अफवाहों की दौड़ में हार जाती हैं संवेदनाएं
धर्मेन्द्र के बारे में फैली झूठी खबर ने एक बार फिर दिखा दिया कि सोशल मीडिया की तेजी ने हमें कितना अधीर बना दिया है। बिना सत्यापन किसी सूचना को फैलाना अब सामान्य व्यवहार बन गया है। वक्त आ गया है कि हम...

अभिनेता धर्मेन्द्र के मामले में सोशल मीडिया की जल्दबाजी ने विवेक को फिर शर्मसार किया
राकेश गांधी,
पत्रकार
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प्रख्यात अभिनेता धर्मेन्द्र आज भी भारतीय सिनेमा के जीवंत प्रतीक हैं। एक ऐसा नाम जो सादगी, मेहनत और सहज आकर्षण का पर्याय रहा है। उनकी मुस्कान, संवाद-अंदाज़ और स्वाभाविक अभिनय ने उन्हें करोड़ों दिलों की धरोहर बना दिया। वे केवल रोमांटिक नायक नहीं थे, बल्कि एक ऐसे कलाकार थे जिन्होंने जीवन के हर रंग को पर्दे पर सलीके से जिया। आज जब वे उपचाराधीन हैं, तब भी उनके प्रति लोगों का स्नेह उसी तरह उमड़ता है, जैसे उनके स्वर्णिम दौर में था।
लेकिन अफसोस कि इसी स्नेह के बीच सोशल मीडिया की एक जल्दबाजी ने पूरे देश को चौंका दिया। दो दिन पहले एक अज्ञात अकाउंट से यह ‘खबर’ उछाल दी गई कि धर्मेन्द्र अब नहीं रहे। देखते ही देखते यह संदेश हर प्लेटफॉर्म पर फैल गया। सोशल मीडिया की गति इतनी तेज़ है कि कुछ ही घंटों में देशभर में शोक संदेशों की बाढ़ आ गई। लोगों ने श्रद्धांजलि देना शुरू कर दिया। किसी ने पुरानी तस्वीरें साझा कीं, किसी ने भावुक पोस्ट लिख डालीं, तो किसी ने ‘रेस्ट इन पीस’ तक कह दिया। पर सच्चाई कुछ और थी। धर्मेन्द्र न केवल जीवित थे, बल्कि उपचार के दौर से गुजरते हुए स्वास्थ्य लाभ की दिशा में अग्रसर थे। आखिरकार हेमामालिनी, ईशा देओल और सनी देओल को सामने आकर स्पष्टीकरण देना पड़ा कि ‘धर्मेन्द्र स्वस्थ हैं, आप सब उनकी लंबी उम्र की कामना कीजिए, कृपया अफवाहों पर ध्यान न दें।’
इतनी भी क्या जल्दबाजी..?
यह घटना केवल एक अफवाह नहीं थी। यह समाज के उस हिस्से की तस्वीर है, जो हर सूचना को बिना सोचे-समझे आगे बढ़ा देता है। यह वही जल्दबाजी है जो किसी की जिंदगी में अनावश्यक तनाव और किसी परिवार में बेचैनी का कारण बन जाती है। सवाल यह नहीं कि धर्मेन्द्र जैसे व्यक्तित्व के बारे में झूठी खबर क्यों फैली, बल्कि सवाल यह है कि हमने खुद से विवेक और संवेदना का रिश्ता क्यों तोड़ लिया है?
अफवाहें पहले भी फैलती थीं, लेकिन उनमें वक्त का अंतर होता था। किसी खबर के सत्यापन का अवसर था, सोचने का समय था। आज डिजिटल युग ने सूचना को पलक झपकते विश्वव्यापी बना दिया है, लेकिन संवेदना का स्तर उतनी ही तेज़ी से गिरा है।
और तो और, इस अफवाह को आगे बढ़ाने वालों में आम लोग ही नहीं, बल्कि शिक्षित वर्ग, डॉक्टर, अध्यापक और कुछ पत्रकार तक शामिल थे। यह वह वर्ग है जिससे समाज विवेक, संयम और जिम्मेदारी की उम्मीद करता है। यदि यही वर्ग बिना जांचे-परखे किसी व्यक्ति की मृत्यु की घोषणा कर दे, तो फिर आम जन से क्या अपेक्षा की जाए?
विवेक को ताक पर रख देता है शेयर बटन
हमारी समस्या यही है कि हमने शेयर बटन को विवेक से आगे रख दिया है। किसी संदेश का सत्य क्या है, यह जांचने की फुरसत किसी के पास नहीं। किसी की तस्वीर पर दो शब्द जोड़कर उसे ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ बना देना अब नया शौक बन गया है।
लेकिन यह मत भूलिए कि हर अफवाह किसी की भावनाओं पर चोट करती है। धर्मेन्द्र जैसे दिग्गज के मामले में तो परिवार ने शालीनता से प्रतिक्रिया दी, पर हर व्यक्ति इतना सहनशील नहीं होता। कई बार ऐसी गलत सूचनाओं के कारण परिवार टूट जाते हैं, संबंध बिगड़ जाते हैं, और किसी की सामाजिक साख धूल में मिल जाती है।
यह वक्त हमें आत्ममंथन करने का संकेत देता है। आखिर क्या हमें हर खबर पर तुरंत प्रतिक्रिया देनी चाहिए? क्या थोड़ा ठहरकर, सत्यापन कर लेना बुरा है? क्या किसी व्यक्ति की स्थिति की पुष्टि किए बिना श्रद्धांजलि देना या उसे दोषी ठहराना हमारी जिम्मेदारी से मेल खाता है?
हम भूल गए हैं कि सूचना की गति से कहीं ज्यादा मूल्यवान है उसकी सच्चाई। हर ‘फॉरवर्ड’ में विवेक का एक छोटा-सा ठहराव जरूरी है। हम सबको यह तय करना होगा कि हम सूचना के वाहक बनें या विवेक के रक्षक। धर्मेन्द्र का उदाहरण हमें यही सिखाता है कि प्रसिद्धि या लोकप्रियता चाहे जितनी भी हो, अफवाह का शिकार कोई भी बन सकता है। पर जो बात सबसे ज्यादा पीड़ा देती है, वह यह है कि जीते-जागते इंसान को मृत घोषित कर देना अब किसी को अपराध नहीं लगता।
डिजिटल विवेक विकसित करना जरूरी
समय आ गया है कि हम डिजिटल विवेक विकसित करें। सोशल मीडिया केवल सूचना का माध्यम नहीं, बल्कि समाज का आईना है। यदि उसमें असत्य और अधीरता का चेहरा दिखाई दे रहा है, तो दोष प्लेटफॉर्म का नहीं, हमारा है। किसी भी संदेश को साझा करने से पहले एक पल सोचिए कि क्या मैं जो भेज रहा हूं, वह सत्य है? क्या इससे किसी की भावनाएं आहत नहीं होंगी? यही एक क्षण का ठहराव हमें उस समाज की ओर वापस ले जा सकता है, जहां संवेदनाएं जीवित थीं और अफवाहें शर्मिंदा।






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