ह्वेनसांग का भीनमाल
चीनी यात्री ह्वेनसांग ने सातवीं शताब्दी में भीनमाल (पी-लो-मो-लो) की यात्रा कर इसे ज्ञान और नैतिकता का केंद्र बताया। उनके ग्रंथ ‘सी-यू-की’ में इस नगर के सुव्यवस्थित समाज, धार्मिक सहिष्णुता और घरों में...

ज्ञान और सद्भाव का प्राचीन केंद्र
बलवंत राज मेहता,
वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार
चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भीनमाल को ‘पी-लो-मो-लो’ नाम दिया था। यह उल्लेख उन्होंने सम्राट हर्ष के शासनकाल के दौरान भारत की यात्रा के समय (631 से 645 ईस्वी के बीच) किया था। ह्वेनसांग की यह यात्रा केवल धार्मिक तीर्थयात्रा नहीं थी, बल्कि भारतीय संस्कृति, शिक्षा और समाज व्यवस्था को समझने का एक गहरा प्रयास भी थी।
सातवीं शताब्दी के मध्य में, चीन के प्रसिद्ध बौद्ध तीर्थयात्री और विद्वान ह्वेनसांग ने भारत की ओर यात्रा की, जो उनके जीवन और बौद्ध धर्म अध्ययन के लिए निर्णायक सिद्ध हुई। उनका यह ऐतिहासिक प्रवास 629 ईस्वी में चीन से आरंभ हुआ और लगभग 17 वर्षों तक चला। इस दौरान उन्होंने मध्य एशिया और उत्तरी भारत के कई प्रमुख नगरों और बौद्ध मठों का भ्रमण किया। इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य बुद्ध से संबंधित स्थलों का अवलोकन करना और बौद्ध धर्मग्रंथों का गहन अध्ययन करना था। उन्होंने नालंदा विश्वविद्यालय में शिक्षा ग्रहण की और वहीं शिक्षक भी बने। नालंदा में अध्ययन ने उन्हें न केवल धार्मिक दृष्टि से समृद्ध किया, बल्कि भारतीय ज्ञान, दर्शन, गणित, खगोलशास्त्र और सामाजिक संरचना की गहरी समझ दी।
उनकी यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था, राजस्थान का प्राचीन नगर श्रीमाल (आज का भीनमाल)। यह नगर ह्वेनसांग के लिए विशेष महत्व रखता था, क्योंकि यहां का सामाजिक और शैक्षणिक वातावरण उन्हें भारतीय सभ्यता की गहराई और विविधता से परिचित कराता था। उन्होंने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘सी-यू-की’ में इस नगर का उल्लेख “पी-लो-मो-लो” नाम से किया और यहां की जनता, प्रशासन तथा जीवनशैली का जीवंत चित्रण प्रस्तुत किया।
उन्होंने लिखा कि नगर सुव्यवस्थित था, नागरिक अनुशासित थे और यहां का समाज धार्मिक, शिक्षित और नैतिक दृष्टि से उच्च कोटि का था। नगरवासी अपने घरों को बिना ताले के सुरक्षित छोड़ देते थे, क्योंकि चोरी जैसी घटनाएं लगभग नहीं होती थीं। यह समाजिक सद्भाव और नैतिकता का अद्भुत उदाहरण था।
इतिहासकारों के अनुसार, भीनमाल केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि शिक्षा और विज्ञान के क्षेत्र में भी अग्रणी था। यही नगर था जहां महान गणितज्ञ ब्रह्मगुप्त का जन्म हुआ। जिन्होंने अपनी रचना ‘ब्राह्मस्फुट सिद्धांत’ में शून्य और ऋणात्मक संख्याओं की अवधारणा को स्थापित किया। यह ग्रंथ गणित और खगोलशास्त्र के क्षेत्र में मील का पत्थर बना। ह्वेनसांग के लेखन ने भीनमाल की इसी ज्ञान परंपरा को चीन और विश्व के सामने उजागर किया।
ह्वेनसांग ने नगर की भौतिक संरचना, लोगों की नैतिकता और सामाजिक व्यवहार का सटीक अवलोकन किया। उन्होंने लिखा कि नगर के लोग सरल, धार्मिक और शिक्षाप्रेमी थे। यहां बौद्ध, जैन और हिंदू धर्म के अनुयायियों में अद्भुत सह-अस्तित्व था, जिसने नगर को धार्मिक सहिष्णुता और सांस्कृतिक विविधता का प्रतीक बनाया।
आज भी भारत सरकार का संस्कृति मंत्रालय इस विरासत के संरक्षण और संवर्धन में सक्रिय है। मंत्रालय ने भीनमाल के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को ध्यान में रखते हुए इसकी धरोहरों के संरक्षण, पांडुलिपियों के डिजिटलीकरण और स्थानीय समुदायों में जागरूकता बढ़ाने के प्रयास किए हैं। इससे न केवल भीनमाल की पहचान पुनर्जीवित हुई है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की सांस्कृतिक विरासत को भी उजागर करता है।
ह्वेनसांग की भीनमाल यात्रा केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि भारत की ज्ञान, नैतिकता और धार्मिक सहिष्णुता की गवाही है। उनके लेखन से यह स्पष्ट होता है कि भारत की प्राचीन सभ्यता ने शिक्षा, गणित, दर्शन और समाज व्यवस्था में विश्व को दिशा दी।
संक्षेप में कहा जा सकता है कि ह्वेनसांग की श्रीमाल यात्रा भारतीय सभ्यता की उज्जवल परंपरा और शिक्षा-धर्म की अमर धरोहर का जीवंत प्रमाण है। उनके अनुभवों ने भारत और चीन के बीच सांस्कृतिक पुल का निर्माण किया। जो आज भी संवाद, सह-अस्तित्व और ज्ञान की परंपरा को जीवित रखता है।






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