ट्रंप का तमाशा और मोदी का संयम
शरम अल-शेख में डोनाल्ड ट्रंप का तथाकथित शांति सम्मेलन दरअसल कूटनीति से अधिक व्यक्तिगत प्रचार का मंच था। प्रधानमंत्री मोदी का इसमें शामिल न होना किसी दूरी का संकेत नहीं, बल्कि भारतीय विदेश नीति की...

जब मिस्र के तटीय शहर शरम अल-शेख में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का तथाकथित “शांति सम्मेलन” आयोजित हुआ, तब पूरी दुनिया की निगाहें इस पर थीं कि कौन वहां मौजूद होगा — और कौन नहीं।
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इस कार्यक्रम से दूर रहना कुछ विश्लेषकों को अचरज लगा, लेकिन सच यह है कि यह निर्णय भावनात्मक नहीं, बल्कि गहरे राजनीतिक विवेक का परिणाम था।ट्रंप का यह आयोजन जिस तरह से “वैश्विक शांति” के मंच की बजाय व्यक्तिगत प्रशंसा और कूटनीतिक नाटकीयता का प्रदर्शन बन गया, उसने यह स्पष्ट कर दिया कि मोदी का वहां न जाना भारत की साख के अनुकूल कदम था।
यह वही ट्रंप हैं जो हर अंतरराष्ट्रीय मंच को अपने प्रचार अभियान के मंच में बदलने का हुनर रखते हैं। शरम अल-शेख में भी यही हुआ — मुद्दे गौण रहे, और ट्रंप का स्व-प्रशस्ति-गीत मुख्य आकर्षण बना रहा।प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति की मूलभूत विशेषता यही रही है — वह ‘उपस्थिति के लिए उपस्थिति’ की राजनीति नहीं करते। जहां उनकी मौजूदगी राष्ट्रीय हित को बल देती है, वे आगे रहते हैं; जहां मंच केवल तमाशा बन सकता है, वहां वे दूरी बनाए रखते हैं। यही परिपक्व नेतृत्व का संकेत है।
ट्रंप ने इस आयोजन में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज़ शरीफ़ को मंच पर बुलाया। वहां शरीफ़ ने ट्रंप की प्रशंसा में ऐसी बातें कहीं जो न केवल राजनयिक मर्यादा से परे थीं, बल्कि भारत के दृष्टिकोण से असहज करने वाली भी थीं। उन्होंने ट्रंप को एक बार फिर “नोबेल शांति पुरस्कार” के लिए अनुशंसित किया और यह तक कह दिया कि “ट्रंप ने भारत-पाकिस्तान संघर्ष को समाप्त कर दिया।”यह कथन न केवल तथ्यात्मक रूप से गलत था बल्कि भारतीय कूटनीति की धारा के खिलाफ भी था।
प्रधानमंत्री मोदी स्वयं यह स्पष्ट कर चुके हैं कि भारत और पाकिस्तान के बीच मई में हुआ युद्धविराम अमेरिकी दखल का परिणाम नहीं था, बल्कि यह द्विपक्षीय और सीमित सैन्य-रणनीतिक कारणों का परिणाम था। ऐसे में अगर मोदी उस मंच पर उपस्थित रहते, तो उन्हें यह सब प्रत्यक्ष सुनना पड़ता — और मौन रहना भारत की गरिमा के खिलाफ होता।
भारत की विदेश नीति, विशेषकर मोदी काल में, “स्वाभिमान और संवाद” के बीच एक सटीक संतुलन पर टिकी है। शरम अल-शेख जैसे मंचों पर, जहां वास्तविक वार्ता की जगह प्रचार और प्रशंसा का प्रदर्शन हो, वहां भारत का हिस्सा न बनना कोई चूक नहीं — बल्कि यह एक रणनीतिक संयम है।
मोदी का यह निर्णय यह भी दर्शाता है कि भारत अब “वैश्विक स्वीकृति” की तलाश में नहीं, बल्कि “वैश्विक प्रभाव” की राह पर है। पहले भारत को ऐसे मंचों से वैधता मिलती थी, अब भारत की अनुपस्थिति भी उन मंचों की प्रामाणिकता पर प्रश्न खड़ा कर देती है।
आज जब ट्रंप शांति की बात करते हैं, तो दुनिया यह जानती है कि उनके शब्दों का वजन उनके राजनीतिक हितों के अनुरूप बदलता है। मध्य पूर्व से लेकर दक्षिण एशिया तक, उनका दृष्टिकोण अक्सर सतही और एकतरफ़ा रहा है।
मोदी को यह भलीभांति ज्ञात है कि किसी भी “ट्रंप-शैली” की मध्यस्थता में भारत के हित सुरक्षित नहीं रह सकते।भारत ने बार-बार यह स्पष्ट किया है कि कश्मीर या भारत-पाक संबंधों में किसी तीसरे पक्ष की भूमिका स्वीकार्य नहीं। यह रुख केवल एक बयान नहीं, बल्कि भारत के संप्रभु निर्णय का आधार है।
ऐसे में मोदी का शरम अल-शेख से दूर रहना उसी नीति का व्यावहारिक रूप है।अगर मोदी उस मंच पर जाते, तो ट्रंप के मंचीय संवाद में भारत को अनावश्यक रूप से खींचा जा सकता था — और पाकिस्तान अपनी “झूठी कूटनीति” को अंतरराष्ट्रीय वैधता का रंग देने की कोशिश करता। उनकी अनुपस्थिति ने न केवल इस जोखिम को टाला, बल्कि भारत की आत्मनिर्भर कूटनीतिक सोच को भी रेखांकित किया।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि शरम अल-शेख सम्मेलन के बाद न तो कोई ठोस शांति प्रस्ताव आया, न ही किसी संघर्ष का समाधान। फिलिस्तीन की मान्यता पर कोई चर्चा तक नहीं हुई। इससे स्पष्ट है कि यह आयोजन “शांति सम्मेलन” से अधिक “राजनीतिक प्रदर्शन” था।
मोदी की अनुपस्थिति ने इस “नाटक” को और अधिक उजागर कर दिया। जब गंभीर राष्ट्र ऐसे आयोजनों से दूरी रखते हैं, तब ऐसे मंचों की सच्चाई दुनिया के सामने स्वतः प्रकट होती है। यह वही कूटनीतिक परिपक्वता है जिसने भारत को आज “वैश्विक दक्षिण” की आवाज़ बनाया है — बिना किसी नारे, बिना किसी शोर के।
भारत का शांति दृष्टिकोण ठोस है — संवाद के साथ आत्मसम्मान, सहयोग के साथ संप्रभुता। मोदी ने इसे केवल शब्दों में नहीं, बल्कि हर निर्णय में व्यवहारिक रूप दिया है। चाहे वह रूस-यूक्रेन युद्ध पर तटस्थता हो, या गाज़ा संकट पर “मानवीय विराम” की अपील — भारत ने हमेशा विवेकपूर्ण दूरी बनाए रखी है।
शरम अल-शेख में अनुपस्थित रहकर मोदी ने यह साबित किया कि सच्चा नेतृत्व कभी भी हर मंच पर उपस्थित होने में नहीं, बल्कि यह तय करने में है कि कौन सा मंच सार्थक है। कभी-कभी “अनुपस्थिति” ही सबसे मुखर वक्तव्य होती है — और इस बार वही हुआ।
अन्त में, मोदी का निर्णय न केवल कूटनीतिक दृष्टि से सही था, बल्कि प्रतीकात्मक रूप से भी यह भारत की आत्मनिर्भर विदेश नीति का सशक्त संदेश है। ट्रंप का आयोजन भले ही सुर्खियों में रहा हो, पर भारत की चुप्पी ने वहां गूँज पैदा की — एक ऐसी गूँज जो कहती है कि अब भारत दर्शक नहीं, निर्णयकर्ता है।






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