कि चेतावनी की भाषा थी। क्योंकि ट्रम्प के कार्यकाल में अमेरिका ने ही ईरान पर सबसे कठोर आर्थिक प्रतिबंध लगाए, उसकी परमाणु संधि तोड़ी, और उसे ‘दुष्ट राष्ट्र’ कहा।
अब वही राष्ट्रपति “ईरान से शांति” की बात कर रहे हैं — दरअसल यह एक चाल है, ताकि ईरान को घेरने की अमेरिकी नीति को “संवाद” के परदे से ढका जा सके। यह वही पुराना अमेरिकी तरीका है — पहले दुश्मन बनाओ, फिर शर्तों पर शांति का सौदा करो।
गाज़ा – एक घाव, जिसे कोई भरना नहीं चाहता
गाज़ा आज दुनिया के सबसे बड़े मानव संकटों में से एक बन चुका है। पर ट्रम्प के भाषण में गाज़ा का ज़िक्र केवल एक बार आया , वह भी “बंधकों की रिहाई” के संदर्भ में, न कि वहाँ की तबाही, मौत या मानवीय दर्द के लिए।
गाज़ा की गलियों में जो बचा है, वह केवल मलबा और शोक है। मकान नहीं, उम्मीदें गिर चुकी हैं। ऐसे में “शांति की सुबह” कहना एक क्रूर मज़ाक जैसा लगता है। कोई भी शांति उस वक़्त तक टिक नहीं सकती जब तक न्याय और जवाबदेही उसके केंद्र में न हो। और यहाँ न तो इस्राइल की जवाबदेही तय की जा रही है, न ही फ़िलिस्तीन को अधिकार दिया जा रहा है।
अमेरिकी हितों का खेल
ट्रम्प की नीति का असली मकसद है — अमेरिका को फिर से मध्यपूर्व का निर्णायक केंद्र बनाना। वे जानते हैं कि युद्ध की राख से निकली राजनीति सबसे ज़्यादा नियंत्रित की जा सकती है। इस्राइल की सैन्य सफलता, अरब देशों की आर्थिक निर्भरता, और ईरान का डर — इन तीनों को साधकर अमेरिका अपने हथियार उद्योग और ऊर्जा हितों को सुरक्षित रखता है। “शांति” यहाँ एक उत्पाद है, जिसे बेचने का लाइसेंस केवल वॉशिंगटन के पास है। ट्रम्प का भाषण इसी बाज़ार की नई विज्ञप्ति थी।
वास्तविक शांति – जो अब भी ग़ायब है
अगर ट्रम्प सच में शांति चाहते, तो पहला कदम यह होता – फ़िलिस्तीन को अंतरराष्ट्रीय मान्यता दिलाना, गाज़ा के पुनर्निर्माण के लिए संयुक्त प्रयास बनाना और इस्राइल को जवाबदेही के दायरे में लाना।लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा। क्योंकि यह पूरी प्रक्रिया न्याय पर नहीं, शक्ति पर आधारित है। यह वह “शांति” है, जो बंदूक की नली से निकलती है। ऐसी शांति कभी टिकाऊ नहीं होती, केवल ठहराव होती है — जब तक अगला विस्फोट न हो जाए।
ट्रम्प की दिखावे की राजनीति की नई स्क्रिप्ट
ट्रम्प की पहल शांति की नहीं, बल्कि दिखावे की राजनीति की नई स्क्रिप्ट है। उनका भाषण अमेरिका की अंतरराष्ट्रीय छवि को चमकाने के लिए था। मध्यपूर्व की धरती पर इसका कोई वास्तविक अर्थ नहीं।
फ़िलिस्तीन के बिना किसी “नए युग” की बात करना ऐसा ही है जैसे बिना बीज के फसल बोना। यह भाषण न तो इतिहास बदलेगा, न भूगोल — क्योंकि इसमें इंसान ग़ायब है। ट्रम्प का यह “शांति नाटक” सिर्फ़ एक बात साबित करता है – मध्यपूर्व में फिलहाल शांति की संभावना नहीं है, क्योंकि युद्ध करने वाले दोनों ही पक्ष अभी संवाद की मेज़ पर बैठे ही नहीं हैं।
जब तक गाज़ा की राख से एक नया फ़िलिस्तीन नहीं उठेगा, जब तक इस्राइल को अपनी सीमाओं और ज़िम्मेदारी का अहसास नहीं होगा, और जब तक अमेरिका अपनी “शांति की दलाली” छोड़कर समानता पर आधारित संवाद नहीं करेगा — तब तक हर भाषण, हर शांति-सम्मेलन सिर्फ़ एक नाटक रहेगा। ट्रम्प ने वही नाटक किया, जिसे दुनिया ने कई बार देखा है — अंतर बस यह है कि इस बार इसे “नए युग” का नाम दे दिया गया।






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