पड़ोसी के झगड़े में भारत का नाम क्यों?
पाकिस्तान और तालिबान के बीच बढ़ते तनाव के बीच, पाकिस्तान अब इस विवाद में भारत को जिम्मेदार ठहराने लगा है। असल में यह उसके अपने संकटों को छिपाने का तरीका है — जब भी पाकिस्तान मुश्किल में होता है, वह...

पाकिस्तान इन दिनों कई मोर्चों पर घिरा हुआ है। अर्थव्यवस्था बदहाल है, जनता महंगाई से परेशान है, और सीमाओं पर हालात बिगड़ते जा रहे हैं। खासतौर पर अफगानिस्तान के तालिबान के साथ उसका रिश्ता अब पहले जैसा नहीं रहा। जो कभी उसके “रणनीतिक साथी” माने जाते थे, अब वही पाकिस्तान के लिए सिरदर्द बन गए हैं। और हमेशा की तरह, पाकिस्तान ने अपने इस सिरदर्द का इलाज भारत को ठहराने में ढूंढ लिया है।
हाल ही में आई फोर्ब्स की रिपोर्ट ने इस बात पर रोशनी डाली कि कैसे पाकिस्तान अब तालिबान के साथ अपने विवादों में भारत का नाम खींच रहा है। उसका कहना है कि भारत अफगानिस्तान में “खेल” खेल रहा है — तालिबान को भड़का रहा है, सीमा पर माहौल बिगाड़ रहा है, और पाकिस्तान को अस्थिर करने की कोशिश कर रहा है। पर असली सवाल यह है कि क्या सचमुच भारत का इसमें कोई हाथ है, या यह पाकिस्तान की वही पुरानी कहानी है जो हर संकट में दोहराई जाती है?
सच यह है कि पाकिस्तान को हमेशा एक “बाहरी दुश्मन” चाहिए होता है। जब भी उसकी सरकार जनता के सवालों से घिरती है, जब भी अर्थव्यवस्था डगमगाती है, जब भी जनता सड़कों पर उतरती है — उसके नेताओं को भारत का नाम लेना याद आ जाता है। यह एक तरह का “राजनीतिक सुरक्षा कवच” बन चुका है। भारत का नाम लो, देश के भीतर उठते सवालों को दबा दो।
इस बार मामला थोड़ा अलग है, क्योंकि पाकिस्तान को उम्मीद थी कि अफगानिस्तान में तालिबान की सरकार बनने से उसका प्रभाव बढ़ेगा। आखिरकार, तालिबान के कई नेता वर्षों तक पाकिस्तान में पनाह लेते रहे थे। इस्लामाबाद को लगा था कि अब काबुल उसकी सुनकर चलेगा। लेकिन हुआ उलटा। तालिबान ने अपनी राह अलग चुन ली। उसने पाकिस्तान की बात मानने से इनकार कर दिया, खासकर तब जब पाकिस्तान ने “तेहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान” (टीटीपी) के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया।
टीटीपी वही संगठन है जो पाकिस्तान में सेना और सरकार पर हमले करता है, और उसका ताल्लुक अफगान तालिबान से भी रहा है। अफगान तालिबान इन लड़ाकों को पनाह देता रहा है। पाकिस्तान ने जब इस पर दबाव बनाया, तो तालिबान ने उल्टा पाकिस्तान के सैनिक ठिकानों पर जवाबी कार्रवाई की। सीमा पर झड़पें होने लगीं। दर्जनों सैनिक मारे गए।
अब पाकिस्तान के सामने एक मुश्किल सवाल था — वो जनता को कैसे समझाए कि जिस तालिबान को उसने वर्षों तक समर्थन दिया, वही अब उसके खिलाफ खड़ा है? यही वह वक्त था जब भारत का नाम काम आ गया। पाकिस्तान ने कहना शुरू किया कि भारत अफगानिस्तान में अपनी जड़ें जमा रहा है और वही तालिबान को भड़का रहा है।
असल में यह पाकिस्तान की “डर की राजनीति” है। वह तालिबान को यह जताना चाहता है कि भारत उसके लिए खतरा है। ताकि तालिबान उसके खिलाफ नरम पड़े और फिर से पुराने रिश्ते बहाल हो जाएं। साथ ही वह दुनिया को यह भी दिखाना चाहता है कि पाकिस्तान खुद आतंकवाद का शिकार है, ताकि उसे अंतरराष्ट्रीय सहानुभूति और मदद मिल सके।
लेकिन दुनिया अब इन बहानों को पहले जैसी गंभीरता से नहीं लेती। पिछले दो दशकों में पाकिस्तान की नीतियों ने खुद उसकी साख कमजोर कर दी है। जब आप लंबे समय तक चरमपंथी समूहों को “संपर्कों” के नाम पर सहारा देते हैं, तो एक दिन वही आपके खिलाफ खड़े हो जाते हैं। आज पाकिस्तान उसी आग में झुलस रहा है, जिसे उसने खुद भड़काया था।
भारत की बात करें, तो वह अफगानिस्तान में बहुत सीमित भूमिका निभा रहा है। तालिबान सरकार के साथ भारत का कोई औपचारिक रिश्ता नहीं है, केवल मानवीय सहायता और विकास परियोजनाओं के ज़रिए वह वहाँ अपनी उपस्थिति बनाए रखे हुए है। भारत इस वक्त अपनी विदेशी नीति में पश्चिमी साझेदारी, इंडो-पैसिफिक रणनीति और वैश्विक आर्थिक सहयोग पर ध्यान दे रहा है। अफगानिस्तान या तालिबान से उसकी कोई सीधी भिड़ंत नहीं है।
इसलिए पाकिस्तान का यह आरोप कि भारत तालिबान को उकसा रहा है, ठोस सबूतों से कोसों दूर है। बल्कि यह उसके भीतर की बेचैनी का संकेत है। पाकिस्तान जानता है कि उसका प्रभाव क्षेत्र सिमटता जा रहा है। चीन उस पर भरोसा तो दिखाता है, पर सावधानी से। अमेरिका पहले ही दूरी बना चुका है। खाड़ी देश भी अब पाकिस्तान के बजाय भारत के साथ गहरे संबंध बना रहे हैं। इस तरह के माहौल में भारत का नाम लेना उसके लिए “राजनीतिक ऑक्सीजन” बन जाता है।
लेकिन यह ऑक्सीजन अस्थायी है। भारत को हर बार दोष देने से पाकिस्तान की आर्थिक या सुरक्षा समस्याएँ खत्म नहीं होंगी। उलटे, इससे उसके भीतर का असंतोष और बढ़ेगा। क्योंकि जनता अब समझने लगी है कि हर बार “भारत” का डर दिखाकर उनकी रोज़मर्रा की परेशानियाँ दूर नहीं होंगी।
भारत के लिए यह समय संयम और सावधानी का है। पाकिस्तान की बयानबाज़ी पर प्रतिक्रिया देने के बजाय उसे शांत और व्यावहारिक रुख बनाए रखना चाहिए। भारत को अपनी नीतियाँ इस तरह बनानी होंगी कि उसका ध्यान क्षेत्रीय स्थिरता और विकास पर रहे, न कि पड़ोसी की उथल-पुथल पर।
कुल मिलाकर, पाकिस्तान का भारत को तालिबान विवाद में घसीटना किसी सच्चाई पर नहीं, बल्कि एक राजनीतिक रणनीति पर आधारित है। यह रणनीति अपने अंदरूनी संकटों से ध्यान हटाने की कोशिश है। मगर इतिहास गवाह है कि इस तरह की नीतियाँ कभी स्थिरता नहीं लातीं। पाकिस्तान को अगर वास्तव में सुरक्षा चाहिए, तो उसे पहले अपने भीतर झाँकना होगा — क्योंकि असली दुश्मन शायद उसके अंदर ही बैठा है।






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