हरित विकास की राह पर लाल गलियारा
नक्सलवाद अब खात्मे की ओर है। छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में दो दिनों के भीतर 258 नक्सलियों का आत्मसमर्पण इसकी पुष्टि करता है। 200 जिलों तक फैला 'लाल गलियारा' अब सिमटकर सिर्फ 11 जिलों में रह गया...

सुरक्षा बलों की आक्रामक रणनीति ने तोड़ा नक्सलियों का मनोबल
सुधांशु टाक,
वरिष्ठ लेखक
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नक्सलवाद अब खात्मे की ओर है। तमाम दावों प्रतिदावों के बावजूद नक्सलियों का सिमटता इलाका और बड़ी संख्या में हो रहा आत्मसमर्पण इसके दम तोड़ देने का स्पष्ट संकेत है। छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में दीपावली के ठीक पहले के दो दिनों के भीतर 258 नक्सलियों का आत्मसमर्पण बड़ी कामयाबी है। नक्सलियों का लाल गलियारा जो कभी करीब 200 जिलों तक फैला हुआ था, वह अब सिमटकर 11 में रह गया है। लगता यही है कि नक्सलवाद अब अपनी आखिरी सांसें गिन रहा है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, इस साल अभी तक सुरक्षाबलों के साथ मुठभेड़ में 312 नक्सली मारे जा चुके हैं, जबकि 836 को गिरफ्तार किया गया है। इस साल मई में जब सुरक्षाबलों ने सीपीआई (माओवादी) के जनरल सेक्रेटरी नरसिम्हा उर्फ नंबाला केशव राव उर्फ बसवराजू को मार गिराया, तो नक्सल आंदोलन के केंद्र पर वह सबसे बड़ा वार था। इसके साथ ही बड़ी संख्या में नक्सलियों का आत्मसमर्पण भी सुरक्षा बलों के आत्मविश्वास में वृद्धि कर रहा है। केवल इस साल ही अब तक 16 सौ से ज्यादा नक्सली आत्मसमर्पण कर चुके हैं।
आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों की सूची में 10 सीनियर ऑपरेटिव, जिनमें सतीश उर्फ टी वासुदेव राव (सीसीएम), रानीता (एसजेडसीएम, माड़ डीवीसी की सचिव), भास्कर (डीवीसीएम, पीएल 32), नीला उर्फ नंदे (डीवीसीएम, आईसी और नेलनार एसी की सचिव), दीपक पालो (डीवीसीएम, आईसी और इंद्रावती एसी का सचिव) शामिल हैं। टी वासुदेव राव पर एक करोड़ रुपये का इनाम था। इतने बड़े पैमाने पर हुए आत्मसमर्पण के बाद छत्तीसगढ़ के, खासतौर पर बस्तर क्षेत्र में नक्सलियों को लेकर कुछ समय पहले तक जो आक्रामक प्रकृति के इनपुट मिल रहे थे, वे अब बंद हो गए हैं।
मुख्यधारा में वापसी
हाल ही में 26 अक्टूबर को ही छत्तीसगढ़ के कांकेर में 21 माओवादियों ने हथियार डाल दिए। इसके पूर्व 17 अक्टूबर को 9.18 करोड़ का इनामी नक्सलवादी सेंट्रल कमेटी मेंबर रुपेश ने भी समर्पण किया था। इसी अक्टूबर महीने में ही 300 से ज्यादा नक्सलवादी पुलिस के सामने हथियार रखकर समर्पण कर चुके हैं। आखिर क्या वजह है जो इतनी बड़ी तादाद में ये हथियार डालकर मुख्यधारा में वापसी कर रहे हैं।
इसका सबसे बड़ा कारण है गृहमंत्री के रूप में अमित शाह की दमदार उपस्थिति। शाह की आक्रामक रणनीति और कुशल प्रबंधन का ही कमाल है कि नक्सली हताश हो चुके हैं और सुरक्षा बलों में एक नया जोश देखा जा रहा है। सुरक्षा बलों में अमित शाह की छवि एक मेंटोर यानी एक अभिभावक की बन चुकी है इसे आप इस एक वाकये से भी समझ सकते हैं। साल 2019 में अमित शाह देश के गृहमंत्री बने ही थे। उन्होंने नक्सलवाद के उन्मूलन को अपनी प्राथमिकता सूची में रखा। सारे जरूरी साजो सामान सुरक्षा बलों को मुहैया कराए, जिससे अब नक्सलियों के पैर उखड़ने लगे।
जब जवानों को सेंसर लगे जूते पहनाने पड़े
सुरक्षा बलों की इस बढ़त को रोकने के लिए 2022 में माओवादियों ने जंगल में जगह-जगह जहर बुझे लोहे की कीलें लगानी शुरू कर दी, जो जूते को पार जवानों के पैर को घायल कर देता था। जहर फैलने के कारण इसकी चपेट में आए चार-पांच जवानों के पैर काटने पड़ गए।
कहते हैं जब अमित शाह को इसकी जानकारी मिली तो उन्हें ऑपरेशन रूकवा दिया और सेंसर लगे विशेष जूते बनवाकर जवानों को उपलब्ध कराया, जो लोहे की कील से उन्हें सचेत कर देता था। इसने बड़ी संख्या में जवानों की घायल होने से रोका। इस घटना से सुरक्षा बलों के मन में में यह बात बलवती हो गई कि शीर्ष स्तर पर एक आदमी है जो जवानों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता पर रखता है। इसे सुरक्षा बलों में नया जोश भर दिया। इसके साथ ही अगले कदम के रूप में माओवादियों की फंडिंग रोकने और बड़े माओवादी घटनाओं की जांच की जिम्मेदारी एनआईए को सौंपी गई। इसने नक्सलियों को अंदर से तोड़ दिया।
इसकी अहमियत इससे समझिए कि आजादी के बाद से पुलिस और प्रशासन के लिए अबूझ बना रहा अबूझमाड़ जिला और बस्तर से माओवादियों का सफाया हो गया, जो आसान काम नहीं था। यह गृह मंत्री शाह की दृढ़ इच्छाशक्ति, सटीक रणनीति और धैर्य ही था जिसने इसे संभव बना दिया।
माओवादियों की फंडिंग रोकने से लेकर उनके बारे में जानकारी जुटाने के लिए खुफिया तंत्र तैयार करने, सुरक्षा की खाई (सिक्यूरिटी गैप) को पाटने के लिए अग्रिम सुरक्षा चौकियों (एफओबी) की स्थापना और सुरक्षा बलों को अत्याधुनिक तकनीक और साजो सामान से लैस करने तक की रणनीति बनाने में शाह की सक्रिय भागीदारी थी। यहां तक कोरेगुट्टा की पहाड़ी समेत सभी मुश्किल आपरेशन के दौरान वे पल-पल की जानकारी लेते रहे और जरूरी निर्देश देते रहे।
समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के प्रयास
इसके बाद आया एक नया महत्वपूर्ण कदम। नक्सलियों के परिवारों से मिलकर उनकी सुरक्षित घर वापसी की संभावनाओं को टटोला गया। उन्हें देश और समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए प्रेरित किया गया। नक्सलियों का मुख्यधारा से जुड़ने का फैसला बताता है कि सशस्त्र आंदोलन की जिस वैचारिकी पर इन्हें यकीन था, वह टूट चुका है।
विश्लेषकों का मानना है कि यह दौर नक्सल आंदोलन के अंत की शुरुआत हो सकता है। नक्सल संगठन के भीतर वैचारिक मतभेद, संसाधनों की कमी और लगातार जारी सुरक्षा बलों के दबाव ने उनकी पकड़ कमजोर कर दी है। वहीं सरकार की नई रणनीति ऑपरेशन से ज्यादा संवाद अब असर दिखाने लगी है।
शाह के नेतृत्व वाली सेंट्रल नक्सल की “Safe Corridor Policy” की रणनीति भी बहुत कारगर साबित हुई। नक्सलवाद की सतत मॉनिटरिंग करने वाली सेंट्रल नक्सल डेस्क ने इस रणनीति पर मुहर लगाई थी। अब इसका बड़ा असर होता दिख रहा है।
सरकार ने भले ही औपचारिक रूप से युद्धविराम की घोषणा नहीं की हो, लेकिन बस्तर के जंगलों में करीब दो साल बाद एमएम गोलियों की आवाज़ थमी है। लगातार चल रहे एनकाउंटरों के बीच यह पहली बार है जब ऐसी खामोशी के बीच आत्मसमर्पण के रिकॉर्ड बन रहे हैं।
वैसे अभी कुछ जिलों में माओवादी असर बना हुआ है, वो पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। छत्तीसगढ़ के सुकमा, बीजापुर और नारायणपुर, ओडिशा के मलकानगिरी और झारखंड के लातेहार में नक्सलियों के छोटे गुट सक्रिय हैं। हालांकि अब इनका असर “स्थानीय स्तर” तक सीमित है। इनके पास न तो बड़ी सैन्य क्षमता बची है, न राजनीतिक वैधता।
विशेषज्ञों का मानना है कि आंदोलन के तौर पर नक्सलवाद खत्म होने की दिशा में जरूर बढ़ रहा है, लेकिन “विचार के तौर पर नहीं।” गरीबी, विस्थापन, और खनन जैसे मुद्दे अब भी मौजूद हैं और इन्हीं पर नक्सल विचारधारा ने कभी जन्म लिया था। अगर ये असमानताएं बनी रहती हैं, तो माओवाद किसी न किसी रूप में लौट सकता है। लेकिन ये सच है कि अब उसके लिए जमीन काफी कमजोर पड़ने लगी है। कभी “लाल गलियारा” कहलाने वाला इलाका अब “हरित विकास” की दिशा में बढ़ रहा है।






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