असरानी : जयपुर की मुस्कान, जो अब सन्नाटे में भी सुनाई देती है
असरानी का जन्म 1 जनवरी 1941 को जयपुर में हुआ था। उनके पिता एक सिंधी परिवार से थे जिन्होंने विभाजन के बाद जयपुर में कालीन का व्यवसाय शुरू किया। इस शहर की मिट्टी ने असरानी को जो संवेदनशीलता दी, वही आगे...

जयपुर की गुलाबी गलियों में कभी एक बालक सेंट जेवियर्स स्कूल से लौटते हुए अपने साथियों को नकलें करके हँसाया करता था। वही बालक आगे चलकर भारत की हँसी का सबसे उजला चेहरा बना। वही असरानी, जिनकी मुस्कान किसी उदास चेहरे को भी रोशन कर दे, अब इस संसार से विदा हो गए। 20 अक्टूबर 2025 की सुबह मुंबई में 84 वर्ष की आयु में उन्होंने अंतिम साँस ली। पर यह कहना कि असरानी चले गए, शायद अधूरा वाक्य है क्योंकि उनकी हँसी अब भी जयपुर की हवा में घुली हुई है, जैसे किसी पुराने ग्रामोफोन रिकॉर्ड की धुन जो रुकने के बाद भी कानों में गूँजती रहती है।
असरानी का जन्म 1 जनवरी 1941 को जयपुर में हुआ था। उनके पिता एक सिंधी परिवार से थे जिन्होंने विभाजन के बाद जयपुर में कालीन का व्यवसाय शुरू किया। इस शहर की मिट्टी ने असरानी को जो संवेदनशीलता दी, वही आगे चलकर उनके अभिनय की आत्मा बनी। उन्होंने सेंट जेवियर्स स्कूल से पढ़ाई की और राजस्थान कॉलेज से स्नातक की डिग्री प्राप्त की। छात्र जीवन में ही वे रेडियो कार्यक्रमों में भाग लेने लगे ताकि पढ़ाई का खर्च उठा सकें। शायद वहीं से उनकी आवाज़ में वो जादू आया, जो आगे जाकर सिनेमा के परदों पर गूँजा।
जयपुर ने उन्हें अभिनय का संस्कार दिया, और उन्होंने उसे जीवन का अर्थ बना लिया। रवींद्र मंच के आसपास की हलचलें, नाट्य मंडलियों की गंध, और जयपुर की ठंडी हवा में तैरती संवादों की ध्वनि । इन सबने उनके भीतर कलाकार का बीज बोया। यही बीज पुणे के फिल्म एंड टेलीविज़न इंस्टिट्यूट तक पहुँचा, जहाँ से असरानी ने अभिनय की औपचारिक शिक्षा ली। लेकिन जो सहजता उनके अभिनय में दिखी, वह जयपुर की गलियों से मिली थी, किसी पाठशाला से नहीं।
आंखों में शरारत
जब वे ‘शोले’ के जेलर बने, तो उनकी आँखों में वही शरारत थी जो जयपुर के किसी किशोर में होती है सख्त शब्दों में भी मिठास, और अनुशासन में भी विनोद। उस किरदार के पीछे उनका पूरा शहर खड़ा था, जो अपने रंगों और मिज़ाज में खुद एक जीवंत नाटक है। उनकी फिल्मों ‘अभिमान’, ‘चुपके चुपके’, ‘बावर्ची’, ‘आ अब लौट चलें’ में जो सादगी और आत्मीयता दिखी, वह जयपुर की जीवन-धारा की तरह थी , धीमी, पर गहरी।
बीस अक्टूबर की शाम जब उनके निधन की खबर आई, तो मानो जयपुर के आकाश का रंग कुछ पल को फीका पड़ गया। हवामहल की झरोखों से बहती हवा जैसे ठहर गई हो, मानो वह भी अपने बेटे की विदाई पर मौन हो गई हो। शहर ने एक बार फिर महसूस किया कि उसकी मुस्कान किसी दूर आसमान में खो गई है।
पर असरानी वास्तव में गए नहीं हैं। वे उस ठहाके में हैं जो किसी पुराने सिनेमा हॉल में आज भी सुनाई देता है। वे उस संवाद में हैं जो बच्चों की ज़ुबान पर चढ़ा है।असरानी, तुम गए नहीं ! बस परदे के उस पार चले गए हो जहाँ से कभी-कभी हँसी की एक झलक फिर लौट आती है। जयपुर तुम्हें हमेशा याद रखेगा, क्योंकि तुम इस शहर की आत्मा की वह मुस्कान हो, जो अब सन्नाटे में भी सुनाई देती है।






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