विदेशी मंचों पर कलह, ‘फूट डालो’ को न्योता क्यों?
जब राष्ट्र के भीतर वैचारिक नींव कमजोर हो, तो बाहरी मंचों पर आलोचना केवल राजनीतिक ड्रामा नहीं, बल्कि ऐतिहासिक पराजय का पूर्वाभास है। हमें अपनी तकनीकी चमक पर नहीं, बल्कि पूर्वजों की गुरुकुल-जनित नैतिक...

याद रखना होगा पुरखों का सबक
राकेश गांधी,
वरिष्ठ पत्रकार
आज भारत की अर्थव्यवस्था आगे बढ़ रही है, कूटनीतिक पहुंच बढ़ रही है और हम विश्व शक्ति बनने की दहलीज पर हैं। लेकिन इस चमकदार तस्वीर के पीछे छिपा है एक गंभीर आंतरिक संकट। और वो है हमारे नैतिक, वैचारिक और ऐतिहासिक विवेक का पतन। विशेषकर जब हमारे नेता देश के आंतरिक संघर्षों को विदेशी मंचों पर तमाशे की तरह पेश करते हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पवित्र है, लेकिन विदेशी मंचों पर हमारे विभाजन का प्रदर्शन ऐतिहासिक पराजय की आशंका को बढ़ाता है।
शक्ति सिर्फ तकनीक में नहीं
गुलामी के दर्दनाक अनुभवों से गुज़र चुका हमारा राष्ट्र जानता था कि पराजय का कारण तकनीकी या आर्थिक कमी नहीं, बल्कि वैचारिक अस्थिरता थी। पूर्वजों के गुरुकुलों ने केवल ज्ञान नहीं, चरित्र और नैतिकता भी संवारते थे। उनकी अर्थव्यवस्था केवल धन पर नहीं, बल्कि आत्म-निर्भरता और नैतिक मूल्यों पर टिकी थी। वास्तुकला, जल प्रबंधन, शहर बसाना। ये सब मौलिक बुद्धिमत्ता और समग्र सोच के प्रमाण हैं। आज तकनीक है, लेकिन नींव खोखली है।
विखंडन और आंतरिक फूट का इतिहास
नैतिकता और ज्ञान की बुलंद अवस्था को आपसी फूट ने कमजोर कर दिया। यदि इतना मजबूत समाज टूट सकता था, तो आज का भोगवादी, क्षणिक लाभ पर केंद्रित समाज कितना असुरक्षित होगा, यह सोचना ही भयावह प्रतीत होता है। पूर्वजों की सबसे बड़ी शक्ति थी सद्भाव और संवाद, जिससे विभिन्न भाषाओं और संस्कृतियों के बावजूद भारत अखंड रहा।
लेकिन राजनीतिक दुरभाव ने फूट को बढ़ावा दिया, और आज़ादी के समय देश का भूगोल विखंडित हो गया। आज हम उसी ऐतिहासिक चौराहे पर खड़े हैं।
लोकतंत्र का स्याह पक्ष
आज के लोकतंत्र में कई लोग निष्क्रिय हो चुके हैं। राजनीतिक दल प्रलोभन और भावनात्मक राजनीति का सहारा लेते हैं, और आम नागरिक निष्क्रिय लाभार्थी बन जाता है। इस भोगवादी समाज को विदेशी हस्तक्षेप और आंतरिक दुर्भावनाओं के लिए आसान शिकार बना दिया गया है।
घर के मामले घर तक ही रहने दें
विदेशी मंचों पर आलोचना अब सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप नहीं, बल्कि हमारी वैचारिक दरारों का प्रदर्शन है। विदेशी शक्तियां अब तलवार नहीं, सूचना युद्ध, आर्थिक अस्थिरता और आपसी मतभेद के माध्यम से हस्तक्षेप करेंगी। समाधान कानून या प्रतिशोध में नहीं, बल्कि राजनीतिक आत्म-अनुशासन में है।
सत्ता पक्ष को चाहिए कि विपक्ष को सम्मान और गंभीरता से सुनें, राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति पर गोपनीय संवाद की व्यवस्था करें व मुद्दे देश के भीतर ही सुलझाएं। विपक्ष को भी याद रखना होगा कि सरकार की आलोचना उनका अधिकार है, लेकिन राष्ट्र की गरिमा को दांव पर नहीं लगाना चाहिए।
शक्ति का वास्तविक स्रोत
भारत की सुरक्षा और शक्ति तकनीक या आर्थिक चमक में नहीं, बल्कि: नेताओं की नैतिक एकजुटता व जनता के वैचारिक विवेक में निहित है। इतिहास को दोहराने से बचने का एकमात्र मार्ग है घर के मामले घर में सुलझाना।






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