साहित्य का बदलता चरित्र
एक समय था जब समाज को ताकत या बुद्धि संचालित करती थी, पर अब केंद्र में बाज़ार है। विडंबना यह है कि बाज़ार की सुविधा के लिए राजनीति समाज को बाँटती है, और बाँटने वाली यही राजनीति आज साहित्य का चरित्र तय...

अभिव्यक्ति
दिनेश सिंदल,
कवि, लेखक
Table Of Content
एक समय था जब ताकत समाज का संचालन किया करती थी। जो ज्यादा ताकतवर, उसी का शासन।
फिर समय आया कि बुद्धि समाज को संचालित करने लगी। चाणक्य जैसे लोग हुए जो राजाओं को दिशा निर्देश देते थे और राजा उनके निर्देशानुसार राज का काम-काज किया करते थे। अब बाजार समाज की दिशा- दशा तय कर रहा है, न ताकत न बुद्धि। पैसा केन्द्र में आ गया है। अब पैसे से सब कुछ खरीदा जा सकता है बल भी, बुद्धि भी।
आज हमारी राजनीति का चरित्र बाजार तय करता है और हमारे साहित्य का चरित्र हमारी राजनीति।
राजनेता को सुविधा इसमें रहती है कि लोग एक जुट होकर न रहे। वे बंटकर रहे। वह जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा के आधार पर जनता को बांटता है। जनता की एकता ही जनता पर राज करने में राजनेता के लिए सबसे बड़ी बाधा होती है।
चूंकि साहित्य जोड़ने का काम करता है अतः साहित्य बाजार व राजनीति का दुश्मन बन जाता है। संगठित लोगों पर राज करना मुश्किल होता है। अतः बाजार और राजनीति का पहला काम होता है, साहित्य को खत्म करना। उसके रास्ते में बाधाएं खड़ी करना।
साहित्य को बांटने की कोशिश
हमारे देश की वोटों की राजनीति ने अपने स्वार्थ के लिए आमजन को धर्म, जाति, लिंग, भाषा, क्षेत्र के आधार पर अलग- अलग खेमों में बांट रखा है। जिस तरह से जनता को बांटा गया है, हमारे साहित्य को भी नव विमर्श के नाम पर इसी तरह बांटने की कोशिश की जा रही है।
चूंकि हमारे देश में कुछ विशेष लोगों के लिए कुछ विशेष सुविधाएं हैं। कुछ चीजें उनके लिए आरक्षित हैं। इस आरक्षण का लाभ साहित्यकार को भी दिखा। उसने साहित्य में भी नव विमर्श के नाम पर आरक्षण का बीज बोया। और आज हमारा साहित्य नव विमर्श के नाम पर विभिन्न खेमों में बंट गया।
आज का हमारा साहित्य दलित विमर्श, स्त्री विमर्श, आदिवासी विमर्श, पर्यावरण विमर्श, अल्पसंख्यक विमर्श, उत्तर औपनिवेशिक विमर्श नाम के कहीं झंडों के नीचे आ गया है। सबका अपना- अपना झंडा। सबके अपने-अपने स्वार्थ।
नव विमर्श के पीछे दलील यह दी जाती है कि इससे साहित्य को परंपरागत साहित्यिक दृष्टियों से हटकर नए सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और वैचारिक सन्दर्भों में देखा और समझा जाएगा। लेकिन इससे साहित्य का विभाजन ही हुआ। पुरस्कारोन्मुख हिंदी के रचनाकार के निजी हित तो सध गए, वह दलितों, अल्पसंख्यकों, महिलाओं का मसीहा तो बन गया, लेकिन इससे साहित्य का तो नुकसान ही हुआ।
समृद्ध भारतीय काव्यशास्त्र, जिसके पास एकजुट मानवीय अनुभवों को देखने की दृष्टि है, आज वह पहचान आधारित टुकड़ों में बंट गया।
साहित्य का अवमूल्यन
साहित्य के इस विभाजन से परंपरागत साहित्य का अवमूल्यन हुआ। उसे नकारा गया। इससे आज का लेखक अपनी जड़ों से कट गया। साहित्य का काम जहां मनुष्य को सुसंस्कृत करना, उसमें प्रेम, सद्भाव, आपसी भाईचारा जैसे मानवीय गुणों का विकास करना था। किंतु अब साहित्य की दृष्टि मनुष्य से हट कर एक वर्ग विशेष पर केंद्रित हो गई। इससे प्रचारात्मक लेखन बढ़ा और रचना की जगह नारेबाजी ने ले ली।
आज स्त्री विमर्श के नाम पर लिखी जा रही अधिकांश कविताओं में स्त्री पुरुष के विरुद्ध खड़ी दिखाई देती है। वह हर मोर्चे पर पुरुष को हराने, नीचा दिखाने, और बदला लेने के लिए तैयार खड़ी है।
दलित विमर्श के नाम पर जो लिखा जा रहा है उसकी भावनात्मक अतिशयोक्ति ने स्वर्णों और दलितों के बीच की खाई को और गहरा कर दिया है। वर्ग संघर्ष बढ़ा है। अल्पसंख्यक आज बहुसंख्यक के विरोध में खड़ा है। उनके बीच का संघर्ष सड़कों पर आ गया है। मजे की बात यह है कि ये सभी विमर्श राजनीतिक पार्टियों से पोषित और संचालित है।
नव विमर्श ने साहित्य को नई चेतना दी, परंतु जब यह साहित्यिकता से हट कर विचारधारा का साधन बना, तब उसने साहित्य के रचनात्मक सौंदर्य और सार्वभौमिक पक्ष को खत्म कर दिया। विचार प्रधानता के कारण कलात्मकता की हानि हुई। विचार और संदेश पर इतना जोर दिया गया कि साहित्य की सौंदर्यात्मकता, भावनात्मकता और भाषा की लयात्मकता पीछे छूट गई। लेखक किसी विशेष राजनीतिक या सामाजिक विचारधारा से प्रभावित होकर एकतरफा निष्कर्ष देने लगा। भाषा की कठोरता बढ़ी। यथार्थ के बोझ और सूखे तर्कों ने साहित्य को नीरस बना दिया।
रचना में रस, सौंदर्य और अनुभव की जगह नव विमर्श में संघर्ष, पीड़ा और असंतोष ने ले ली। इससे आनंद का पक्ष कमजोर हुआ। यही कारण है कि साहित्य का पाठक वर्ग धीरे-धीरे सिमटता चला गया।
एक मंच पर राहत इंदौरी ने कहा था की कविता समझने की कोशिश मत करना, बस इसमें डूब कर इसका आनंद लेना। ठीक ही कहा था, क्योंकि कविता कोई कुछ शब्दों का जोड़ नहीं। वह उससे ‘कुछ ज्यादा’ है। कविता में एक और एक ग्यारह भी हो सकते हैं और दो माइनस एक जीरो भी हो सकता है। इस विमर्श की राजनीति ने हमें इस ‘कुछ ज्यादा’ से वंचित कर दिया।
एक गूंगा पेड़ मौसम को यहां गाता रहा
आंधियों के नाम पर भी फूल बरसाता रहा
छोड़ देगा वो नुकीलापन यही बस सोच कर
मैं भी लहरों की तरह पत्थर से टकराता रहा






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