आत्मने दीपो भवः
क्या शिक्षा के पाठ्यक्रम, विधियों और स्कूल कैंपस में अब भी अमृत बिंदु बरस रहे हैं? एक पूर्व जिला शिक्षा अधिकारी का मार्मिक विमर्श जो बताता है कि कैसे स्टेटस सिंबल की दौड़ और प्रतिस्पर्द्धा की अंधी...

डा० राकेश तैलंग,
पूर्व जिला शिक्षा अधिकारी
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आज जब वर्तमान शिक्षा, शिक्षार्थी और अभिभावकों की शैक्षिक संवेदनशीलता पर आत्म विमर्श का अवसर मिला है तो अपने ही शहर के उस युवा पुलिस मेन का चेहरा सामने आ खड़ा होता है, जो एक जलते जून की दोपहर में शहर के सुनसान चौराहे पर मिल गया था। चौराहे पर लगी रेड लाइट पर मैं अपनी एक्टिवा पर प्रतीक्षा कर रहा था कि कब ग्रीन लाइट हो और मैं उस जानलेवा गर्मी में राहत पा आगे बढ़ सकूं। अचानक चौराहे के कोने पर खड़े पुलिस मेन की आवाज आई, “सर! निकल जाएं। चौराहा खाली है। निकल जाएं।” मैंने लाल लाइट की ओर इशारा किया, लेकिन पुलिस ने आवाज दे कहा, “सर! निकल जाइये। आपने मुझे पढ़ाया है। कोई कुछ नहीं कहेगा।”
मुझे उन पलों में लगा जैसे मुझे गुरू दक्षिणा देने को आतुर कोई एकलव्य मिल गया था। एक पुराने शिष्य की गुरु भक्ति का, सही या ग़लत, यह रूप देख मैं अभिभूत हो उठा। शिष्य वहीं, गुरु वहीं और शिक्षा व्यवस्था वहीं। भाव और संवेदना के धरातल पर शिक्षा के इस रूप को तपते रेगिस्तान में पानी की दो बूंदें मुझे तन-मन तक भिगो गईं।
मैं समझता हूं, शिक्षा के पाठ्यक्रम, विधियों और स्कूल कैम्पस में अमृत बिन्दु अब भी बरस रहे हैं। बस एक शिद्दत है जो कहीं खो गई है, उन पलों में भीग जाने की। परिणाम? एक औपचारिक प्रक्रिया से गुजरते हुए सब कुछ ठहरकर खत्म हो जाता है।
आज स्थिति वही है। वह शिक्षा जिसमें धारणा, इनपुट, मूल्य, संस्कार, भावोद्रेक की संभावनाएं वही हैं, कमी है तो वह है, उसे पाने की मन:स्थिति। केवल कोरा करियर, परीक्षा परिणाम और प्रतिस्पर्द्धा की अंधी दौड़।
अभिभावकों की नयी पीढ़ी ने इस दौड़ को स्वीकार किया है और बच्चे तो जैसा बड़े कहें। ऐसा करना किसी संस्कार रोपण की प्रक्रिया का परिणाम है, ऐसा नहीं लगता। वह तो प्रतिस्पर्द्धा की अंधी दौड़ और इससे भी आगे एक और अभिभावकीय सोच का परिणाम है जिसे, आइये, समझने का प्रयास करें।
स्कूल का चयन स्टेटस सिंबल बना
अभिभावक ने जितना अपनी परिवर्तनीय जीवनचर्या में “दूसरे की साड़ी मेरी साड़ी से ज्यादा सफेद क्यों” वाली मानसिकता पाल ली है। उसी तर्ज में बच्चों के लिए स्कूलों के चयन को भी स्टेटस सिंबल मान लिया है।
शिक्षा की सरल, सहज, सिंगल अंब्रेला सिस्टम व्यवस्था में समावेशी शिक्षा के चिंतन को काउंटर करते हुए निजी शिक्षा के विद्यालय और अब कालेजों में भी प्रवेश दिलाने की मानसिकता ने जन्म लिया है। निजी शिक्षा राजकीय शिक्षा के समानान्तर कदम से कदम मिलाकर परस्पर एक दूसरे की संबद्धता के साथ आगे बढ़े, दोनों मिलकर समग्रता में शिक्षा के स्वरूप और संस्कारों के बीच समन्वय कर सकें, यह मंतव्य लेकर गुणवत्ता अभिवृद्धि के लिए एक विकल्प बनकर समक्ष आती तब ठीक था, लेकिन इसे भारी फीस के बदले ज्ञान देने की विवशता ने शिक्षा को श्रेष्ठ परसेंटेज परसेंटाइल वाला माध्यम बना दिया। यह भी चलिए, ठीक है लेकिन शिक्षा में संज्ञान, बोध, कौशल के जो सहज लागू किए जाने वाले अवयव थे, उन्हें कहीं विस्मृत कर दिया गया।
दूसरी ओर राजकीय स्तर पर दी जाने वाली शिक्षा ने सुरक्षित कवच की सुविधा का लाभ देकर यहां एक अलग ही माहौल का विकास किया। अपवाद निजी में भी थे, यहां भी लेकिन “सुरक्षित जोन” का हिस्सा मान लेने से शिक्षक समाज से भावनात्मक धरातल पर जुड़ नहीं पाये। परिणाम? यहां शिक्षक के व्यक्तिगत अवदान से कहीं विद्यालय लाभान्वित हुए तो कहीं नहीं भी। सामान्यत: यह मिथ विकसित हुआ कि सरकारी स्कूल में पढ़ाई नहीं होती।
ऐसा प्रतीत होता है, निजी व राजकीय, विशेषकर राजकीय में इससे जो अंतराल या गेप बना, उसका लाभ राजनीति, शासन प्रशासन व अभिभावकों ने कभी जरूरी तो कभी गैर जरूरी रूप से उठाना शुरू कर दिया। इससे होने वाली हानियों की विस्तृत चर्चा फिर कभी करेंगे। इन समस्त स्थितियों के मध्य इन पंक्तियों के लेखक को एक बात नहीं रुचती जो सुधी पाठकों से साझा करना जरूरी है।
शिविरा पंचांग की पालना में अरुचि
निजी विद्यालयों की विभागीय समय विभाग चक्र जो शिविरा पंचांग के नाम से जाना जाता है, की पालना के प्रति अरुचि। न सही रुचि, लेकिन निजी विद्यालय स्वयं को शिक्षा विभाग के अंतर्गत मानें, यह तो जरूरी है। उनकी बच्चों और शिक्षकों की छुट्टियों का गणित सर्वथा अलग है। जब दीपावली की छुट्टियां शुरू हो चुकी होती हैं, बावजूद प्रशासनिक आदेश और चेतावनी के निजी स्कूल की बसें अल सुबह सड़कों पर दौड़ती हुई विभाग के आदेशों को मुंह चिढ़ाती प्रतीत होती हैं।
क्या कहें? हमारे सुपरवाइजिंग अधिकारी कहां हैं, प्रशासन का अंकुश यहां काम क्यों नहीं करता? शिविर पंचांग की अनुपालना सुनिश्चित करते हुए शिक्षक आगे बढ़े, यह single umbrella system शिक्षा प्रशासन की गुणवत्ता की पहली शर्त है। यह आदेशों की अवहेलना है यदि ऐसा नहीं होता। निजी और राजकीय, यह वर्ग भेद क्यों हो?
शिक्षा जगत यह समझे कि सभी अवकाश बच्चों की education for emotional intelligence का भाग हैं। कुछ इस प्रकार-
– त्यौहार, पर्व के अवकाश सामाजिक, सांस्कृतिक शिक्षण के लिए हैं।
– समर वेकेशन शिक्षक के लिए सत्र पर्यंत की शिक्षण योजना बनाने के लिए है।
– मध्यावधि अवकाश अपने द्वारा किए गए प्रयासों का मध्यावधि मूल्यांकन है। अर्द्धवार्षिक परीक्षण की तैयारी का यह स्व मूल्यांकन है।
– जिसे शीतकालीन अवकाश कहते हैं वह अर्द्धवार्षिक परीक्षण के बाद के संशोधन का अवसर है योजना का।
अर्थात् ये सभी छुट्टियां होकर भी छुट्टियां नहीं हैं। पर्यवेक्षी प्राधिकारी/अधिकारी देखे इसे। समझाए, बोध कराए। हमारा सिस्टम नॉलेज और इमोशनल क्वाशिएंट डेवलप करने का मिला जुला खूबसूरत सिस्टम है। टीचर्स को यह संज्ञान कराया जाए।
और यह कहना कि सरकारी स्कूलों में पढ़ाई नहीं होती, यह बात सही नहीं है। इन पंक्तियों के लेखक का सरकारी स्कूलों का अनुभव इस बात का प्रमाण है। पढ़ाई से लेकर सेवा काल तक के खूबसूरत अनुभव आज भी आंखों के सामने हैं। निजी हो या राजकीय, शिक्षा काल के मनभावन अनुभवों को पाने के लिए कभी “एल्यूमिनी मीट” कीजिए।
सुविधा के साथ संस्कार सम्पन्न होना जरूरी
स्कूल सुविधा सम्पन्न हों, इससे आगे वे संस्कार सम्पन्न हों, यह जरूरी है। जब अल सुबह पेरेंट्स को कंधे पर भारी बेग और बच्चे को खाली हाथ बस की ओर जाते देखता हूं तो लगता है, अब “पेरेंट्स एजुकेशन “के लिए भी स्कूल खोल दिए जाने चाहिएं।
इन समस्त विचारणीय स्थितियों पर संबंधित सामान्य प्रशासन को बहुत गंभीरता से दूरगामी असर के निर्णय लेने की जरूरत है। यह बच्चों, शिक्षकों और अभिभावकों से जुड़ा सीखने सिखाने का लंबा चलने वाला सामाजिक प्रकल्प है, जिस पर त्वरित निर्णय लेने से पहले परिणामों के गुणावगुणों को समझना होगा। शिक्षा प्रशासन नहीं, यह प्रबंधन है और यह बोध ही किसी भी इस क्षेत्र के कार्यकारी को सफल बना सकता है।






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