दावे बड़े, मतदाता मौन
बिहार के चुनावी चौसर पर घमासान चरम पर है। एनडीए और महागठबंधन के सूरमा बड़े-बड़े दावों के साथ मैदान में हैं, लेकिन सबकी नज़रें शांत मतदाता पर टिकी हैं। चुनावी समर को त्रिकोणीय बनाने वाली प्रशांत किशोर...

बिहार चुनाव
राधा रमण,
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक
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बिहार में चुनावी तापमान चरम पर है। चौसर बिछ चुकी है और मोहरे मैदान में हैं। दावेदारों-उम्मीदवारों के बीच घमासान है। सभी दलों के सूरमा परिणाम को लेकर बड़े-बड़े दावे कर रहे हैं, लेकिन मतदाता चुप हैं। उनके मन में क्या है, यह तो 14 नवंबर को चुनाव परिणाम आने के बाद ही पता चलेगा। सियासी दलों में आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है। राज्य में त्रिकोणीय लड़ाई है। एक तरफ एनडीए के पांच दल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), जनता दल यूनाईटेड (जदयू), लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) (लोजपा- आर), हिन्दुस्तान अवाम मोर्चा (हम) और राष्ट्रीय लोक मोर्चा (रालोमो) है, तो दूसरी तरफ महागठबंधन के सात दल राष्ट्रीय जनता दल (राजद), भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, मुकेश सहनी की विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी), आईपी गुप्ता की इंडियन इन्क्ल्यूसिव पार्टी (आईआईपी), तीनों वामदल भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा), मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी लेनिनवादी) माले शामिल है। लड़ाई को त्रिकोणीय बनाने वाली ख्यातनाम चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर (पीके) की जन सुराज पार्टी है। पीके जन सुराज के सूत्रधार और संस्थापक हैं।
इस बार बिहार में दो चरणों में 6 और 11 नवंबर को वोट डाले जाएंगे। कुल 243 विधानसभा सीटों के लिए 2626 उम्मीदवार मैदान में हैं। पहले चरण में 18 जिले गोपालगंज, सीवान, छपरा, मुजफ्फरपुर, वैशाली, समस्तीपुर, दरभंगा, सहरसा, मधेपुरा, खगड़िया, बेगुसराय, मुंगेर, लखीसराय, शेखपुरा, नालंदा, भोजपुर, बक्सर और पटना में वोट डाले जाएंगे। दूसरे चरण में 20 जिले पूर्वी चंपारण, पश्चिमी चंपारण, सीतामढ़ी, सुपौल, मधुबनी, अररिया, भागलपुर, बांका, पूर्णिया, किशनगंज, कटिहार, नवादा, जहानाबाद, गयाजी, औरंगाबाद, रोहतास, अरवल, कैमूर, शिवहर और जमुई में मतदान होगा।
वरिष्ठ पत्रकार आरती आर जेरथ कहती हैं कि बिहार के चुनाव को जटिल और उलझन भरा बनाने के लिए चार कारण सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं। इनमें मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का स्वास्थ्य, दोनों गठबंधनों का बिखराव, युवा मतदाताओं का वोट और प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी का उदय।
उम्र का असर हावी, क्या कर जाएं पता नहीं
बात पहले नीतीश कुमार के स्वास्थ्य की करते हैं। जदयू के नेताओं के मुताबिक मुख्यमंत्री एकदम स्वस्थ हैं। जबकि एनडीए के अन्य दलों के नेता इससे इत्तेफाक नहीं रखते। नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं कि नीतीश पर उम्र का असर हो गया है। कब क्या कर जाएं, क्या बोल दें, किसका पैर पकड़ लें, कहना मुश्किल है। हाल ही में मुजफ्फरपुर जिले के मीनापुर की चुनावी सभा में उन्होंने भाजपा प्रत्याशी रमा निषाद के गले में माला डाल दी। जब जदयू के सांसद और पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने आगे बढ़कर उन्हें रोकना चाहा तो मंच से ही नीतीश कुमार ने कहा कि ‘ई गजब आदमी है भाई! हाथ काहे पकड़ते हो।’ नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव तो उन्हें अक्सर अचेत कहा करते हैं। जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर भी कहते हैं कि 2015 के नीतीश और 2025 के नीतीश में जमीन-आसमान का अंतर है। अब सियासत करने की उनकी उम्र गवाही नहीं देती है। कुल मिलाकर, नीतीश का स्वास्थ्य बिहार में एक ऐसी पहेली बन गया है, जिसका सही जवाब नीतीश के अलावा किसी के पास नहीं है।
भाजपा के लिए अभी नहीं तो कभी नहीं
जहां तक बात दोनों गठबंधनों में बिखराव की है तो एनडीए में भाजपा ने इस बार नीतीश कुमार को पूरी तरह घेर लिया है। कुल 243 सदस्यीय बिहार विधानसभा में कहने को तो भाजपा और जदयू 101-101 सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं। लेकिन गणित समझें तो भाजपा 141 सीटों पर मैदान में है, क्योंकि भाजपा ने लोजपा (आर) को आवंटित 29 सीटों में से कम से कम 6 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतार दिए हैं। लोजपा के एक प्रत्याशी का नामांकन रद्द हो गया है। हम और रालोमो को 6-6 सीटें दी गई हैं। वैसे भी चुनाव परिणाम के बाद लोजपा (आर), हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा और राष्ट्रीय लोक मोर्चा की मजबूरी भाजपा को सपोर्ट करने की होगी। फिलहाल चिराग पासवान और जीतनराम मांझी केन्द्रीय सरकार में मंत्री हैं और उपेन्द्र कुशवाहा मंत्री बनने को बेताब हैं। वैसे भी भाजपा के लिए यह चुनाव अभी नहीं तो कभी नहीं सरीखा है। इसीलिए, धर्मेन्द्र प्रधान के चुनाव प्रभारी होने के बावजूद गृहमंत्री अमित शाह ने परोक्ष रूप से चुनाव की कमान संभाल रखी है। शाह सियासी जोड़तोड़ के माहिर खिलाड़ी माने जाते हैं। पिछले दिनों जन सुराज के दानापुर से उम्मीदवार अखिलेश कुमार का नामांकन से पहले अमित शाह से मिलने पहुंचना और नामांकन नहीं करना, गोपालगंज और ब्रह्मपुर के जन सुराज के प्रत्याशियों का एनडीए खेमे को सपोर्ट करना इसकी तस्दीक करता है। यही नहीं, अमित शाह ने यह कहकर जदयू की धड़कनें बढ़ा दी कि चुनाव का चेहरा नीतीश हैं, लेकिन चुनाव के बाद घटक दलों के विधायक मिलकर मुख्यमंत्री का फैसला करेंगे। सियासी गलियारों में यह चर्चा आम है कि अगर चुनाव में एनडीए को बहुमत मिलता है तो भाजपा इस बार बड़ा खेल करेगी। अपना मुख्यमंत्री बनाएगी।
जानकारों का कहना है कि 2021 में असम में भाजपा सर्वानन्द सोनोवाल के चेहरे पर चुनाव लड़ी थी, लेकिन मुख्यमंत्री हेमंत विश्व शर्मा बनाए गए। 2023 में मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के चेहरे पर चुनाव लड़ी थी, लेकिन मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को बनाया गया। इसी तरह महाराष्ट्र में एनडीए का चेहरा एकनाथ शिंदे थे, लेकिन मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस को बनाया गया। तो क्या नीतीश बिहार का शिंदे बनेंगे! इस बीच चिराग पासवान ने एक न्यूज चैनल से बातचीत में कहा कि उनकी इच्छा भी मुख्यमंत्री बनने की है। चिराग खुद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हनुमान बताते हैं।
महागठबंधन में भी शांति कहां
महागठबंधन की हालत यह है कि सरकार बनने पर तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री और मुकेश सहनी को उपमुख्यमंत्री का प्रत्याशी तो घोषित कर दिया, लेकिन नाम वापसी के आख़िरी दिन तक राजद और कांग्रेस में सीटों की लड़ाई जारी है। सिर्फ वाम दलों के नेता प्रचार कार्य में लगे हुए हैं। बिहार में राजद 143, कांग्रेस 59, भाकपा 9, माकपा 4, माले 20, वीआईपी 13 और आईआईपी 3 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। कुल मिलाकर इन सीटों की संख्या 251 हो जाती है। जबकि कुल सीटें 243 हैं। जाहिर है, शेष 8 सीटों पर फ्रेंडली फाइट होगी और एक-दूसरे के वोट काटे जाएंगे। मोहनियां में राजद उम्मीदवार का नामांकन रद्द हो जाने, सुगौली में वीआईपी प्रत्याशी का नामांकन रद्द हो जाने और तारापुर में वीआईपी उम्मीदवार का नाम वापस ले लेने से महागठबंधन कुल 240 सीटों पर ही चुनाव लड़ सकेगा। वीआईपी की कुछ सीटों पर राजद ने अपने उम्मीदवारों का नामांकन करा दिया है।
हम आपके दांत खट्टे कर देंगे- पीके
बिहार की लड़ाई को त्रिकोणीय बना रही जन सुराज पार्टी ने अकेले 243 सीटों पर लड़ने का दावा किया था। हालांकि उसके एक उम्मीदवार के नामांकन दाखिल नहीं करने, एक उम्मीदवार का नामांकन रद्द हो जाने और दो उम्मीदवारों के भाजपा और लोजपा (आर) के समर्थन में बैठ जाने के कारण वह 239 जगहों पर ही चुनाव लड़ पा रही है। प्रशांत किशोर कहते हैं कि एनडीए डर गया है और दबाव बनाकर जन सुराज के उम्मीदवारों का नामांकन वापस करा रहा है। पटना में पत्रकारों से बातचीत में पीके ने भाजपा को चुनौती देते हुए कहा कि ‘चाहे जितने उम्मीदवारों को खरीद लो, धमकी दे दो या उन्हें घरों में कैद कर दो। चुनाव लड़ा जाएगा और इतनी ताकत से लड़ा जाएगा कि हम आपके दांत खट्टे कर देंगे।’ वह कहते हैं कि महागठबंधन के ज्यादातर उम्मीदवार दबंग और बाहुबली हैं। इसलिए एनडीए के लोग जन सुराज के शिक्षित, सज्जन और शरीफ उम्मीदवारों को सॉफ्ट टारगेट मानकर दबाव बना रहे हैं। शायद यही वजह है कि 116 उम्मीदवारों की सूची के बाद जन सुराज ने अपनी रणनीति बदली और गुपचुप तरीके से सिंबल बांट दिए।
उधर, पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता राजकुमार सिंह (आर.के. सिंह) कहते हैं कि मतदाताओं को अपराधी उम्मीदवारों को, चाहे वे एनडीए के ही क्यों न हों, वोट नहीं देना चाहिए। अपराधियों को वोट देने से अच्छा चुल्लू भर पानी में डूबकर मर जाना है।
एक कहावत है– ‘अंधा बांटे रेवड़ी, फिर-फिर अपनों को देय।’ बिहार की सियासत में इस बार यह नजारा सिर चढ़कर बोल रहा है। सभी दलों ने करीब 50 सीटें परिजनों अथवा नेता पुत्रों को दी हैं। इसमें सभी दल एकमत हैं। राजद ने 16, जदयू ने 12, भाजपा ने 7, जन सुराज ने 2, हम सुप्रीमो जीतनराम मांझी ने अपने कोटे से मिली 6 सीटों में से 5 और रालोमो के उपेन्द्र कुशवाहा ने अपनी पत्नी को टिकट दिया है। चाचा और चचेरे भाई की वेवफाई से आहत चिराग पासवान ने इस बार अपने भांजे पर दांव लगाया है।
राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार अरविन्द मोहन कहते हैं कि बिहार चुनाव में कौन जीतेगा, कौन हारेगा यह अलग बात है, लेकिन यह चुनाव एक मायने में पिछले सभी चुनावों से अलग है कि इस बार जन सुराज को छोड़कर सभी दलों ने टिकट बेचे हैं। यहां तक कि कुछेक सीटिंग विधायकों को भी टिकट खरीदना पड़ा है। वह कहते हैं कि वर्षों बाद कांग्रेस अपने हिसाब से चुनावी मैदान में है। अभी तक उसे लालू यादव के रहमोकरम पर लड़ना होता था। इसका उसे लाभ मिलना चाहिए। साथ ही जन सुराज के रूप में मतदाताओं को एक अच्छा विकल्प मिला है। अन्यथा पिछले 35 वर्षों से बिहार की राजनीति लालू समर्थन और लालू विरोध पर टिकी थी।
बहरहाल, बिहार में चुनावी सरगर्मी चरम पर है लेकिन मतदाता खामोश हैं। सत्ता की चाबी किसके हाथ लगती है, यह तो 14 नवंबर को ही पता चलेगा।






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