भाजपा सरकार के दो साल का लिटमस टेस्ट
बारां जिले का अंता उप चुनाव राजस्थान की भजनलाल सरकार के दो साल के कामकाज का लिटमस टेस्ट है, जो आने वाले तीन वर्षों का राजनीतिक नैरेटिव तय करेगा। यह सत्ताधारी भाजपा और विपक्ष कांग्रेस दोनों के लिए साख...

अंता उप चुनाव- सत्ता और विपक्ष की साख दांव पर
राजेश कसेरा,
राजनीतिक विश्लेषक
Table Of Content
- अंता उप चुनाव- सत्ता और विपक्ष की साख दांव पर
- भजनलाल सरकार की रीति-नीति पर लगेगी मुहर
- वसुंधरा राजे के कद की भी परीक्षा
- गहलोत-पायलट के जिम्मे भाया की नैया पार कराना
- कांग्रेस के पास भाया के अलावा विकल्प नहीं
- 15 प्रत्याशी मैदान में, मुकाबला तीन के बीच
- 2.25 लाख मतदाता तय करेंगे नए विधायक का भविष्य
- इसलिए हो रहे हैं अंता में उप चुनाव
- इस तरह रहा यहां का राजनीतिक इतिहास
बारां जिले का अंता उप चुनाव राजस्थान में सत्ता पक्ष और विपक्ष के भविष्य की दिशा को तय करने वाला साबित होगा। चुनाव के परिणाम से भले सत्तारूढ़ भाजपा और विपक्ष कांग्रेस को कोई बड़ा फर्क नहीं पड़े, लेकिन आने वाले तीन वर्षों का पर्सेप्शन और नैरेटिव जरूर तय हो जाएगा। बीते दो वर्षों में भजनलाल शर्मा सरकार ने प्रदेश की जनता के लिए क्या-कुछ किया, उसका अनुमान इस चुनाव के नतीजों से सामने आ जाएगा। वहीं कांग्रेस ने भी इस दौरान जो मुद्दे जनता के बीच उठाए, उसका धरातली सच सामने आएगा कि उनको जनता ने स्वीकारा या नकार दिया। इसे सत्ता और विपक्ष का लिटमस टेस्ट भी कह सकते हैं। अंता के मतदाताओं के साथ प्रदेश की जनता को भी 14 नवम्बर की तारीख का उत्सकुता से इंतजार रहेगा, जब अंता उप चुनाव के नतीजे सामने आएंगे। 11 नवम्बर को यहां मतदान की प्रक्रिया पूरी कराई जाएगी।
भजनलाल सरकार की रीति-नीति पर लगेगी मुहर
बीते दो सालों में विपक्ष ने प्रदेश की भजनलाल सरकार को पर्ची सरकार साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कांग्रेस के प्रमुख नेता अशोक गहलोत, गोविंद सिंह डोटासरा, टीकाराम जूली, सचिन पायलट समेत राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के सुप्रीमो हनुमान बेनीवाल और धुर विरोधी जनप्रतिनिधियों ने लगातार मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को ही अपना निशाना बनाए रखा। उन्हें कमजोर मुख्यमंत्री और आलाकमान के इशारों पर चलने वाली कठपुतली तक कहा। लेकिन विरोधियों के आरोप-प्रत्यारोपों के बीच भजनलाल शर्मा लगातार काम करते रहे। उनके नेतृत्व का पहला साल यानी 2024 भी उनके पक्ष में दिखा। उस समय भी प्रदेश की सात सीटों पर उप चुनाव हुए और इसमें से 5 सीटों पर भाजपा ने बाजी मारी। ये भजनलाल सरकार की सत्ता में आने के बाद पहली बड़ी परीक्षा थी और वे इसमें वे 75 फीसदी से ज्यादा अंक लेकर सफल भी हुए। भाजपा ने झुंझुनूं, खींवसर, देवली-उनियारा, सलूंबर, रामगढ़ पर जीत दर्ज की तो कांग्रेस अपने कब्जे वाली 4 में से एक सीट दौसा पर सिमट गई। वहीं, भारतीय आदिवासी पार्टी ने चौरासी सीट पर कब्जा बरकरार रखा। इस जीत ने भाजपा सरकार के पहले साल की सफलता की गाथा भी लिखी। इसके ठीक 11 महीने बाद अंता उप चुनाव की छोटी लेकिन महत्वपूर्ण परीक्षा है। इसमें भाजपा उत्तीर्ण होती है तो भजनलाल सरकार की रीति-नीति पर जनता की मुहर लगने के साथ ही भजनलाल शर्मा का कद और सशक्त हो जाएगा।
वसुंधरा राजे के कद की भी परीक्षा
अंता उप चुनाव में भाजपा की ओर से उम्मीदवार को चुनावी मैदान में उतारने का निर्णय नामांकन भरने के एक दिन पहले हो पाया। इसके पीछे प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और पार्टी की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष वसुंधरा राजे को भरोसे में लेने की कवायद रही। राजे की इस क्षेत्र में मजबूत पकड़ है और भाजपा के उम्मीदवार मोरपाल सुमन के चयन के पीछे भी उनकी हरी झण्डी रही है। मोरपाल लंबे समय से वसुंधरा के करीबी हैं और बारां जिले में उनके नेतृत्व में काम कर रहे हैं। वसुंधरा की प्रतिष्ठा का प्रमाण रहा कि प्रदेश भाजपा ने चुनाव संचालन समिति की कमान उनके बेटे दुष्यंत सिंह को चुनाव प्रभारी के रूप में सौंपीं। दुष्यंत झालावाड़-बारां से पार्टी के सांसद भी हैं। भाजपा का यह कदम न सिर्फ संगठनात्मक दृष्टि से विशेष रहा, बल्कि उप चुनाव को मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के साथ यह वसुंधरा राजे के लिए भी प्रतिष्ठा की लड़ाई बना दिया गया। अंता सीट झालावाड़-बारां लोकसभा क्षेत्र में आती है, इसलिए दुष्यंत सिंह को जिम्मेदारी देकर पार्टी ने भी एक तीर से कई शिकार एकसाथ कर दिए। इस निर्णय के राजनीतिक मायने समझेंगे तो एक तरफ मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व में पार्टी संगठन को मजबूती देने की कोशिश है तो दूसरी ओर वसुंधरा राजे का गढ़ समझे जाने वाले इलाके में यह चुनाव उनकी लोकप्रियता और पकड़ की भी परीक्षा होगी।
गहलोत-पायलट के जिम्मे भाया की नैया पार कराना
अंता विधानसभा उप चुनाव को लेकर कांग्रेस ने भी पूरी ताकत झोंक रखी है। चुनाव में जीत को लेकर कांग्रेस ने 40 स्टार प्रचारकों की सूची जारी की। इसमें अशोक गहलोत, सचिन पायलट, गोविंद सिंह डोटासरा, टीकाराम जूली, डॉ. सीपी जोशी समेत हाड़ोती और प्रदेश के दिग्गज नेताओं को शामिल किया। इनमें गहलोत और पायलट की भूमिका पार्टी के उम्मीदवार प्रमोद जैन भाया की जीत में बड़ी और महत्वपूर्ण रहने वाली है। दोनों मिलकर भाया की चुनावी नैया को कैसे पार लगाते हैं इस पर सबकी नजरें टिकी रहेंगी। भाया लंबे समय से गहलोत के सर्वप्रिय नेताओं में गिने जाते रहे हैं, लेकिन भाया ने पायलट के साथ भी हमेशा मधुर संबंध बनाए रखे। दोनों नेताओं के बीच सियासी खींचतान किसी से छिपी नहीं हैं। वर्ष 2023 में सत्ता से बाहर होने के बाद ये अलगाव और तेजी से सामने आया, लेकिन कांग्रेस आलाकमान के हस्तक्षेप के बाद दोनों के बीच दूरियां कम करने की कोशिशें की गईं, लेकिन इतिहास में छोड़े गए निशान दोनों के दिलोदिमाग में छपे हुए हैं। ऐसे में भाया की जीत-हार में इन दोनों बड़े नेताओं की भूमिका खास रहने वाली है।
कांग्रेस के पास भाया के अलावा विकल्प नहीं
एक तरफ भ्रष्टाचार के संगीन आरोप तो दूसरी तरफ समाजसेवी की धवल छवि। अंता से कांग्रेस के उम्मीदवार प्रमोद जैन भाया हमेशा से विवादों में रहे। इसके बावजूद प्रदेश में जब भी चुनाव हुए तो अंता विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस भाया के नाम से बाहर सोचने की हिम्मत नहीं जुटा पाई। वर्ष 2003 में पहला चुनाव निर्दलीय जीतने के बाद भाया कभी हारे तो कभी जीते। लेकिन उनके सामने कांग्रेस पार्टी से किसी दूसरे उम्मीदवार ने दमदारी से टिकट नहीं मांगा। यही कारण रहा कि 2023 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के कंवरलाल मीणा से चुनाव हारने के बाद जब यहां उप चुनाव का मौका आया तो पार्टी के पास उनका कोई विकल्प ही नहीं था। वजह चाहे जो भी रही हो, भाया ही अंता की कांग्रेस है। उनके लिए तो बारां जिले में यह तक कहा जाता है कि उनकी मर्जी के बगैर पूरे इलाके में कांग्रेस में पत्ता तक नहीं हिलता। कांग्रेस भले राय-मशविरे से उम्मीदवार चुनने की बातें कहें, लेकिन क्षेत्र की जनता को पता था कि अंता से तो कांग्रेस का टिकट भाया ही लेकर आएगा। कांग्रेस में आलाकमान तक उनकी पहुंच है तथा हाड़ोती के इस क्षेत्र में भाया ही अकेला चेहरा है जो वसुंधरा राजे के दबदबे से लोहा ले सकता है। इनके पास संसाधन हैं, कार्यकर्ता है, बड़ी टीम है और आज के दौर में चुनाव जीतने के लिए जरूरी मशीनरी भी। इसलिए पार्टी के लिए नैतिकता कोई मायने नहीं रखती। बस नतीजा महत्वपूर्ण है और चुनाव कैसे जीतना है इसकी चिंता है। तभी तो उनके खिलाफ कई मामले दर्ज होने के बाद भी पार्टी ने बड़ा जोखिम उठाया। प्रमोद जैन भाया के खिलाफ जिले में आठ अलग-अलग थानों में एफआईआर दर्ज हैं। इनमें गंभीर धाराओं में उनके खिलाफ मुकदमे दर्ज कराए गए। यही कारण रहा कि कानूनी पेंच से बचने के लिए उन्होंने विकल्प के रूप में पत्नी उर्मिला जैन भाया का नामांकन भरवाया था।
15 प्रत्याशी मैदान में, मुकाबला तीन के बीच
अंता उपचुनाव में 15 उम्मीदवार मैदान में हैं। मुख्य मुकाबला कांग्रेस के प्रमोद जैन, भाजपा के मोरपाल सुमन और निर्दलीय नरेश मीणा के बीच है। बागियों के हटने से भाजपा ने जहां राहत की सांस ली तो निर्दलीय नरेश मीणा ने मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया। अंता सीट के गठन के बाद से यहां 4 चुनाव हो चुके हैं। इनमें दो चुनाव कांग्रेस प्रत्याशी प्रमोद जैन भाया ने जीते। अनुभव के आधार पर वे सबसे कड़े प्रतिद्वंदी हैं, लेकिन मोरपाल सुमन को स्थानीय, साफ-सुथरी छवि और जमीनी कार्यकर्ता होने का लाभ मिल सकता है। उनके साथ कोई पुरानी एंटीइमकंबेंसी नहीं हैं। नरेश मीणा निर्दलीय हैं लेकिन उनके साथ समर्थकों का जमावड़ा है। हालांकि नरेश मीणा प्रमुख दावेदार नहीं हैं, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो किसी भी प्रत्याशी की जीत-हार में नरेश फैक्टर काम जरूर करेगा। वे किस वर्ग के वोटों में सेंध लगाते हैं, उससे चुनाव के नतीजे बहुत हद तक प्रभावित हो सकते हैं। नरेश युवाओं और मीणा समुदाय के वोट बैंक को प्रभावित कर सकते हैं। अंता और आस-पास के इलाकों में मीणा मतदाताओं की संख्या निर्णायक है, ऐसे में कांग्रेस के लिए चुनौती ज्यादा है और उसको अपने पारंपरिक वोट बैंक की रक्षा करनी होगी।
2.25 लाख मतदाता तय करेंगे नए विधायक का भविष्य
अंता विधानसभा में करीब 2.25 लाख मतदाता अपने वोट से नया विधायक चुनेंगे। इसमें 1,16,405 पुरुष मतदाता और 1,11,154 महिला मतदाता शामिल हैं, जबकि 4 वोटर थर्ड जेंडर हैं। क्षेत्र में माली समाज के 40 हजार, अनुसूचित जाति के 35 हजार और मीणा समुदाय के 30 हजार मतदाता अहम भूमिका निभाएंगे। इसके अलावा धाकड़, ब्राह्मण, बनिया और राजपूत वोटरों का रुझान भी नतीजों को प्रभावित करेगा। अंता में माली समाज की बहुलता है, लेकिन जीत के लिए केवल उनके वोट काफी नहीं। माली और मीणा समुदाय के वोटों का एकजुट होना किसी भी दल के लिए जीत की राह आसान कर सकता है। भाजपा को परंपरागत रूप से माली और शहरी मतदाताओं का साथ मिलता रहा है, जबकि कांग्रेस मीणा और अनुसूचित जाति के वोटों पर निर्भर रही है। इस उप चुनाव में जातिगत समीकरण और सामाजिक गठजोड़ जीत-हार तय करेंगे।
इसलिए हो रहे हैं अंता में उप चुनाव
यह सीट पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के समर्थक विधायक कंवरलाल मीणा की विधायकी रद्द होने के बाद खाली हुई। कंवरलाल को एसडीएम पर पिस्टल तानने के 20 साल पुराने मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद मई में उनकी सदस्यता खत्म कर दी गई। निचली अदालत ने उनको यह सजा 2020 में सुनाई थी। लेकिन मीणा ने इसके खिलाफ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। करीब पांच साल चली सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने अधीनस्थ अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए सजा बरकरार रखी। मीणा इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट भी गए, लेकिन वहां से भी उनको राहत नहीं मिल पाई। ऐसे में उन्हें विधायक पद के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया। नियमों के अनुसार किसी सीट के खाली होने के छह महीने के भीतर उपचुनाव करवाना अनिवार्य होता है। ऐसे में यहां पर चुनाव हो रहे हैं।
इस तरह रहा यहां का राजनीतिक इतिहास
2003 में भाजपा के प्रेमनारायण गालव, निर्दलीय प्रत्याशी प्रमोद जैन भाया और कांग्रेस के शिवनारायण नागर के बीच त्रिकोणीय मुकाबला हुआ। इसमें प्रमोद जैन ने भाजपा उम्मीदवार को 6 हजार 750 मतों से हराया।
2008 विधानसभा चुनाव में भाजपा के कद्दावर नेता रघुवीरसिंह कौशल और कांग्रेस के प्रमोद जैन भाया में महामुकाबला हुआ। इसमें कांग्रेस के प्रमोद जैन भाया ने भाजपा के रघुवीरसिंह कौशल को 29 हजार 668 मतों से हराया।
2013 विधानसभा चुनाव के भाजपा के डॉ. प्रभुलाल सैनी और कांग्रेस के प्रमोद जैन भाया के बीच घमासान हुआ। इसमें सैनी ने भाया को 3399 मतों से चुनाव हरा दिया।
2018 के चुनाव में प्रभुलाल सैनी और प्रमोद भाया फिर आमने-सामने हुए। लेकिन इस बार भाया ने सैनी को एकतरफा चुनाव में हराकर लगभग 35 हजार वोटों से जीत हासिल की।
2023 में भाजपा के कंवरलाल मीणा से प्रमोद जैन भाया का मुकाबला हुआ। प्रमोद जैन भाया को 81 हजार 529 तो कंवरलाल मीणा को 87 हजार 390 वोट मिले थे। 5861 वोटों से कंवरलाल ने जीत हासिल की।






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