शिक्षा व कौशल का सहअस्तित्व जरूरी
शिक्षा सोचने की शक्ति देती है, और कौशल उस सोच को आकार देने की क्षमता। बिना बुनियादी शिक्षा के कौशल टिक नहीं पाता, और बिना कौशल के शिक्षा अधूरी रह जाती है। आज जरूरत है उस नई दृष्टि की, जो दोनों को...

अगर शिक्षा बीज है, तो कौशल उसका अंकुर
आज का दौर तेजी से बदलते कौशल का है। तकनीक हर रोज़ नया रास्ता दिखा रही है। ऐसे में कई युवाओं के मन में यह भ्रम घर कर रहा है कि शायद अब पढ़ाई की जरूरत पहले जैसी नहीं रही।
वे सोचते हैं कि केवल कुछ तकनीकी या बाजार आधारित कौशल सीखकर सफलता हासिल की जा सकती है। लेकिन क्या सच में यह इतना सरल है?
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सफलता का रास्ता हमेशा शिक्षा और कौशल, दोनों के संगम से बनता है। शिक्षा हमें समझने की शक्ति देती है, सोचने की दिशा देती है और असफलता से सीखने का साहस देती है। वहीं, कौशल उस समझ को व्यावहारिक रूप में ढालने का माध्यम है। अगर शिक्षा बीज है, तो कौशल उसका अंकुर। दोनों में से कोई भी अकेला फल नहीं दे सकता।
अब ‘सोचने वाले दिमाग’ की जरूरत
आज कंपनियां केवल ‘काबिल हाथ’ नहीं बल्कि ‘सोचने वाला दिमाग’ भी चाहती हैं। तकनीकी दक्षता के साथ वे ऐसे लोगों को तलाशती हैं जो संवाद कर सकें, निर्णय ले सकें और दबाव में भी संयमित रहें। ये गुण केवल किसी कोर्स से नहीं आते, ये अध्ययनशीलता और जीवन के अनुशासन से आते हैं।
शिक्षा अब डिग्री तक सीमित नहीं रह गई है। एक इंजीनियर जब डिज़ाइन सीखता है, एक डॉक्टर जब प्रबंधन की ट्रेनिंग लेता है या एक पत्रकार जब डेटा एनालिटिक्स समझता है, तो यह वही युग है जहां शिक्षा और कौशल की सीमाएं घुल चुकी हैं। युवा अब विषयों की दीवारें तोड़कर सीख रहे हैं और यही उन्हें भविष्य के लिए तैयार कर रहा है।
कौशल की सीख बिना सोच की गहराई के अधूरी है। उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति कंप्यूटर कोडिंग सीख सकता है, पर यदि उसके पास गणितीय सोच और तार्किक विश्लेषण की शिक्षा नहीं है, तो वह सीमित रह जाएगा। इसी प्रकार, अगर कोई डॉक्टर तकनीक तो सीख ले पर मनुष्य की भावनाओं को समझने की संवेदना न रखे, तो उसका ज्ञान अधूरा रहेगा।
पूर्णता के लिए संतुलन जरूरी
शिक्षा और कौशल का संतुलन ही व्यक्ति को पूर्ण बनाता है। जो युवा यह समझते हैं कि केवल शॉर्टकट या किसी तात्कालिक कोर्स से सफलता मिल जाएगी, वे अक्सर कुछ समय बाद रुक जाते हैं। असली प्रगति उसी की होती है जो लगातार सीखने की प्रवृत्ति बनाए रखता है। यही भविष्य की सबसे बड़ी पूंजी है, निरंतर सीखते रहना।
यहां यह उल्लेखनीय है कि हाल ही में जीरोधा के सह-संस्थापक निखिल कामत ने कहा था, “अब कंपनियां डिग्री नहीं, कौशल देखती हैं।”
उनका यह कथन अपने अनुभव की उपज है, और प्रेरक भी है। पर वास्तविकता इससे बड़ी है। क्योंकि कौशल तभी टिकता है जब उसकी नींव मजबूत शिक्षा पर टिकी हो। शिक्षा और कौशल दोनों की साझेदारी ही उस नए भारत की पहचान बनेगी, जो सोचता भी है और करता भी है।






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