क्या तेजस्वी ने डाल दिए मोदी-शाह के सामने हथियार
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में महागठबंधन की आंतरिक कलह ने एनडीए को अप्रत्याशित बढ़त दे दी है। राजद, कांग्रेस और वाम दलों के बीच सीटों के बंटवारे पर सहमति न बन पाने से पहले चरण की कई सीटों पर अपने ही...

बिहार चुनाव 2025 में लगता है कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी की मेहनत और बिहार में राष्ट्रीय जनता दल की अगुवाई वाले महागठबंधन की उम्मीदों पर पानी फिर गया है। एनडीए में सिर फुटव्वल और बिहार के मुख्यमंत्री व जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के नेता नीतीश कुमार के सियासी भविष्य को लेकर लग रही अटकलों और चुनाव बाद अपना मुख्यमंत्री बनाने की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की सियासी चालों के बीच एनडीए में दिख रहा झगड़ा भी अब तो महागठबंधन की रार के आगे सामान्य सा नजर आ रहा है।
हालत यह हो गई है कि महागठबंधन पहले चरण की 121 सीटों पर नामांकन की आखिरी तारीख निकल जाने के बाद भी सीटों का बंटवारा नहीं कर पाया। अब हालत यह हो रही है कि पहले चरण की लगभग 10 सीटों पर महागठबंधन के प्रत्याशी ही आपस में वोट काटने के लिए चुनाव मैदान में उतर गए हैं। इनमें अधिकांश वो सीटें हैं, जहां महागठबंधन में शामिल राजद, कांग्रेस और सीपीआई (माले) के उम्मीदवारों के जीतने की पूरी उम्मीद थी। इन सीटों में वैशाली, तारापुर, बछवड़ा, गौरूबोरामस लालगंज, कहलगांमस राजापकड़, रोसड़ा, बिहारशरीफ जैसी सीटें शामिल हैं। एनडीए ने इन सीटों पर अपने बंटवारे के अनुरूप उम्मीद्वार उतारे हैं तो महागठबंधन के प्रत्याशी आपस में ही एक दूसरे के वोट काटेंगे।
जानकार कहते हैं कि 2015 के चुनाव में लालू यादव की पार्टी राजद और कांग्रेस कुछ सीटों के अंतर की वजह से ही सरकार बनाने से रह गई थी और इस बार भी यदि ऐसा होता है तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। खासकर उस स्थिति में जब लालू के वारिस तेजस्वी यादव ने कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष राजेश राम के सामने ही अपनी पार्टी का प्रत्याशी खड़ा कर दिया हो। वह भी तब, जब राजेश राम दो बार से कोटुम्बा विधानसभा क्षेत्र से विधायक बन रहे हैं। हालांकि वहां दूसरे चरण में चुनाव होना है, लेकिन हालात और महागठबंधन में बिखराव का अंदाजा तो इस से लगाया ही जा सकता है।
अब सवाल उठता है कि जब राहुल और तेजस्वी पिछले आठ महीने से बिहार में बदलाव की कोशिश कर रहे थे। सोलह दिन तक जब राहुल गांधी ने वोट अधिकार यात्रा निकाल कर माहौल बनाया। लोगों का कुछ भरोसा दिखा और बदलाव की उम्मीद बंधने लगी। इसी तरह कांग्रेस नेता कन्हैया कुमार की रोजगार यात्रा से माहौल पक्ष का बनने लगा तो आठ दस सीटें कुर्बान करने की बजाय तेजस्वी और राहुल के सिपहसालार ऐसा क्यों उलझ गए कि सीटों का बंटवारा तक नहीं हो सका। कुछ लोग इसमें तेजस्वी की भूमिका को संदेह की नजर से देख रहे हैं। कहा जा रहा है कि ‘मर जाना, मगर दलिया नहीं खाना’ की तर्ज पर कभी भाजपा से हाथ नहीं मिलाने वाले लालू यादव की पार्टी राजद को क्या हो गया कि दिल्ली की एक अदालत में आईआरसीटीसी के लैंड फॉर जॉब मामले में आरोप तय होने के दिन से ही महागठबंधन की गाड़ी पटरी से उतरना शुरू हो गई और अब यह पूरी तरह से डिरेल होने की स्थिति तक पहुंच गई है। क्या तेजस्वी यादव ने केंद्रीय एजेंसियों के डर से मोदी-शाह के सामने हथियार डाल दिए हैं ताकि ईडी-सीबीआई के चक्रव्यूह से बाहर आ सके? क्या सरकारी एजेंसियों के डर से तेजस्वी ने भी अपनी पार्टी को मायावती और बहुजन समाज पार्टी की राह पर ले जाने का फैसला कर लिया है? अगर ऐसा है तो यह बिहार की जनता के साथ विश्वासघात ही नहीं, लोकतंत्र पर भी एक परोक्ष प्रहार से कम नहीं है।
तेजस्वी यादव पर अंगुली उठाने वाले इसे ही अमित शाह के उस बयान से भी जोड़ रहे हैं, जो अब नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री बनने के सवाल पर कह रहे हैं कि मुख्यमंत्री कौन होगा, यह फैसला चुनाव परिणामों के बाद में किया जाएगा। क्यों ये कहा जा रहा है कि भाजपा-एनडीए को इस बार अब तक की सबसे बड़ी जीत मिलेगी। जबकि अब तक मोदी-शाह कह रहे थे कि बिहार का चुनाव नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही लड़ा जा रहा है। शाह ने तो महागठबंधन के बढ़ते असर की खबरों के बीच जीत सकने वाली सींटों का आंकड़ा तक घटा दिया था, लेकिन अब क्या हो गया कि सुर ही बदल गए हैं। इसका पता तो बिहार चुनाव के नतीजों से ही सामने आएगा, लेकिन राजनीति में कैसे जीती हुई बाजी कोई हार जाता है, यह महागठबंधन की हालत से अंदाज लगाया जा सकता है।






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