काबिल शिक्षक, बेबस व्यवस्था
सरकारी स्कूलों में शिक्षक सबसे बेहतरीन हैं, फिर भी अधिकारियों का अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाना, व्यवस्था पर एक मौन अविश्वास है। आज शिक्षा केवल करियर की दौड़ और दिखावा (स्टेटस सिंबल) बन...

सरकारी स्कूल का दर्द : अधिकारी बनाम आमजन की आस्था
राकेश गांधी,
वरिष्ठ पत्रकार
Table Of Content
- सरकारी स्कूल का दर्द : अधिकारी बनाम आमजन की आस्था
- प्रशिक्षित शिक्षक, ख़राब नतीजे
- शिक्षकों को आज़ादी कब?
- ‘स्टेटस सिंबल’ का आकर्षण
- शैक्षिक परिवेश और भाषा का प्रभुत्व
- धारणा बदलने के लिए असरदार कदम
- नैतिक और कानूनी दबाव : एक अंतरराष्ट्रीय तुलना
- न्यायपालिका का हस्तक्षेप
- आस्था बहाली का संकल्प और प्रशासनिक दायित्व
- कितने कारगर साबित होंगे शिक्षा मंत्री के नए निर्देश?
- टाई पहनने पर रोक बरकरार
- शिक्षकों की दोहरी हाजिरी
देश का भविष्य हमारी सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था की नींव पर टिका है। भारत में यह एक विशालकाय तंत्र है जो ग्रामीण से लेकर शहरी क्षेत्रों तक करोड़ों बच्चों के भविष्य को आकार देता है। यह एक अटल और सर्वमान्य तथ्य है कि सरकारी स्कूलों में नियुक्त शिक्षक, निजी स्कूलों के शिक्षकों से कहीं ज़्यादा प्रशिक्षित, बेहतर योग्यताधारी और कठोर चयन प्रक्रिया से गुज़रकर आते हैं। उनकी अकादमिक योग्यता, प्रशिक्षण की गहनता और प्रशासनिक चयन का स्तर अक्सर निजी शिक्षा संस्थानों से ऊंचा होता है।
इसके बावजूद, एक कड़वी सच्चाई हमारे सामने है। उच्च प्रशासनिक पदों पर बैठे अधिकारी, विधायक या अन्य नेता, यहां तक कि स्वयं शिक्षा विभाग के निदेशक और ज़िला शिक्षा अधिकारी भी अपने बच्चों को निजी (प्राइवेट) स्कूलों में पढ़ाना पसंद करते हैं।
यह व्यवहार समाज को एक सीधा और अत्यंत शक्तिशाली संदेश देता है, जिसे ज़ुबान से कहने की ज़रूरत नहीं है: ‘सरकारी स्कूलों में पढ़ाई अच्छी नहीं होती।’ यह धारणा, प्रशिक्षित शिक्षकों के समर्पण, उनकी योग्यता और सरकार के हज़ारों करोड़ के शैक्षिक प्रयासों पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाती है। अधिकारियों का यह ‘चुपचाप किया गया अविश्वास’ सार्वजनिक विश्वास की नींव को खोखला करता है और शैक्षिक समानता के संवैधानिक लक्ष्य को गंभीर चुनौती देता है।
यह विडंबना तब और अधिक गहरी हो जाती है जब हम देखते हैं कि सरकारी स्कूलों का ढांचा अक्सर बड़ा, समावेशी और सभी वर्गों के लिए खुला होता है, लेकिन समाज के उच्च वर्ग (विशेषकर सरकारी सेवकों) के पलायन के कारण, वे केवल आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों तक सिमट कर रह जाते हैं। इस दोहरे मापदंड ने सरकारी शिक्षा की गरिमा और प्रतिष्ठा को गंभीर ठेस पहुंचाई है।
प्रशिक्षित शिक्षक, ख़राब नतीजे
सबसे काबिल शिक्षक सरकारी स्कूल में हैं, फिर भी अधिकारी वर्ग क्यों निजी संस्थानों की ओर भागता है? इस जटिल समस्या की जड़ें केवल ‘पढ़ाई’ की गुणवत्ता में नहीं हैं, बल्कि यह व्यापक प्रशासनिक, सामाजिक, आर्थिक और संरचनात्मक पहलुओं में निहित हैं।
सरकारी स्कूलों में जवाबदेही का ढांचा निजी स्कूलों जितना कठोर नहीं होता। सरकारी नौकरी की सुरक्षा अक्सर कुछ शिक्षकों को अपने प्रदर्शन को लगातार बेहतर बनाने के लिए प्रेरित नहीं करती। अधिकारी यह बात भली-भांति जानते हैं कि शिक्षक की उपस्थिति तो सुनिश्चित है, पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षण की गारंटी नहीं है। निजी स्कूलों में जहां माता-पिता का दबाव और प्रबंधन का सीधा हस्तक्षेप होता है, वहीं सरकारी स्कूलों में आंतरिक मूल्यांकन और शिक्षक प्रदर्शन रेटिंग (टीपीआर) को प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया जाता। नतीजतन, कई बार शिक्षक की योग्यता होते हुए भी प्रदर्शन का ग्राफ गिरता जाता है।
शिक्षकों को आज़ादी कब?
यह शायद सबसे बड़ी प्रशासनिक विसंगति है। सरकारी शिक्षकों को जनगणना, चुनाव ड्यूटी, आपदा प्रबंधन, मिड-डे मील प्रबंधन, सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों की पहचान और ढेर सारे अन्य गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगा दिया जाता है। शिक्षक अपनी ऊर्जा, समय और मानसिक संसाधन का बड़ा हिस्सा इन प्रशासनिक कार्यों में खर्च कर देते हैं। जब एक शिक्षक का बड़ा हिस्सा समय कागज़ों को भरने और प्रशासनिक जिम्मेदारियों को निभाने में चला जाता है, तो वह कक्षा में नवाचार करने और बच्चों को पढ़ाने पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाता। इससे उनके मूल कार्य (शिक्षण) की गुणवत्ता बाधित होती है।
‘स्टेटस सिंबल’ का आकर्षण
सरकारी अधिकारी अपने बच्चों के लिए केवल अकादमिक ज्ञान नहीं, बल्कि एक संपूर्ण शैक्षिक अनुभव और एक सामाजिक पहचान चाहते हैं। इस मोर्चे पर सरकारी स्कूल अक्सर पीछे रह जाते हैं। भले ही सरकार ने स्कूलों में सुधार के लिए भारी निवेश किया हो, लेकिन निजी स्कूलों के वातानुकूलित क्लासरूम, स्विमिंग पूल, उन्नत स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स और अत्याधुनिक लैब्स जैसी ‘स्टेटस सिंबल’ वाली चमक-दमक सरकारी स्कूलों में सामान्यतः नहीं मिलती। यह भौतिक अंतर उच्च और मध्यम वर्ग को निजी शिक्षा की ओर खींचता है।
शैक्षिक परिवेश और भाषा का प्रभुत्व
उच्च शिक्षा और कॉर्पोरेट जगत में अंग्रेजी के प्रभुत्व के कारण, अधिकांश अधिकारी अंग्रेजी माध्यम के निजी स्कूलों को प्राथमिकता देते हैं। सरकारी स्कूलों में हिंदी या क्षेत्रीय भाषा माध्यम का होना या अंग्रेजी शिक्षण पर अपर्याप्त ध्यान देना, इस पलायन का एक प्रमुख कारण है। इसके अतिरिक्त, अधिकारी वर्ग यह मानता है कि निजी स्कूलों में उनके बच्चों को बेहतर सामाजिक पृष्ठभूमि और उच्च अकादमिक प्रेरणा वाले सहपाठी मिलेंगे। सरकारी स्कूलों में आर्थिक रूप से कमज़ोर पृष्ठभूमि के बच्चों की अधिकता को वे अक्सर अपने बच्चे की ‘समग्र उन्नति’ के लिए नकारात्मक कारक मान लेते हैं।
सबसे बड़ी विसंगति स्वयं सरकारी अधिकारियों का ‘दोषपूर्ण विश्वास’ है। जो अधिकारी शिक्षा नीतियां बनाते हैं, उनका ही अपनी बनाई व्यवस्था पर भरोसा न होना, आम आदमी के शक को यकीन में बदल देता है। दूसरी ओर, निजी स्कूल अभिभावक-शिक्षक बैठकों को बहुत औपचारिक और अनिवार्य बनाते हैं। सरकारी स्कूलों में यह संवाद अक्सर कमज़ोर होता है, जिससे अभिभावक बच्चों की प्रगति के प्रति आश्वस्त नहीं हो पाते और उनका विश्वास डगमगाता है।
धारणा बदलने के लिए असरदार कदम
सरकारी शिक्षा की गरिमा और आम जनता के भरोसे को लौटाने के लिए साहसिक, व्यापक और बहु-आयामी सुधार चाहिए। यह केवल सुविधाएं बढ़ाने का नहीं, बल्कि ईमानदारी और प्रशासनिक आत्मविश्वास बहाल करने का प्रश्न है।
प्रशासनिक सख्ती और खुद का इस्तेमाल : यह सबसे शक्तिशाली कदम होगा, जो तुरंत आम सोच बदल सकता है। नीति निर्माताओं, आईएएस, आईपीएस अधिकारियों, निर्वाचित प्रतिनिधियों और ख़ासकर शिक्षा विभाग के बड़े अधिकारियों के लिए यह अनिवार्य या ज़बरदस्त प्रोत्साहन वाला नियम बनना चाहिए कि वे अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में ही पढ़ाएं। अगर ज़िले का कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक या शिक्षा निदेशक अपने बच्चे को स्थानीय सरकारी स्कूल में पढ़ाना शुरू कर दे, तो आम लोगों का भरोसा रातों-रात लौट आएगा। यह एक मज़बूत उदाहरण होगा और व्यवस्था को आत्म-सुधार के लिए प्रेरित करेगा।
शिक्षकों की ज़िम्मेदारी : शिक्षकों को चुनाव, जनगणना, आपदा प्रबंधन जैसे सभी गैर-शैक्षणिक कार्यों से पूरी तरह मुक्त किया जाए। उनका पूरा समय, ऊर्जा और फोकस केवल नवाचारी शिक्षण पर लगना चाहिए। शिक्षकों के प्रमोशन, इन्क्रीमेंट और पोस्टिंग को सीधे उनके छात्रों के सीखने के नतीजों और स्कूल के समग्र प्रदर्शन से जोड़ा जाना चाहिए। प्रभावी शिक्षक प्रदर्शन रेटिंग (टीपीआर) को कठोरता से लागू किया जाए। साथ ही, शिक्षकों को केवल पाठ्यक्रम पूरा करने वाला नहीं, बल्कि स्कूल लीडर के रूप में प्रशिक्षित किया जाए, ताकि वे स्कूल प्रबंधन, नवाचार और समुदाय के साथ जुड़ाव में नेतृत्व कर सकें।
‘मॉडल स्कूल’ का विकास : प्रत्येक ज़िले में एक या दो ‘मॉडल सरकारी स्कूल’ स्थापित किए जाएं, जहां निजी स्कूलों जैसी ही उच्च-स्तरीय भौतिक सुविधाएं हों और उन्हें पूरी तरह अंग्रेजी माध्यम (या उच्च गुणवत्ता के द्विभाषी माध्यम) में संचालित किया जाए। यह मॉडल उच्च और मध्यम वर्ग के अधिकारियों को आकर्षित करने का काम करेगा। इसके अलावा, स्कूलों को उन्नत कंप्यूटर लैब, स्मार्ट क्लासरूम और व्यावसायिक शिक्षा के लिए जरूरी उपकरणों से लैस किया जाए, जो आधुनिक करियर की मांग को पूरा करते हों। सिर्फ़ अकादमिक ज्ञान नहीं, बल्कि खेलकूद, कला और संस्कृति को भी पाठ्यक्रम का ज़रूरी हिस्सा बनाया जाए, जिससे बच्चों का सर्वांगीण विकास हो सके।
पारदर्शिता और सामुदायिक भागीदारी : माता-पिता-शिक्षक संघ और स्कूल प्रबंधन समिति को शक्तिशाली और सक्रिय बनाकर उन्हें स्कूल के फैसलों में वास्तविक हिस्सेदारी दी जाए। साथ ही, सरकारी स्कूलों के नतीजों, शिक्षकों की योग्यता और वार्षिक प्रगति रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाए। पारदर्शिता से ही आम जनता का भरोसा बढ़ता है। पुराने छात्रों (एल्यूमिनी) को स्कूल से जोड़ने और उनके योगदान को प्रोत्साहित करने के लिए प्रभावी कार्यक्रम चलाए जाएं।
नैतिक और कानूनी दबाव : एक अंतरराष्ट्रीय तुलना
भारत में सरकारी व्यवस्था से अधिकारियों का यह चुपचाप ‘मुंह मोड़ना’ केवल सामाजिक धारणा का विषय नहीं है, यह नैतिक और प्रशासनिक जवाबदेही का भी प्रश्न है। दुनिया के कई प्रगतिशील देशों में, जहां शिक्षा प्रणाली को श्रेष्ठ माना जाता है, ऐसी विसंगति बर्दाश्त नहीं की जाती। फिनलैंड और जर्मनी जैसे दुनिया के श्रेष्ठ शिक्षा प्रणालियों वाले देशों में सरकारी स्कूल ही सबसे बड़ी पसंद हैं और उन्हें गुणवत्ता का मानक माना जाता है। वहां राजनीतिक या उच्च पदों पर बैठे लोग भी अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में ही भेजते हैं। यह बताता है कि गुणवत्ता और विश्वास प्रशासनिक नेतृत्व और उच्च नैतिक मानकों से ही पैदा होता है।
न्यायपालिका का हस्तक्षेप
भारत में भी इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 2015 में सरकारी कर्मचारियों, नेताओं और न्यायपालिका से जुड़े लोगों के बच्चों को अनिवार्य रूप से सरकारी प्राथमिक स्कूलों में पढ़ाने का ऐतिहासिक आदेश दिया था। न्यायालय का तर्क स्पष्ट था कि यदि नीति-निर्माता अपनी बनाई व्यवस्था का उपयोग करेंगे, तभी उसमें सुधार की इच्छा शक्ति जागेगी। यह न्यायिक चेतना जन-अपेक्षाओं को स्पष्ट रूप से दर्शाती है।
जब एक सरकारी अधिकारी अपने बच्चे को प्राइवेट स्कूल भेजता है, तो यह जनता के पैसे पर दोहरी चोट होती है। सरकारी धन से प्रशिक्षित टीचर और स्कूल का ढांचा बेकार जाता है, और अधिकारी की ‘पलायन की प्रवृत्ति’ निजी शिक्षा को बढ़ावा देती है, जिससे गरीब और अमीर के बीच शिक्षा की खाई और गहरी हो जाती है।
आस्था बहाली का संकल्प और प्रशासनिक दायित्व
सही मायने में, सरकारी अधिकारियों का अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में भेजना, सरकारी शिक्षा की वास्तविक नहीं, बल्कि भरोसे और सामाजिक स्तर की मनोवैज्ञानिक विफलता है। यह विफलता ‘मौन अविश्वास’ के रूप में सामने आती है।
हमारे प्रशिक्षित शिक्षक हमारी सबसे बड़ी ताकत हैं। लेकिन जब तक उच्च प्रशासनिक वर्ग स्वयं इस व्यवस्था पर भरोसा नहीं करेगा, तब तक आम लोगों की सोच नहीं बदलेगी। इस सोच को खत्म करने के लिए कठोर प्रशासनिक ज़िम्मेदारी, शिक्षकों को पढ़ाने की आज़ादी और उत्कृष्ट मॉडल स्कूलों की ज़रूरत है।
शिक्षा एक सामाजिक जिम्मेदारी और राष्ट्र निर्माण का सबसे बड़ा प्रकल्प है। जब समाज के बड़े और नीति-बनाने वाले लोग अपनी बनाई हुई व्यवस्था पर भरोसा जताना शुरू करेंगे, तभी यह विश्वास आम जनता तक पहुंचेगा और सरकारी स्कूल सही मायनों में शैक्षिक समानता और उत्कृष्टता के केंद्र बन पाएंगे। तभी, प्रशिक्षित शिक्षकों की योग्यता और समर्पण को सही पहचान मिलेगी।
कितने कारगर साबित होंगे शिक्षा मंत्री के नए निर्देश?
राजस्थान की शिक्षा व्यवस्था एक बार फिर चर्चा में है। इस बार वजह है राज्य के पंचायतीराज एवं शिक्षा मंत्री मदन दिलावर के वे नए निर्देश, जो उन्होंने पिछले दिनों कोटा विश्वविद्यालय के सभागार में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान दिए।
दिलावर ने कहा कि सरकारी और निजी विद्यालयों में अब एक जैसी यूनिफॉर्म लागू की जाएगी। उनका कहना था कि बच्चों की पहचान उनके पहनावे से नहीं, बल्कि उनके संस्कार और ज्ञान से होनी चाहिए। लंबे समय से सरकारी और निजी स्कूलों के बीच कपड़ों और सुविधाओं का अंतर सामाजिक असमानता का प्रतीक बन गया था। एक जैसी ड्रेस से वह अंतर कुछ हद तक मिट सकेगा।
टाई पहनने पर रोक बरकरार
मंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि विद्यालयों में टाई पहनने पर लगी रोक बरकरार रहेगी। उनका तर्क था कि राजस्थान की गर्म जलवायु में टाई बच्चों के लिए असुविधाजनक है और यह अभिभावकों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालती है। उन्होंने कहा कि सरल और व्यावहारिक पोशाक से न केवल बच्चे सहज रहेंगे, बल्कि शिक्षा पर ध्यान भी अधिक केंद्रित रहेगा।
शिक्षकों की दोहरी हाजिरी
शिक्षकों की जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए दिलावर ने दोहरी हाजिरी की नई व्यवस्था की घोषणा की। अब शिक्षकों को सुबह और दोपहर दोनों समय उपस्थिति दर्ज करनी होगी, ताकि पूरे शिक्षणकाल के दौरान वे विद्यालय में मौजूद रहें। इसके साथ ही विद्यार्थियों की अनुपस्थिति की सूचना तुरंत अभिभावकों के मोबाइल पर भेजे जाने की व्यवस्था भी की जाएगी। इससे विद्यालय और परिवार के बीच सीधा संवाद मजबूत होगा तथा शिक्षा में पारदर्शिता बढ़ेगी।
दिलावर ने यह भी निर्देश दिए कि प्रत्येक विद्यालय में दिन की शुरुआत और समापन राष्ट्रगान तथा राष्ट्रीय गीत के साथ किया जाए। इससे विद्यार्थियों में अनुशासन, देशभक्ति और सामूहिकता की भावना विकसित होगी।
हालांकि इन सभी घोषणाओं का उद्देश्य व्यवस्था को सुधारना और बच्चों को बेहतर वातावरण देना है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सब ज़मीनी स्तर पर उतनी ही प्रभावशीलता से लागू हो पाएगा। यदि प्रशासनिक निगरानी सख्त रही और शिक्षकों को आवश्यक संसाधन मिले तो ये प्रयास सरकारी विद्यालयों की सूरत बदल सकते हैं, अन्यथा यह भी कई पुरानी घोषणाओं की तरह केवल भाषणों तक सीमित रह जाएगा।






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