SIR पर बवाल: ममता बनाम सत्ता की चुनावी जंग
ममता बनर्जी ने SIR प्रक्रिया को “आपदा” बताते हुए आरोप लगाया कि सरकार मतदाता सूची के जरिए यह तय कर रही है कि वोट कौन देगा। यह विवाद बंगाल से उठकर राष्ट्रीय लोकतंत्र और चुनावी विश्वसनीयता की लड़ाई में...

पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा उबाल पर रहती है, लेकिन इस बार मामला सिर्फ बंगाल का नहीं, पूरे देश की चुनावी आत्मा का है। ममता बनर्जी ने जिस तरह SIR यानी विशेष पुनरीक्षण को “आग से खेलने” जैसा बताया है, वह सिर्फ असंतोष नहीं, बल्कि सत्ता के खिलाफ खुली चेतावनी है। उन्होंने कहा कि मतदाता सूची का पहला ड्राफ्ट “आपदा” होगा, यह कोई हल्का वाक्य नहीं। यह उस भरोसे पर चोट है, जिस पर देश का लोकतंत्र टिका हुआ है।
ममता बनर्जी का आरोप है कि दो महीने में मतदाता सूची का पुनरीक्षण संभव ही नहीं। वह कहती हैं कि यह काम तीन साल लेता है, लेकिन भाजपा और चुनाव आयोग इसे बिजली की गति से निपटाना चाहते हैं। “सभी तरह का गलत डेटा भरा जा रहा है।” यह आरोप प्रशासनिक नहीं, राजनीतिक ध्वंस का आरोप है। इससे वह यह बताना चाहती हैं कि खेल निष्पक्ष नहीं है, और मैदान उसी के मुताबिक तैयार किया जा रहा है कि किसे वोट देने की अनुमति होगी और किसे सूची से काट दिया जाएगा।
ममता ने कहा, “पहले जनता तय करती थी कि सरकार कौन बनाएगी। अब सरकार तय कर रही है कि वोट कौन डालेगा।” यह वाक्य भारतीय लोकतंत्र के दिल पर सीधा प्रहार है। और यह हमला किसी गुस्से में दिया गया बयान नहीं, यह एक राजनीतिक चेतावनी है कि SIR के नाम पर जो कुछ हो रहा है, वह लोकतंत्र को कमजोर करने की कोशिश है। वह कहती हैं कि आधार, पैन, बैंक डॉक्यूमेंट, सबका कोई मतलब नहीं रह गया। मतलब, अब दस्तावेज़ नहीं, सत्ता की इच्छा ही तय करती है कि आप मतदाता हैं या नहीं।
ममता की शैली ऐसी है कि जब वह निशाना साधती हैं, तो सीधा जहां चोट करनी हो, वहीं करती हैं। उन्होंने कहा, “जो भाजपा कहती है वही होता है। हमेशा Yes Papa. भाजपा के बिना कोई Papa नहीं।” यह व्यंग्य नहीं, एक गहरी राजनीतिक टिप्पणी है। इसमें वह भाजपा-शासन वाले तंत्र को कठघरे में खड़ा कर रही हैं और बता रही हैं कि चुनाव आयोग भले ही नाम लेकर निशाने पर न आए, पर उनकी नज़र में उसका संचालन किसके हाथ में है, यह देश को समझना चाहिए।
ममता ने यह भी कहा कि 2029 भाजपा के लिए “खतरनाक साल” होगा और सरकार जाएगी। यह सिर्फ भविष्यवाणी नहीं, यह राजनीति में अपनी वापसी की रणनीतिक घोषणा है। वह साफ संदेश दे रही हैं कि SIR अगर ग़ैर-पारदर्शी रहा, तो वह इसे राष्ट्रीय आंदोलन बनाएँगी। उन्होंने कहा कि 2026 के विधानसभा चुनावों के बाद वह पूरा देश घूमेंगी, यानी लड़ाई अब बंगाल की सीमाओं में कैद नहीं है।
असल सवाल यही है कि SIR के बहाने क्या वाकई मतदाता सूची से छेड़छाड़ हो रही है? विपक्ष लंबे समय से यह दावा करता रहा है कि मतदाता सूची का संशोधन भाजपा की “राजनीतिक इंजीनियरिंग” का हिस्सा है, जहां असल मतदाता हटाए जाते हैं और नए नाम जोड़े जाते हैं ताकि चुनावी गणित बदले। ममता उसी आरोप को और तीखे स्वर में सामने ला रही हैं। भाजपा इसे सुधार बताती है और विपक्ष इसे सत्ता का खेल।
लेकिन यह बात तय है कि अगर मतदाता सूची ही विवाद में आ जाए, तो चुनाव पर भरोसा कैसे बचेगा? लोकतंत्र की शुरुआत मतदाता से होती है। यदि मतदाता ही संदिग्ध बना दिया जाए या यह तय करने का अधिकार सरकार के हाथों में आ जाए तो चुनाव सिर्फ एक रस्म बनकर रह जाएगा। और यही डर ममता बनर्जी उभार रही हैं।
चुनाव आयोग के लिए यह वक्त सबसे बड़ी परीक्षा का है। उसे साबित करना होगा कि SIR राजनीतिक दबाव में नहीं, पारदर्शिता और नियमों के आधार पर हो रहा है। क्योंकि लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत वही मतदाता है, जिसका नाम सूची में हो या न हो, यह सवाल आज बड़ा बन गया है।






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