राष्ट्रवादी विचारधारा की ऐतिहासिक यात्रा
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष सुधांशु टाक,वरिष्ठ साहित्यकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का शताब्दी वर्ष 02 अक्टूबर, 2025 से शुरू हो गया, जो अगले साल यानी 2026 की विजयादशमी तक मनाया जाएगा।...

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष
सुधांशु टाक,
वरिष्ठ साहित्यकार
Table Of Content
- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष
- ऐसे स्थापना हुई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की
- 1925 – समय की पुकार
- वह पहली शाखा और पहला पथ संचलन: साधारण दृश्य, असाधारण ऊर्जा
- संघ कभी प्रचार नहीं करता, फिर भी यह फैलता गया। क्यों?
- शताब्दी वर्ष में केंद्र सरकार की सक्रिय भागीदारी
- हमारा उद्देश्य भारत को विश्वगुरु बनाना
- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संघ के 100 वर्षों पर
- जन समर्थन के साथ संघ
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का शताब्दी वर्ष 02 अक्टूबर, 2025 से शुरू हो गया, जो अगले साल यानी 2026 की विजयादशमी तक मनाया जाएगा। इस वर्ष, संघ अपने शताब्दी वर्ष के दौरान पंच परिवर्तन के तहत पांच प्रमुख मुद्दों पर जनजागरण अभियान चलाएगा। इनमें पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समरसता, स्व-निर्भर व्यवस्था, कुटुंब प्रबोधन और नागरिक कर्तव्य शामिल हैं। इस दौरान संघ देशभर में गृह संपर्क अभियान, हिंदू सम्मेलन, प्रबुद्ध नागरिक गोष्ठी और सामाजिक सद्भाव बैठकों का आयोजन करेगा।
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शताब्दी वर्ष का महत्व इसलिए भी अधिक है, क्योंकि यह संघ की यात्रा का आकलन करने का अवसर प्रदान करेगा। 1925 से 2025 तक, संघ ने असंख्य चुनौतियों का सामना किया, जैसे विभाजन की विभीषिका, आपातकाल का अंधेरा, प्राकृतिक आपदाओं का संकट। फिर भी, यह संगठन बढ़ता गया।
एक साधारण शाखा से प्रारंभ हुआ यह संगठन आज भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है। इस विजयदशमी (2 अक्टूबर 2025) पर शुरू हुए संघ के 100 वर्ष के कार्यक्रम केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि एक परिपक्व संगठन की यात्रा का प्रमाण है, जहां एक व्यक्ति के सौ वर्ष बुढ़ापे का संकेत देते हैं, वहीं एक संगठन के सौ वर्ष परिपक्वता और दृढ़ता का प्रतीक होते हैं।
संघ की स्थापना के समय डॉ. हेडगेवार का उद्देश्य स्पष्ट था कि हिंदू समाज को संगठित कर राष्ट्र को मजबूत बनाना। उन्होंने कहा था- हिंदू राष्ट्र की रक्षा के लिए स्वयंसेवकों का निर्माण आवश्यक है। यह दृष्टि आज भी प्रासंगिक है। प्रत्येक विजयदशमी का सरसंघचालक का उद्बोधन यानी वार्षिक संदेश स्वयंसेवकों के लिए दिशा निर्देशिका का कार्य करता है। पूरे वर्ष यह वक्तव्य संघ के कार्यों को दिशा प्रदान करता है व सामाजिक सद्भाव, पर्यावरण संरक्षण, महिला सशक्तिकरण और राष्ट्रीय एकता जैसे मुद्दों पर प्रकाश डालता है। स्वयंसेवक इसे अत्यंत ध्यान से ग्रहण करते हैं, क्योंकि यह केवल भाषण नहीं, बल्कि संघ की वैचारिक यात्रा का सार है। इस वर्ष भी उनका संदेश शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों को दिशा देगा।
संघ की शताब्दी यात्रा भारत के उत्थान की कहानी है। डॉ. हेडगेवार की दृष्टि से प्रारंभ होकर गुरुजी की वैचारिक मजबूती, बालासाहेब की सामाजिक समरसता और वर्तमान नेतृत्व की समावेशी पहुंच तक, संघ ने राष्ट्र निर्माण में योगदान दिया। आपातकाल में जेल यात्राएं, आपदा राहत में सेवा, शिक्षा और स्वास्थ्य में योगदान, ये सब संघ की परिपक्वता दर्शाते हैं। शताब्दी वर्ष में सामाजिक सद्भाव पर फोकस होगा, जहां गुजरात, ओडिशा और पश्चिम बंगाल जैसे क्षेत्रों में स्थायी परियोजनाएं शुरू होंगी।
ऐसे स्थापना हुई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की
वर्ष 1925 की विजयादशमी। भारत की मिट्टी पर वह दिन किसी त्योहार से अधिक एक ऐतिहासिक चेतना का जागरण था। नागपुर शहर के रेशीमबाग में, जहां आमतौर पर उत्सव, मेले और पारंपरिक आयोजन होते थे, उस दिन कुछ नया हो रहा था। डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार, एक दृढ़ विचार के साथ वहां उपस्थित थे। उनके साथ 17 युवक थे, पर उनके इरादे करोड़ों की चेतना जगाने वाले थे। 27 सितंबर 1925 के उस पावन दिवस पर डॉ. हेडगेवार ने नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी। यह ‘संघ’ का जन्म था। पर यह कोई संस्था नहीं थी, यह एक विचार था, एक संगठित, आत्मसम्मान से भरा हुआ, और जागरूक हिन्दू समाज का स्वप्न।
1925 – समय की पुकार
बीसवीं सदी का भारत उस दौर से गुज़र रहा था, जहां आज़ादी की मांग तो ज़ोर पकड़ रही थी, लेकिन हिंदू समाज विखंडन, अस्पृश्यता, आंतरिक कलह और आत्मविस्मृति से जूझ रहा था। कांग्रेस की राजनीति, विदेशी शक्तियों का प्रभाव, और अलगाववादी विचार तेजी से ज़मीन बना रहे थे। कांग्रेस के भीतर रहकर स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ने वाले डॉ. हेडगेवार ने अनुभव किया कि राजनीतिक स्वतंत्रता तब तक अधूरी रहेगी जब तक समाज संगठित और सांस्कृतिक रूप से सशक्त न हो। इसलिए उन्होंने तय किया, “राजनीति से ऊपर उठकर समाज निर्माण करना होगा।”
वह पहली शाखा और पहला पथ संचलन: साधारण दृश्य, असाधारण ऊर्जा
विजयादशमी के दिन, नागपुर में 17 युवक एक मैदान में इकट्ठे हुए। वे सब सामान्य वेशभूषा में थे, खाकी निकर, सफेद कमीज़ और सिर पर टोपी। कोई बैनर नहीं, कोई नारा नहीं। बस एक भगवा ध्वज, जिसे उन्होंने राष्ट्र की आत्मा का प्रतीक माना।
साल था 1926, शहर नागपुर में पहली शाखा मोहिते बाड़ा में स्थापित हुई। 1926 में ही संघ का पहला पथ संचलन हुआ था, जो नागपुर के हनुमान नगर के राजाबाक्षा मंदिर से होकर गुजरा। इसके बाद संघ का विजयादशमी उत्सव यशवंत स्टेडियम, कस्तूरचंद पार्क और अब रेशीमबाग में आयोजित होने लगा है।
1940 के दशक में जब भारत अंग्रेज़ी हुकूमत से संघर्ष कर रहा था, संघ की शाखाएं गांव-गांव में लगने लगीं। आज गांवों, कस्बों व महानगरों में लगभग 83,000 से अधिक स्थानों पर दैनिक शाखाएं लगती हैं।
संघ कभी प्रचार नहीं करता, फिर भी यह फैलता गया। क्यों?
पूछने पर संघ के पदाधिकारी बताते हैं ऐसा इसलिए, क्योंकि संघ स्वयंसेवक बनाता है और स्वयंसेवक ही संघ को बढ़ाते हैं।
शताब्दी वर्ष के संबंध में संघ के कार्यकर्ताओं के साथ ही आम जनता में भी उत्साह का माहौल है और संघ के प्रति विश्वास बढ़ता जा रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि संघ के कार्य ने अब पूरे देश में अपनी जड़ें जमा ली हैं। पिछले 100 वर्षों में संघ कार्य अपूर्व रूप से बढ़ा है। अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा 2025 में प्रस्तुत संघ कार्य की रिपोर्ट दर्शाती है कि पूरे देश में संघ का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है।
मार्च 2024 की तुलना में मार्च 2025 में…
✅ स्थान: 45,600 → 51,710
✅ शाखाएं: 73,117 → 83,129
✅ मिलन: 27,717 → 32,147
✅ मंडली: 10,567 → 12,091
यह सिर्फ आंकड़े नहीं हैं — ये राष्ट्र निर्माण की दिशा में संघ के बढ़ते कदम हैं।
संघ का कार्य समाज के हर वर्ग तक पहुंच रहा है— सांस्कृतिक चेतना, सामाजिक समरसता, स्वदेशी स्वावलंबन और राष्ट्र सेवा के संकल्प के साथ।
शताब्दी वर्ष में केंद्र सरकार की सक्रिय भागीदारी
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गौरवशाली 100 वर्षों की यात्रा के उपलक्ष्य में, भारत सरकार ने एक विशेष डाक टिकट और एक स्मारक सिक्का जारी किया है। 100 रुपए के इस सिक्के पर एक ओर राष्ट्रीय प्रतीक चिह्न अंकित है और दूसरी ओर सिंह के साथ वरद मुद्रा में भारत माता की भव्य छवि अंकित है, जबकि स्वयंसेवकों को भक्ति और समर्पण भाव से उनके समक्ष नतमस्तक दिखाया गया है। स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार भारतीय मुद्रा पर भारत माता की छवि अंकित की गई है, जो एक अत्यंत गौरवशाली और ऐतिहासिक क्षण है। इस सिक्के के ऊपर संघ का बोध वाक्य भी अंकित है- राष्ट्राय स्वाहा, इदं राष्ट्राय इदं न मम।
हमारा उद्देश्य भारत को विश्वगुरु बनाना
राष्ट्र की परिभाषा सत्ता पर आधारित नहीं है। हम परतंत्र थे, तब भी राष्ट्र था। अंग्रेजी का नेशन शब्द स्टेट से जुड़ा है, जबकि भारतीय राष्ट्र की अवधारणा सत्ता से जुड़ी नहीं है।
भारत आजादी के 75 वर्षों में वह वांछित दर्जा हासिल नहीं कर सका, जो उसे मिलना चाहिए था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का उद्देश्य देश को ‘विश्वगुरु’ बनाना है और दुनिया में भारत के योगदान का समय आ गया है। अगर हमें देश का उत्थान करना है, तो यह किसी एक पर काम छोड़ देने से नहीं होगा। हर किसी को अपनी भूमिका निभानी होगी।
(राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का वक्तव्य)
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संघ के 100 वर्षों पर
संघ के स्वयंसेवक, जो अनवरत रूप से देश की सेवा में जुटे हैं, समाज को सशक्त कर रहे हैं। इसकी भी झलक इस डाक टिकट में है। मैं इन स्मृति सिक्कों और डाक टिकट के लिए देशवासियों को बहुत- बहुत बधाई देता हूं।
(पीएम मोदी वक्तव्य, संघ के शताब्दी वर्ष समारोह के दौरान)
जन समर्थन के साथ संघ
संघ के स्वयंसेवक, देश सेवा से जुड़े अभियान में सहयोग और भागीदारी के लिए समाज के सभी वर्गों तक पहुंचने का विशेष प्रयास करेंगे। सभी के समन्वित प्रयासों के माध्यम से राष्ट्र यात्रा का अगला चरण समग्र विकास की ओर अग्रसर होगा।
(संघ के सरकार्यवाह, दत्तात्रेय होसबोले का वक्तव्य)






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