धधकते सपनों का अंत: बाड़मेर की उस रात की दर्दभरी कहानी
राजस्थान के बाड़मेर जिले में देर रात एक दर्दनाक हादसे में पांच दोस्तों की स्कॉर्पियो ट्रक से टकराने के बाद आग की लपटों में घिर गई। चार युवकों की मौके पर ही जलकर मौत हो गई, जबकि चालक गंभीर रूप से घायल...

रात का सन्नाटा था। थार के रेगिस्तान की हवा में हल्की ठंडक घुली हुई थी। बाड़मेर जिले के सिणधरी थाने के पास सादा गांव की सड़क पर कुछ लोग अपनी गाड़ियों में गुजर रहे थे, तो कुछ गांव लौटने की तैयारी में थे। लेकिन उसी सन्नाटे को एक दिल दहला देने वाली चीख ने चीर दिया — एक स्कॉर्पियो कार आग के गोले में तब्दील हो चुकी थी।
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आग में जले चार दोस्त, सपनों की राख रह गई
रात करीब 1:30 बजे, दबरा गांव के पाँच दोस्त — मोहन सिंह (35), शंभू सिंह (20), पंचाराम (22), प्रकाश (28) और चालक दिलीप सिंह — सिणधरी से काम खत्म कर अपने गांव लौट रहे थे। रास्ता खाली था, आसमान पर बस कुछ तारे थे। पर नियति को शायद कुछ और ही मंज़ूर था। लगभग 30 किलोमीटर पहले, सामने से आती एक ट्रेलर गाड़ी ने अचानक मोड़ पर उन्हें टक्कर मार दी। टक्कर इतनी ज़ोरदार थी कि पल भर में स्कॉर्पियो जल उठी। दरवाज़े बंद, आग भीतर – चीखें बाहर तक।आग ने गाड़ी को कुछ सेकंड में निगल लिया। चारों दोस्त अंदर फंस गए। बाहर निकलने की कोई राह नहीं बची थी। लोग दौड़े, मगर लपटें इतनी तेज थीं कि कोई पास नहीं जा सका।
गांव के लोग बताते हैं कि कार के भीतर से निकलती चीखें, हवा में गूंजती रहीं… पर आग ने सबकुछ निगल लिया। मोहन, शंभू, पंचाराम और प्रकाश — चारों की मौत मौके पर ही हो गई। उनकी उम्रें 20 से 35 के बीच थीं। किसी के घर में मां-बाप इंतज़ार कर रहे थे, किसी की मंगनी हाल ही में तय हुई थी, और किसी का बच्चा अभी चलना सीख ही रहा था। चारों के शरीर जलकर राख हो गए — बस नाम, पहचान और कुछ अधूरे सपने ही बचे।
ज़िंदा बचा सिर्फ़ दिलीप – वो भी जंग लड़ रहा है
ड्राइवर दिलीप सिंह किसी चमत्कार की तरह ज़िंदा बच गया, लेकिन उसकी हालत गंभीर है। वो अस्पताल में ज़िंदगी और मौत के बीच झूल रहा है। डॉक्टरों के मुताबिक, “उसका 60 प्रतिशत शरीर जल चुका है, पर उसकी सांसें अभी भी जिद पर अड़ी हैं।”
हाईवे पर अफरा-तफरी
इस हादसे के बाद हाईवे पर लंबा जाम लग गया। पुलिस और बचाव दल तुरंत मौके पर पहुंचे, पर गाड़ी तब तक राख बन चुकी थी। करीब एक घंटे की मशक्कत के बाद सड़क को दोबारा खोला जा सका। लेकिन जो गुजर चुका था, उसे लौटाया नहीं जा सकता था — न वो चार जवान ज़िंदगियां, न उनके सपनों की लौ।
एक के बाद एक हादसे — सवाल उठते हैं
यह हादसा तब हुआ, जब कुछ ही दिन पहले जैसलमेर बस हादसे में 21 यात्रियों की जलकर मौत हो गई थी। लगातार ऐसी घटनाओं ने राजस्थान में सड़क सुरक्षा और वाहन रखरखाव पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं।क्यों हमारे वाहन आग पकड़ते हैं? क्यों हर सड़क पर मौत इंतज़ार करती दिखती है? क्यों हमारे आपात बचाव तंत्र हादसे के बाद ही जागते हैं?
गांव में मातम का सन्नाटा
दबरा गांव में उस रात किसी ने नींद नहीं ली। सवेरे जब जली हुई कार से चारों के शव निकाले गए, तो पूरा गांव रो पड़ा। एक बूढ़ी मां बेहोश हो गई, किसी ने अपने बेटे का नाम पुकारा — लेकिन जवाब में सिर्फ़ राख उड़ी। चारों परिवारों के घरों में अब चूल्हा नहीं जल रहा, बस आंखें जल रही हैं। एक रिश्तेदार ने कहा — “वो सब साथ निकले थे, हंसते हुए। कोई नहीं जानता था कि वही सफर उनका आखिरी होगा।”
मौत से भी बड़ा सवाल – जिम्मेदारी किसकी?
हर बार की तरह इस बार भी जांच के आदेश दिए गए हैं। लेकिन लोग पूछ रहे हैं —क्या जांच से लौट आएंगे उनके बच्चे? क्या जिम्मेदारों को कभी सज़ा मिलेगी?राजस्थान में एक के बाद एक हादसे यह दिखा रहे हैं कि सड़कें अब सफर नहीं, जोखिम बन चुकी हैं। वाहनों की नियमित जांच, चालकों की ट्रेनिंग, हाईवे की सुरक्षा – सब कुछ बस कागजों में सीमित है।
अधूरे सपनों की कहानी
मोहन सिंह अपने गांव में एक किराने की दुकान खोलना चाहता था, ताकि बूढ़े पिता खेती छोड़ सकें। शंभू हाल ही में कॉलेज पास कर अपने भाई की मदद के लिए शहर आया था।पंचाराम ने नया फोन लिया था, अपनी बहन की शादी की तैयारी के लिए पैसे जोड़ रहा था। प्रकाश अपनी मां को तीर्थ यात्रा पर ले जाने का सपना देख रहा था। अब ये सपने भी उन लपटों में जलकर खत्म हो गए — बस यादें बाकी हैं।
राजस्थान की सड़कों पर मौत की परछाई
जैसलमेर, बाड़मेर, जोधपुर… हर कुछ दिनों में ऐसी खबरें आती हैं। कभी बस जलती है, कभी ट्रक पलटता है, कभी जीप टकराती है। हर बार मौतें होती हैं, और फिर वही शब्द — “मुआवजा”, “जांच”, “सुरक्षा निर्देश”।लेकिन असली सवाल यही है —कब तक हमारे युवा इसी तरह सड़कों पर जलते रहेंगे? कब तक कोई मां अपने बेटे का चेहरा पहचानने से पहले राख देखेगी?
अंत की शुरुआत उसी रात हुई थी
रात के उस अंधेरे में चार जिंदगियां बुझ गईं, लेकिन एक उम्मीद बाकी है — कि शायद अब शासन और समाज दोनों जागें। क्योंकि जब कोई सड़क मौत का रास्ता बन जाए, तो सिर्फ़ इंजन नहीं, संवेदनाएं भी जलने लगती हैं। यह कहानी केवल एक हादसे की नहीं, बल्कि उस दर्द की है जो हर उस घर में है जहां कोई बेटा लौटा नहीं। और जब भी कोई हाईवे पर जलती गाड़ी देखे, तो उसे याद रहे —कभी उसमें भी कोई मुस्कुराता चेहरा था,जो ज़िंदगी से लौटने का वादा करके निकला था।






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