सोने-चांदी के भाव की आग में कौन डाल रहा है घी?
दिवाली से पहले इस बार सोने-चांदी के भावों में जो आग लगी है, उसने हर घर और हर जेब में चिंता की लकीरें खींच दी...

बाज़ार के जानकार बताते हैं कि इस आग में सबसे ज्यादा घी डाल रहे हैं दुनिया के बड़े केंद्रीय बैंक और संस्थागत निवेशक। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता, युद्ध की आशंका और डॉलर की कमजोरी ने सोने को एक बार फिर “सेफ हेवन” बना दिया है। अमेरिका, रूस और यूरोप के साथ चीन ने भी पिछले कुछ महीनों में भारी मात्रा में सोना खरीदा है। चीन की यह बढ़ी हुई गोल्ड खरीद कई अर्थशास्त्रियों को चौंका रही है। यह वही चीन है जो अपनी मुद्रा “युआन” को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर डॉलर के विकल्प के रूप में खड़ा करना चाहता है। कई विशेषज्ञ मानते हैं कि चीन जानबूझकर अपनी विदेशी मुद्रा भंडार का बड़ा हिस्सा सोने में बदल रहा है ताकि भविष्य में वैश्विक वित्तीय संतुलन पर उसकी पकड़ और मजबूत हो सके। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है। क्या सोने की कीमतों की यह आग कहीं चीन की चालाकी का नतीजा तो नहीं?
रुपए की कमजोरी ने भी इस आग में अपना हिस्सा जोड़ा है। भारत अपनी जरूरत का ज़्यादातर सोना आयात करता है, और जब डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर पड़ता है तो आयात महंगा हो जाता है। इसका सीधा असर घरेलू बाज़ार में दिखता है। व्यापारी बताते हैं कि इस बार आयात शुल्क, माल ढुलाई और रुपये की गिरावट। तीनों ने मिलकर सोने को और मंहगा कर दिया है।
इतना ही नहीं, आपूर्ति-श्रृंखला में आई रुकावट और बढ़ते अंतरराष्ट्रीय दामों के चलते कई जगहों पर कानूनी आयात कम हुआ है। इसकी वजह से अवैध रास्तों से सोना लाने वालों की सक्रियता भी बढ़ गई है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, त्योहारों से पहले स्मगलिंग की घटनाओं में वृद्धि हुई है। कुछ स्थानीय बाजारों में तो सोना सरकारी दर से ऊपर प्रीमियम पर बिक रहा है।
दूसरी ओर, निवेशक वर्ग गोल्ड ईटीएफ और डिजिटल गोल्ड में पैसा झोंक रहा है। शेयर बाज़ार की अनिश्चितता से परेशान लोग सोने को भरोसेमंद ठिकाना मानकर उसकी ओर लौटे हैं। ऐसे में संस्थागत और व्यक्तिगत दोनों स्तरों पर बढ़ती मांग ने कीमतों को और ऊंचा चढ़ा दिया।
अब बात चांदी की करें तो हालात कुछ अलग नहीं हैं। चांदी का यह उछाल सिर्फ निवेश की वजह से नहीं बल्कि औद्योगिक मांग के चलते भी है। सौर ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिक्स और नई तकनीक वाले उद्योगों में चांदी की खपत तेजी से बढ़ी है। इसीलिए चांदी ने इस साल सोने से भी ज्यादा रफ्तार पकड़ी है। पूजा-पाठ के लिए छोटे सिक्के और दिव्य प्रतीकों की खरीद में भी लोगों की रुचि बनी हुई है, जिससे स्थानीय बाजारों में इसकी मांग और बढ़ गई है।
धनतेरस की खरीदारी पर इस पूरे घटनाक्रम का मिला-जुला असर दिखाई दे रहा है। लोग खरीद तो रहे हैं, लेकिन मात्रा सीमित कर दी है। दुकानदार कहते हैं कि पहले जहां परिवार पूरा सेट खरीदता था, अब वही ग्राहक अंगूठी या छोटी चेन तक सीमित हो रहा है। कुछ जगहों पर तो दुकानदारों को पुराना स्टॉक ही ऊंची दरों पर बेचने का मौका मिल गया है, जबकि नई खेप मंगवाना महंगा पड़ रहा है।
कुल मिलाकर कहा जाए तो सोने-चांदी की कीमतों में आग केवल त्योहारों की भावना से नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था, निवेश की रणनीतियों और मुद्रा बाजार की हलचल से भड़की है। युद्ध, अस्थिरता और मुद्रास्फीति की आशंका ने सोने को फिर से वह पुराना गौरव दिला दिया है, जब मुश्किल समय में लोग कहते थे “सोना ही असली सहारा है।”
लेकिन अब यह आशंका भी उभर रही है कि कहीं इस सारी चमक के पीछे चीन की कोई चाल तो नहीं, जो दुनिया की आर्थिक दिशा को सोने के जरिये बदलने की तैयारी में है। यदि ऐसा है, तो यह केवल बाजार की कहानी नहीं, बल्कि एक वैश्विक रणनीति की शुरुआत हो सकती है। फिलहाल तो बस इतना कहा जा सकता है । इस दीवाली सोने की कीमत में जितनी रौनक है, उतनी ही चिंता भी।





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