बॉलीवुड के स्वर्णिम युग की दिवाली
आज की चकाचौंध से परे, पुराने फिल्मी सितारों की दिवाली सादगी, आत्मीयता और अटूट परंपराओं का आईना थी। राज कपूर के आर.के. स्टूडियो की सीमित रौनक से लेकर दिलीप कुमार की शांत पारिवारिक पूजा तक, यह आलेख...

राजस्थान टुडे डेस्क
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भारतीय सिनेमा का स्वर्णिम युग (1940 से 1970 के दशक) केवल बेहतरीन फिल्मों के लिए ही नहीं, बल्कि सितारों के आपसी मेलजोल और त्योहारों को मनाने के अनोखे अंदाज़ के लिए भी जाना जाता है। उस दौर के फिल्मी सितारों की दिवाली आज के ग्लैमर से कहीं अधिक आत्मीयता, परंपरा और सादगी से भरी होती थी। उस समय पार्टियां भले ही कम होती थीं, लेकिन उनका महत्व और गर्मजोशी कहीं अधिक थी।
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आर.के. स्टूडियो की रौनक
भारतीय सिनेमा के ‘शोमैन’ राज कपूर, त्योहारों को भव्यता से मनाने की अपनी परंपरा के लिए मशहूर थे। हालांकि उनकी होली पार्टी पूरे देश में सबसे अधिक लोकप्रिय थी, लेकिन दिवाली पर भी चेंबूर स्थित उनके आर.के. स्टूडियो में एक विशेष रौनक देखने को मिलती थी। दिवाली के दिन कपूर परिवार में पारंपरिक लक्ष्मी पूजन पूरी श्रद्धा के साथ होता था। शाम को स्टूडियो में सीमित लोगों के लिए एक छोटा जलसा होता था, जहां परिवार के सदस्यों के अलावा इंडस्ट्री के करीबी दोस्त शामिल होते थे। इन समारोहों में पारंपरिक संगीत और व्यंजनों पर जोर दिया जाता था, जो आज की तरह केवल फैशन शो नहीं होते थे।
बच्चन परिवार का आगाज़
अमिताभ बच्चन, जो आज बॉलीवुड में दिवाली पार्टियों की मेजबानी के लिए सबसे ज़्यादा जाने जाते हैं, उन्होंने भी अपनी दिवाली परंपराओं की शुरुआत बहुत ही पारंपरिक तरीके से की। पुराने दौर में, उनके घर पर भी दिवाली का जश्न पूरी तरह से पारिवारिक और निजी हुआ करता था। उनके पिता, कवि हरिवंश राय बच्चन की कविताएं और परिवार की सादगी दिवाली के माहौल को एक साहित्यिक और भावनात्मक स्पर्श देती थी। हालांकि भव्य पार्टी देने की परंपरा उनके करियर के बाद के चरण में शुरू हुई, लेकिन शुरुआती दौर में उनके त्योहारों में परंपरा और कला का संगम होता था।
दिलीप कुमार और सादगी
‘ट्रेजेडी किंग’ दिलीप कुमार और सायरा बानो अपनी सादगी और शालीनता के लिए जाने जाते थे। उनकी दिवाली में दिखावे से ज़्यादा पारिवारिक मूल्यों को महत्व दिया जाता था। सायरा बानो ने कई बार बताया है कि वे त्योहारों को एक आम भारतीय परिवार की तरह ही मनाना पसंद करते थे, जिसमें घर को दीयों से सजाना, लक्ष्मी पूजन करना और करीबी रिश्तेदारों व दोस्तों के साथ वक़्त बिताना शामिल था। उनके घर की दिवाली चकाचौंध से दूर, शांत और सुकून भरी होती थी।
देव आनंद और उनका अपना अंदाज़
‘सदाबहार’ अभिनेता देव आनंद की अपनी एक अलग ही दुनिया थी। राज कपूर की पार्टियों से दूर रहने वाले देव आनंद अक्सर त्योहारों को भी अपने ही अंदाज़ में मनाना पसंद करते थे। वे शूटिंग से समय निकालकर परिवार को समय देते थे या फिर प्रकृति के बीच शांति से इस पर्व का आनंद लेते थे। उनका ध्यान दिखावे पर नहीं, बल्कि त्योहार के भावनात्मक पक्ष पर केंद्रित रहता था।
पारंपरिक व्यंजन और तोहफे
पुराने दौर की दिवाली में सबसे महत्वपूर्ण था घर में बने पारंपरिक व्यंजन और मिठाइयां। सितारे खुद भी मिठाइयां बनाने में रुचि लेते थे या फिर रिश्तेदारों और पड़ोसियों से तोहफे में आई मिठाइयों का आदान-प्रदान करते थे। आज की तरह ब्रांडेड गिफ्ट हैंपर्स की जगह, हाथ से बने या सोचे-समझे छोटे-छोटे तोहफे दिए जाते थे, जिनमें स्नेह अधिक होता था।
रोशनी का असली मतलब
उस दौर में, बिजली की रंगीन झालरों से ज़्यादा महत्व मिट्टी के दीयों का होता था। हर घर दीयों की कतारों से जगमगाता था, जो ‘प्रकाश के त्योहार’ के वास्तविक अर्थ को दर्शाता था। सितारों के बंगले भी इसी तरह सादगी भरे दीयों की रोशनी में नहाए रहते थे, जो आज की लेज़र लाइटों और हाई-टेक डेकोरेशन से बिल्कुल अलग था।
ये हकीकत है कि त्योहारों का असली मज़ा भौतिक भव्यता में नहीं, बल्कि मानवीय संबंधों, परंपराओं और मन की सादगी में निहित है। उस दौर की दिवाली में जो गर्मजोशी, आत्मीयता और अनौपचारिकता थी, वह आज भी बॉलीवुड के सुनहरे पन्नों में एक मीठी याद की तरह दर्ज है। इन परंपराओं ने ही उन्हें ‘सुपरस्टार’ होने के साथ-साथ एक ‘साधारण इंसान’ बने रहने में मदद की।






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