खेतों का कवच बने एआइ औजार
कभी—कभी तो यह आकलन करना भी मुश्किल था कि आखिर मिट्टी को कितनी खाद या वांछित पानी देना है और फसल के रोगों का सटीक निराकरण या उपचार क्या है। लेकिन अब इन सवालों का जवाब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआइ...

हरित आंदोलन का मार्ग प्रशस्त करेगा एआइ
प्रो. (डॉ.) सचिन बत्रा,
वरिष्ठ पत्रकार
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अब तक हमारे देश के किसान खेती में अनगिनत खतरों से अकेले लोहा लेते हुए नफा-नुकसान की पेचीदा पहेली ही नहीं, वांछित मात्रा में फसल उत्पादन की चुनौतियों को सुलझाने में जुटे थे। उत्पादन के लक्ष्य को हासिल करने में उसके सामने कई बाधाएं, हरियाली का आखेट कर लेती थीं। कभी मौसम की मार तो कभी कीटों का वार, यही नहीं कभी—कभी तो यह आकलन करना भी मुश्किल था कि आखिर मिट्टी को कितनी खाद या वांछित पानी देना है और फसल के रोगों का सटीक निराकरण या उपचार क्या है। लेकिन अब इन सवालों का जवाब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआइ देने को तैयार है।
अगर दुनिया की बात की जाए तो जर्मन कंपनी पीइएटी ने ‘प्लॉटिक्स’ एआइ एप विकसित किया है। इसमें एक किसान कीट संक्रमित या मौसमी रोग की चपेट में आई फसल का मोबाइल से फोटो खींचकर ‘इमेज रिकाग्निशन’ व डीप लर्निंग तकनीक के एआइ एप से समस्या की पहचान कर समाधान का ज्ञान हासिल कर सकता है। इसी प्रकार अमेरिका में अब ‘फार्मबॉट’ जैसे रोबॉट भी खेती में सिंचाई, जल प्रबंधन व निगरानी के लिए लोकप्रिय हो रहे हैं। इस परिशुद्ध खेती से खाद और कीटनाशकों का खर्च आधा कर दिया है। दिलचस्प बात यह है कि एआइ आधारित हार्वेस्ट सीआरओओ और एग्रोबॉट फसल उगा रहे हैं। वहीं इकोरोबॉटिक्स कीटनाशकों के न्यूनतम उपयोग में सटीक साबित हो रहे हैं। ऐसे ही इजराइल में तो कई कंपनियां कृषि में एआइ स्टार्टअप के लिए अपना दमखम आजमा रही हैं। जैसे ‘तारानिस’ कंपनी अपने एआइ एप से फसल की सेहत जांच व निगरानी करती है। ‘प्रोस्पेरा’ अपने एप से फसल प्रबंधन, ‘प्साइटेक’ के एआइ औजारों से नियंत्रित सिंचाई, ‘फील्डइन’ कंपनी पेस्ट मात्रा व रोग का आकलन और ‘इक्विनॉम’ कंपनी एआइ औजारों से बीजारोपण व गुणात्मक उत्पादन के लिए अपने एआइ टूल्स का उपयोग कर खेती को अधिक सुरक्षित व मुनाफे का कारोबार बनाने में सहायक साबित हो रही है। ऐसे ही नीदरलैंड में एआइ संचालित खेती से छोटे खेत भी अधिक फसल देकर मिट्टी से सोना उगल रहे हैं।
उत्पादन को गुणात्मक गति देने के प्रयास
हमारे देश में भी खेती को रक्षा कवच और उत्पादन को गुणात्मक गति देने के लिए एआइ आधारित शोध व समाधान का अभियान चल रहा है। सरकारी ही नहीं गैर सरकारी प्रयास भी इसमें मील का पत्थर कायम करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। देश में पहली बार भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद व भारतीय धान अनुसंधान संस्थान ने एआइ आधारित ‘क्रिसपर क्रास9’ तकनीक से जीनोम एडिटेड धान की दो किस्में ‘कमला’ डीआरआर धन 100 और ‘पुसा’ डीएसटी राइस 1 विकसित की हैं। जो कम पानी में अच्छी उपज और जलवायु अनुकूलन में सफल साबित हुई। इसी प्रकार भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, राजस्थान में एआइ आधारित ड्रोन सेंसिंग तकनीक से फसलों की निगरानी, कीटों की पहचान सहित दवा व वांछित मात्रा का उपयोग कर रहा है। इसी प्रकार कीट नियंत्रण के लिए आइआइटी खड़गपुर के विद्यार्थियों ने ‘का्ॅपसेंस’ नामक एआइ प्रणाली इजाद की है जो मिट्टी की उर्वरा क्षमता और फसलों की सेहत के मामले में डिजिटल डॉक्टर साबित हो रही है। फायदा यह भी हुआ कि लागत भी कम हुई और कीटनाशकों के कम उपयोग से पर्यावरण भी संतुलित रहा। हैदराबाद में भी एक स्टार्टअप कंपनी ‘फैसल’ ने एआइ एप उपयोग करते हुए सिंचाई में 40 प्रतिशत पानी की बचत करते हुए जल संरक्षण में सफलता प्राप्त की है। इसी प्रकार पंजाब में किसान मित्र एआइ परियोजना के जरिए किसान मौसम का सटीक अनुमान लगाते हुए 18 फीसदी लाभ प्राप्त करने में कामयाब हुए हैं।
भारत सरकार की 900 करोड़ की सहायता
उल्लेखनीय है कि “मेक एआइ इन इंडिया एंड मेक एआइ वर्क फॉर इंडिया” विजन के तहत भारत सरकार ने 900 करोड़ की वित्तीय सहायता की घोषणा की है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ऑफ एक्सीलेंस के तहत खेती सहित स्वास्थ्य व शहरों के विकास किए जाने की घोषणा की है। वहीं राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल ने भी सेंटर फॉर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इन एग्रीकल्चर की स्थापना करते हुए कृषि में एआइ समाधानों की साक्षरता और कौशल प्रशिक्षण के लिए बजट जारी किया है। चौथी औद्योगिक क्रांति के लिए वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम इंडिया सेंटर व भारत के कृषि मंत्रालय ने तेलंगाना राज्य में ‘एआइ4एआइ’ की पहल करते हुए खम्मम जिले के सात हजार किसानों को एआइ आधारित तमाम सुविधाएं व परामर्श मुहैया कराए हैं। “सागू बागू” नामक अभियान के तहत कृषकों को ड्रोन, मौसमी जानकारी, फसल स्वास्थ्य, उर्वरा जांच, मिट्टी परीक्षण सहित बॉट सर्विस जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। मजेदार बात तो यह भी है कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को सटीक बनाने में भी अब एआइ और एमएल का उपयोग किया जा रहा है। हाल ही में देश में पहली बार अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी यानी सैटेलाइट का उपयोग करते हुए फसल बीमा किया गया। इस संबंध में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद ‘मैपकास्ट’ के महानिदेशक अनिल कोठारी ने कहा है कि राजस्थान सहित अन्य राज्यों में भी इस मॉडल को आजमाया जाएगा। उनका मानना है कि इससे न केवल बीमा प्रक्रिया सरल होगी, बल्कि एआइ किसानों के लिए बहुत सहायक हो सकती है। आइआइटी बॉम्बे में भी इनक्यूबेटेड स्टार्टअप ‘टैरास्टैक’ ने एग्रीकल्चर लैंडस्केप अंडरस्टैंडिंग एपीआइ का उपयोग करते हुए लैंड रिकार्ड अपडेट किया और जलवायु जोखिमों से खेतों को बचाने की कवायद शुरू कर दी है।
खेती में एआइ मुहिम पर दुनिया की नजर
दरअसल खेती में एआइ की इस मुहिम में पूरी दुनिया कूद पड़ी है। इसका सबसे बड़ा कारण कहीं जनसंख्या अधिक होना है तो कहीं जमीन कम होना। यही नहीं ग्लोबल बिजनेस के क्षेत्र में जब कृषि की सुरक्षा सुनिश्चित होगी तो निश्चय ही इसमें निवेश भी होगा और यह कॉर्पोरेट की तरह एक संगठित उद्योग का रूप ले सकती है। नीति आयोग की 2021 की रिपोर्ट को आधार माना जाए तो एआइ के उपयोग से कृषि उत्पादकता में अधिकतम 25 फीसदी की वृद्धि संभव है। इसी प्रकार सीएजीआर की हालिया रिपोर्ट में एआइ आधारित रूपांतरण के चलते कृषि क्षेत्र में 23.1 प्रतिशत की बढ़ोतरी का अनुमान लगाया गया है। माना जा रहा है कि पूरी दुनिया में एआइ का जादू हरियाली और खाद्यान्न सुनिश्चितता को रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचा देगा। सीएजीआर की रिपोर्ट के मुताबिक वैश्विक स्तर पर कृषि बाजार 2023 में जहां 1.7 बिलियन डॉलर था वह 2028 तक उछल कर 4.7 बिलियन यूएस डॉलर तक पहुंच जाएगा।
आंकड़ों की बात करें तो ऐसा माना जाता है कि हमारे देश में लगभग आधी आबादी खेती से जुड़ी है और जीडीपी में इसका करीब 18 फीसदी का योगदान है। लेकिन यह भी माना जाता है कि हमारे खेत किसी खजाने से कम नहीं है। इसलिए पूरी दुनिया की निगाहें और खोज हमारे इर्द—गिर्द चलती रहती है। हाल ही में गूगल ने भी भारतीय खेती में बदलाव के लिए अपना एग्रीकल्चरल मॉनिटरिंग एंड इवेंट डिटेक्शन ‘अमेड’ एप्लीकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस एपीआइ पेश किया है। यह पूरे भारत में फसल और खेती को ट्रैक कर आंकड़े इकट्ठा करते हुए उत्पादन बढ़ाने के उपकरण विकसित करने में मदद करेगा। खास बात यह है कि गूगल डीपमाइंड के शोधकर्ता एम्प्लीफाई इनीशिएटिव के माध्यम से आइआइटी खड़गपुर के साथ साझेदारी में किसानों को फसल की बुवाई कटाई ही नहीं फसल बोने के लिए उपयुक्त तारीख और समय भी बताएगा।
कुल मिलाकर भारत सरकार और निजी कंपनियां एआइ औजारों के माध्यम से एक नए हरित आंदोलन की क्रांतिकारी बुनियाद तय करने में जुट गई है। लिहाजा ऐसा माना जा सकता है कि आने वाले समय में अन्य रोजगार और व्यापार की तरह खेती भी कारोबार का खिताब हासिल कर लेगी और हमारा देश एआइ सुरक्षित कृषि प्रधान देश बन जाएगा।






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