फिर नीतीश, फिर एनडीए – जनता ने बदलाव नहीं, भरोसा चुना
2025 के बिहार विधानसभा चुनाव के एग्ज़िट पोल ने एक बार फिर एनडीए के लौटने के संकेत दिए हैं। सात प्रमुख एजेंसियों के अनुमान में भाजपा-जदयू गठबंधन को 133 से 167 सीटों का लाभ दिखाया गया है, जबकि...

2025 के बिहार विधानसभा चुनाव के एग्ज़िट पोल ने एक बार फिर एनडीए के लौटने के संकेत दिए हैं। सात प्रमुख एजेंसियों के अनुमान में भाजपा-जदयू गठबंधन को 133 से 167 सीटों का लाभ दिखाया गया है, जबकि महागठबंधन 70 से 102 सीटों पर सिमटता दिख रहा है।
तेजस्वी यादव की युवा अपील, महंगाई और बेरोज़गारी जैसे मुद्दों के बावजूद जनता ने बदलाव से अधिक स्थिरता को चुना। 2015 के जातीय समीकरणों और 2020 के मामूली अंतर की तुलना में 2025 का रुझान बताता है कि बिहार अब “राजनीतिक परिपक्वता” के चरण में प्रवेश कर चुका है—जहाँ जनता दलों की बयानबाज़ी से आगे जाकर शासन की स्थिरता को प्राथमिकता दे रही है।बिहार की राजनीति भारतीय लोकतंत्र का वह दर्पण है जिसमें देश के सामाजिक, आर्थिक और वैचारिक परिवर्तन सबसे स्पष्ट दिखते हैं।
2025 के विधानसभा चुनाव के एग्ज़िट पोल परिणामों ने एक बार फिर यह दर्शाया है कि बिहार आज भी राजनीतिक प्रयोगशाला बना हुआ है—लेकिन इस बार प्रयोग नहीं, बल्कि स्थिरता जनता की पहली पसंद बनकर उभरी है।
सात प्रमुख एजेंसियों—मेट्रिज़, पीपल्स पल्स, टीवी9, भास्कर, एबीपी-सी वोटर, इंडिया टुडे और जन की बात—के अनुमानों में एनडीए को 133 से 167 सीटों तक मिलने की संभावना जताई गई है। इसका अर्थ यह है कि भाजपा-जदयू गठबंधन न केवल बहुमत रेखा (122 सीट) पार करता दिख रहा है, बल्कि पिछले चुनाव की तुलना में स्थिति और मजबूत कर रहा है। इसके विपरीत, महागठबंधन (राजद, कांग्रेस और वामदल) को 70–102 सीटों की सीमित बढ़त मिलती दिख रही है। वहीं प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी, जिसकी चर्चाएँ चुनाव से पहले खूब थीं, 0 से 5 सीटों तक सीमित रह सकती है। इन अनुमानों का राजनीतिक संदेश यह है कि बिहार की जनता ने इस बार “परिवर्तन” की बजाय “भरोसे” को प्राथमिकता दी है।
2015 और 2020 की पृष्ठभूमि में 2025 का परिप्रेक्ष्य
यदि हम पिछले दो चुनावों को संदर्भ में देखें तो यह स्पष्ट है कि बिहार के मतदाता अब अधिक व्यवहारिक हो चुके हैं।2015 में महागठबंधन (राजद-जदयू-कांग्रेस) ने अप्रत्याशित विजय पाई थी—243 में से 178 सीटें जीतकर भाजपा को 58 सीटों तक सीमित कर दिया था। उस समय नीतीश कुमार और लालू यादव का गठबंधन “सांप्रदायिकता बनाम सामाजिक न्याय” की बहस पर टिका था। परंतु 2020 तक यह समीकरण उलट गया। नीतीश कुमार ने फिर भाजपा के साथ हाथ मिलाया, और एनडीए ने 125 सीटें जीतकर मामूली अंतर से सत्ता बरकरार रखी। राजद उस बार भी सबसे बड़ी पार्टी बनी, पर बहुमत से दूर रह गई।अब 2025 में एग्ज़िट पोल यह संकेत दे रहे हैं कि एनडीए एक बार फिर आरामदायक बहुमत की ओर बढ़ रहा है। इसका मतलब यह हुआ कि मतदाताओं ने नीतीश कुमार की राजनीतिक स्थिरता और भाजपा के संगठनात्मक ढाँचे को अब भी भरोसेमंद माना है।
नीतीश कुमार की “राजनीतिक विश्वसनीयता” बनाम महागठबंधन की “विकल्पहीनता”
नीतीश कुमार की राजनीति में सबसे बड़ी ताकत उनकी “विश्वसनीयता” है। आलोचनाएँ अनेक हैं—गठबंधन बदलने से लेकर, विकास के ठहराव तक—लेकिन बिहार का मतदाता अब भी उन्हें एक अनुभवी और संतुलित प्रशासक के रूप में देखता है। एनडीए के भीतर भाजपा का संगठन और केंद्र की योजनाओं का प्रचार जनता तक पहुँचाने में बड़ा योगदान देता है, जबकि जदयू का स्थानीय प्रशासनिक ढाँचा अब भी ग्रामीण स्तर पर प्रभावशाली है। तेजस्वी यादव ने इस चुनाव को बेरोज़गारी, महंगाई, और भ्रष्टाचार के मुद्दों पर केंद्रित करने की कोशिश की। उन्होंने युवाओं को रोजगार देने के वादे दोहराए, हर सभा में “10 लाख नौकरियाँ” की बात की। लेकिन, जनता ने इसे विश्वसनीय विकल्प की तरह नहीं देखा। कारण यह कि 2020 के चुनाव में भी यही वादा किया गया था, जिसका ठोस पालन कभी नहीं दिखा। तेजस्वी की भाषा परिपक्व हुई है, व्यवहार संयमित हुआ है, लेकिन राजद की “वंशवाद” छवि और लालू यादव के युग की स्मृतियाँ अब भी मतदाताओं के मन में हैं। गाँव-देहात में यह धारणा बनी हुई है कि राजद की वापसी का मतलब होगा—अनिश्चितता और अव्यवस्था का दौर लौट आना।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का प्रभाव और भाजपा की संगठनात्मक रणनीति
भाजपा ने इस बार बिहार को केवल राज्य नहीं, बल्कि 2026 के लोकसभा चुनाव की पूर्वभूमि के रूप में देखा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैलियाँ और उनके विकास केंद्रित संदेश—“डबल इंजन सरकार”—ने जनता में स्थिरता का माहौल बनाया। भाजपा ने जातीय समीकरणों से ऊपर उठकर “गरीब कल्याण” और “महिला सशक्तिकरण” जैसे सार्वभौमिक मुद्दों को केंद्र में रखा। महिलाओं के लिए “उज्ज्वला योजना”, “लाडली लक्ष्मी” जैसी योजनाओं का लाभ ग्रामीण इलाकों में गहराई तक गया है। यही कारण है कि महिला मतदाता एनडीए का स्थायी आधार बन चुकी हैं।इसके साथ ही, भाजपा ने अपने संगठन को बूथ स्तर तक सशक्त किया। 2020 में जहाँ कई सीटों पर गठबंधन के भीतर मतांतरण के कारण नुकसान हुआ था, इस बार चुनाव प्रबंधन में अधिक समन्वय दिखा।
जन सुराज: नयी शुरुआत, सीमित असर
प्रशांत किशोर का “जन सुराज” आंदोलन, जो बिहार की राजनीति में नई सोच लाने के वादे के साथ शुरू हुआ था, अपेक्षित परिणाम नहीं दे सका। किशोर ने लंबी पदयात्रा की, गाँव-गाँव संवाद किया, परंतु उनकी अपील मुख्यतः शिक्षित मध्यवर्ग तक सीमित रह गई। ग्रामीण मतदाता उन्हें “सिस्टम के भीतर नहीं, बाहर” के व्यक्ति के रूप में देखते रहे।राजनीति केवल विचारों का नहीं, बल्कि संगठन और जमीनी पकड़ का खेल है—और जन सुराज को इस दिशा में अभी लंबा रास्ता तय करना होगा।
जातीय गणित से आगे बढ़ता बिहार
बिहार की राजनीति लंबे समय तक जातीय समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमती रही—यादव, कुर्मी, ब्राह्मण, मुसलमान, दलित—हर चुनाव इन्हीं समीकरणों के संतुलन से तय होता था। परंतु 2025 के एग्ज़िट पोल यह इशारा कर रहे हैं कि यह ढाँचा अब टूट रहा है।भाजपा और जदयू ने ओबीसी और अति-पिछड़ा वर्ग में गहरी पैठ बनाई है। दलित समुदाय में चिराग पासवान की एलजेपी (रामविलास) को सीमित परन्तु निर्णायक समर्थन मिला है।दूसरी ओर, राजद का यादव-मुस्लिम समीकरण अब उतना ठोस नहीं रहा। युवाओं में जातीय निष्ठा की जगह रोजगार और शिक्षा का सवाल अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। यह संकेत बिहार में “नये राजनीतिक युग” की ओर इशारा करता है।
आर्थिक और सामाजिक मुद्दों की परख
बिहार की अर्थव्यवस्था अब भी भारत के सबसे पिछड़े राज्यों में गिनी जाती है। राज्य की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से आधी से भी कम है। लेकिन जनता ने इस चुनाव में केवल आर्थिक आंकड़ों को आधार नहीं बनाया। उन्हें शायद लगता है कि “जो थोड़ा सुधार दिख रहा है, वह इसी व्यवस्था में संभव है।”राज्य में शिक्षा और स्वास्थ्य ढाँचा कमजोर है, लेकिन योजनाओं के अमल में पारदर्शिता की कुछ झलकें नीतीश शासन में दिखीं। यही भरोसा मतदाताओं को एक बार फिर उसी शासन की ओर खींचता प्रतीत होता है।
राष्ट्रीय राजनीति पर असर
बिहार का यह एग्ज़िट पोल परिणाम केवल एक राज्य का संकेत नहीं, बल्कि आने वाले लोकसभा चुनावों की झलक भी है। यदि अंतिम परिणाम इसी दिशा में रहते हैं, तो भाजपा के लिए यह मनोवैज्ञानिक जीत होगी। विपक्षी गठबंधन—जिसने “INDIA” नाम से राष्ट्रीय स्तर पर एकता का प्रदर्शन किया था—उसके लिए बिहार की हार एक गंभीर झटका होगी। बिहार वह राज्य है जिसने अतीत में कई बार राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय की है—जेपी आंदोलन से लेकर मंडल राजनीति तक। अब यदि जनता एनडीए को फिर से चुनती है, तो यह इस बात का संकेत होगा कि भारत का मतदाता “स्थिरता” और “विश्वसनीय शासन” को प्राथमिकता देने लगा है, चाहे विपक्ष के नारे कितने भी आकर्षक क्यों न हों।
भविष्य की चुनौतियाँ और जनता का संदेश
यदि एनडीए की संभावित जीत वास्तविकता में बदलती है, तो नीतीश कुमार और भाजपा दोनों के सामने गंभीर जिम्मेदारियाँ होंगी। बिहार अब केवल “सड़क-बिजली-पानी” के विकास से आगे बढ़ चुका है; अब यहाँ शिक्षा, स्वास्थ्य, और रोजगार के गहरे सुधार की मांग है।तेजस्वी यादव और विपक्ष के लिए भी यह आत्ममंथन का समय होगा—क्या वे केवल सरकार की आलोचना से आगे बढ़कर कोई ठोस नीति प्रस्तुत कर सकते हैं? बिहार की जनता अब प्रश्न पूछती है, लेकिन समाधान भी चाहती है।
अंत में
एग्ज़िट पोल केवल अनुमान हैं, पर वे जनता की मनःस्थिति का आईना अवश्य दिखाते हैं। और उस आईने में इस बार जो झलक मिलती है, वह है—“स्थिरता के प्रति झुकाव”।बिहार ने यह संदेश दिया है कि लोकतंत्र में बदलाव उतना ही जरूरी है जितनी स्थिरता; लेकिन जब विकल्प विश्वसनीय न हो, तो जनता यथास्थिति को भी अस्थायी रूप से स्वीकार कर लेती है।इस जनादेश में सत्ता पक्ष के लिए आत्मसंतोष की गुंजाइश नहीं है, बल्कि यह चेतावनी है कि भरोसे की यह पूंजी टिकाऊ तभी रहेगी जब उसे अच्छे शासन, पारदर्शिता और ईमानदार नीतियों से संवारा जाए।बिहार की राजनीति ने एक बार फिर देश को सिखाया है कि लोकतंत्र में सबसे बड़ा सुधारक कोई नेता नहीं, बल्कि जनता स्वयं होती है।






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