विश्वास व विवाद के बीच खड़ा लोकतंत्र
निर्वाचन आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण-2026 ने राजनीतिक हलचल तेज कर दी है। सरकार इसे चुनावी व्यवस्था को स्वच्छ बनाने का प्रयास बताती है, जबकि विपक्ष इसे नागरिकों को सूची से बाहर करने की आशंका के रूप...

मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण-2026
राकेश गांधी,
वरिष्ठ पत्रकार
Table Of Content
- मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण-2026
- विशेष पुनरीक्षण क्या है और क्यों आवश्यक बताया जा रहा
- इस प्रक्रिया में तकनीक की दोहरी भूमिका
- विपक्ष का पहला आरोप : दस्तावेज रहित गरीबों पर दबाव
- दस्तावेज़ों की उलझन और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
- दूसरा आरोप : नागरिकता की जांच समान रूप से नहीं हो रही
- तीसरी आशंका : आयोग की स्वतंत्रता पर ही सवाल
- सरकार का पक्ष : सूची को स्वच्छ करना ही लोकतंत्र की मजबूरी
- सरकार कहती है : घर- घर जाकर जांच नागरिकों के हित में
- होना यह चाहिए : संतुलन, पारदर्शिता और भरोसा
- समय व परिस्थितियां भी ध्यान में रखना जरूरी
- भरोसा ही लोकतंत्र का आधार
- बढ़ता काम का दबाव, थकान का संकट
- पश्चिम बंगाल में भगदड़ का माहौल और बढ़ती बेचैनी
भारत में चुनाव केवल राजनीतिक दावपेंचों का संसार नहीं है। यह वह रास्ता है जिसके जरिये साधारण नागरिक अपनी इच्छा और भरोसे को सरकार तक पहुंचाता है। इसलिए यह जरूरी है कि मतदाता सूची बिलकुल साफ सुथरी हो, ताकि जनता के मत का सम्मान हो और चुनावी व्यवस्था पर किसी तरह का सन्देह न रहे। लेकिन जब खुद सूची पर ही सवाल उठने लगें, उसमें गड़बड़ी के आरोप लगने लगें या उसकी शुद्धता पर भ्रम के बादल मंडराने लगें तो लोकतंत्र का पूरा ढांचा असहज दिखाई देने लगता है।
इसी माहौल में निर्वाचन आयोग ने विशेष गहन पुनरीक्षण-2026 आरम्भ किया है, जो आज पूरे देश में चर्चा का मुख्य कारण बन गया है। सरकार और आयोग इसे व्यवस्था सुधारने का बड़ा कदम बता रहे हैं। उनका कहना है कि इससे मतदाता सूची पहले से अधिक भरोसेमंद होगी और मृत, लापता तथा दोहरी प्रविष्टियों जैसी त्रुटियां खत्म होंगी। दूसरी ओर विपक्ष का मानना है कि यह अभियान सिर्फ जांच नहीं, बल्कि छंटाई साबित हो सकता है, जिसमें गरीब और दस्तावेज रहित नागरिकों को सूची से बाहर कर देने का जोखिम बढ़ जाता है। यही खींचतान आम मतदाता को असमंजस में डाल रही है।
विशेष पुनरीक्षण क्या है और क्यों आवश्यक बताया जा रहा
यह प्रक्रिया देश भर में चल रहा एक बड़ा प्रशासनिक अभियान है। इसके तहत आयोग के कर्मचारी घर- घर जाकर यह देखते हैं कि मतदाता सूची में दिया गया नाम सही पते से मेल खाता है या नहीं और वह व्यक्ति सचमुच उस क्षेत्र का निवासी और भारत का नागरिक है या नहीं। सैद्धांतिक स्तर पर यह प्रक्रिया स्वाभाविक और आवश्यक है, क्योंकि लोकतंत्र तभी मजबूत होता है जब सूची से सभी गलत नाम हटें और हर पात्र नागरिक को मौका मिले कि उसका नाम सही स्थान पर दर्ज हो।
लेकिन जहां काम बड़ा हो, वहां आशंकाएं भी उतनी ही बड़ी होती हैं। सूची का प्रत्येक नाम अपने साथ राजनीतिक समीकरण की अहमियत भी रखता है। इसलिए किसी नाम का हटना या जुड़ना केवल कागजी कार्यवाही नहीं रह जाता, बल्कि अनेक दलों के भविष्य और उनके वोट आधार को भी प्रभावित करता है। यही कारण है कि विपक्ष इसे लेकर अत्यंत चौकन्ना हो गया है।
इस प्रक्रिया में तकनीक की दोहरी भूमिका
पुनरीक्षण प्रक्रिया में अब तकनीक का भी व्यापक इस्तेमाल हो रहा है। आयोग डी-डुप्लीकेशन सॉफ्टवेयर का उपयोग करता है, ताकि एक ही व्यक्ति का नाम दो अलग- अलग स्थानों पर न हो। इसके अलावा, आधार को वोटर आईडी से लिंक करने की स्वैच्छिक मुहिम भी सूची की स्वच्छता में सहायक मानी जाती है।
लेकिन तकनीक पर निर्भरता ने नई चिंताएं भी पैदा की हैं। विपक्ष का मानना है कि सॉफ्टवेयर कई बार समान नाम, पता या उम्र वाले गरीब लोगों को गलत तरीके से ‘डुप्लीकेट’ मानकर हटाने की सिफारिश कर देता है। इसके अलावा, आधार लिंकिंग को स्वैच्छिक होने के बावजूद, कर्मचारी कई बार गरीब नागरिकों पर इसे जमा करने का अनुचित दबाव डालते हैं, जिससे वे अपने नाम कटने के डर से सूची से दूर भागते हैं।
विपक्ष का पहला आरोप : दस्तावेज रहित गरीबों पर दबाव
विपक्ष का मानना है कि यह प्रक्रिया सबसे अधिक दबाव उस वर्ग पर डाल रही है, जिसके पास कागजी प्रमाण बहुत कम हैं। देश की एक बड़ी आबादी अभी भी ऐसे घरों में रहती है जहां न तो स्थायी पता होता है और न ही जन्म प्रमाण-पत्र, भूमि-पत्र या निवास प्रमाण जैसे दस्तावेज उपलब्ध होते हैं। यह परिवार अक्सर काम की तलाश में विभिन्न स्थानों पर जाते रहते हैं। ऐसे नागरिक जब अचानक आयोग के कर्मचारियों द्वारा पूछताछ और दस्तावेज की मांग का सामना करते हैं तो स्वाभाविक रूप से घबरा जाते हैं। विपक्ष का आरोप है कि इस स्थिति का लाभ उठाकर उनके नाम आसानी से काटे जा सकते हैं। कई राज्यों में गरीब और मजदूर वर्ग का रुझान विपक्षी दलों के प्रति अधिक देखा गया है, इसलिए यह आरोप और तीखा हो जाता है। खासकर फॉर्म-7 का इस्तेमाल करके नाम हटाने की प्रक्रिया सबसे विवादास्पद होती है। आयोग को यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी नाम को हटाने से पहले उचित सुनवाई और नोटिस दिया जाए।
दस्तावेज़ों की उलझन और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
मतदाता पंजीकरण के लिए पहचान और आयु प्रमाणों की स्वीकार्यता भारत में समय के साथ विकसित हुई है, जो प्रशासनिक सुविधा और कानूनी आवश्यकताओं के बीच संतुलन साधती रही है। शुरुआती दौर में, जन्म प्रमाण-पत्र या स्कूल द्वारा जारी किए गए दसवीं या बारहवीं की मार्कशीट को आयु और नागरिकता दोनों के लिए मजबूत प्रमाण माना जाता था। ये दस्तावेज़ किसी व्यक्ति की पहचान को उसके निवास और शैक्षणिक रिकॉर्ड से जोड़ते थे।
जैसे- जैसे आधार कार्ड का प्रचलन बढ़ा, यह एक सुविधाजनक और व्यापक रूप से उपलब्ध पहचान पत्र बन गया। निर्वाचन आयोग ने इसे व्यापक रूप से स्वीकार करना शुरू कर दिया, विशेष रूप से पहचान और निवास के प्रमाण के लिए। हालांकि, यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि आधार कार्ड केवल निवास का प्रमाण है, नागरिकता का नहीं। इसीलिए, मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करने के लिए अब यह नियम स्पष्ट किया गया है कि केवल आधार कार्ड को नागरिकता या आयु का एकमात्र प्रमाण नहीं माना जाएगा। आयोग अब भी मतदाता पंजीकरण के लिए अन्य वैध दस्तावेज़ों (जैसे पासपोर्ट, जन्म प्रमाण-पत्र, या शैक्षणिक प्रमाण-पत्र) के साथ आधार को एक सहायक दस्तावेज़ के रूप में स्वीकार करता है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि कोई भी पात्र नागरिक सिर्फ एक दस्तावेज़ की कमी के कारण बाहर न रहे, लेकिन साथ ही चुनावी प्रक्रिया की कानूनी शुद्धता बनी रहे।
दूसरा आरोप : नागरिकता की जांच समान रूप से नहीं हो रही
विपक्ष का कहना है कि नागरिकता की जांच का तरीका एक समान नहीं है। कुछ क्षेत्रों पर विशेष निगरानी रखी जा रही है, जबकि कुछ इलाकों को साधारण जांच से ही पार कर दिया जा रहा है। खासकर वे क्षेत्र जहां अल्पसंख्यक नागरिक या विपक्षी मतदाता अधिक हैं, वहां यह प्रक्रिया अधिक कठोर बताई जा रही है। विपक्ष को डर है कि इस असमानता के जरिये राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश की जा सकती है और कुछ वर्गों को व्यवस्थित रूप से सूची से बाहर किया जा सकता है।
तीसरी आशंका : आयोग की स्वतंत्रता पर ही सवाल
विपक्ष को यह भी शिकायत है कि आयोग इस समय पहले जैसी स्वतंत्रता प्रदर्शित नहीं कर रहा। उनका आरोप है कि अनेक नीतियां सरकार की इच्छा के अनुकूल प्रतीत होती हैं। हाल के कुछ निर्णयों ने इस आशंका को और बढ़ाया है, जिससे विपक्ष का भरोसा कमजोर हुआ है। लोकतंत्र में आयोग की प्रतिष्ठा उसकी निष्पक्षता से ही बनती है। यदि कोई भी दल उसकी निष्पक्षता पर प्रश्न उठा दे तो पूरी प्रक्रिया पर शक की छाया पड़ जाती है।
सरकार का पक्ष : सूची को स्वच्छ करना ही लोकतंत्र की मजबूरी
सरकार और आयोग इस पूरे विवाद का अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं। उनका कहना है कि मतदाता सूची में वर्षों से कई त्रुटियां जमा होती जाती हैं। मृत व्यक्तियों के नाम बने रहते हैं, कई लोग अन्य राज्यों में जाकर बस जाते हैं, लेकिन पुराने पते पर भी उनका नाम दर्ज होता रहता है। कहीं- कहीं लोग जानबूझ कर दो स्थानों पर नाम दर्ज करा लेते हैं। इससे न केवल गड़बड़ी होती है, बल्कि परिणाम भी प्रभावित हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में सूची की सफाई और सुधार जरूरी हो जाता है।
सरकार कहती है : घर- घर जाकर जांच नागरिकों के हित में
सरकार का यह भी तर्क है कि यह प्रक्रिया किसी पर दबाव डालने के लिए नहीं, बल्कि लोगों को जागरुक करने और दस्तावेज व्यवस्थित करने का अवसर देने के लिए है। आयोग के कर्मचारियों को कई राज्यों में स्थानीय सहायता भी दी गई है, ताकि वे सही जानकारी जुटा सकें और गलतफहमियों की गुंजाइश कम हो। सरकार का कहना है कि यह मुहिम किसी वर्ग विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि पूरे देश में एक समान ढंग से हो रही है। यह सुधार अभियान जनता के हित में है और इससे लोकतंत्र का ढांचा मजबूत होगा।
होना यह चाहिए : संतुलन, पारदर्शिता और भरोसा
सच यह है कि दोनों पक्षों के तर्क अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं। यह प्रक्रिया आवश्यक भी है और इससे जुड़ी आशंकाएं भी वास्तविक हैं। भारत जैसा बड़ा और विविध देश किसी भी प्रशासनिक व्यवस्था के लिए चुनौतीपूर्ण है। इसीलिए जरूरी यह है कि प्रक्रियाएं ऐसी हों जिन पर सभी का विश्वास बना रहे।
• सरकार को तय करना होगा ‘गोल्ड स्टैंडर्ड’ : मतदाता सूची की शुद्धता पर बार-बार उठने वाले विवादों को खत्म करने के लिए, सरकार और आयोग को मिलकर एक निर्णायक कदम उठाना होगा। नागरिकता और पात्रता के प्रमाण के लिए किसी एक या कुछ ‘गोल्ड स्टैंडर्ड’ दस्तावेज़ों को पुख्ता प्रमाण के रूप में कानूनी मान्यता देनी होगी, न कि दस्तावेजों की लंबी सूची पर निर्भर रहना चाहिए। यदि पासपोर्ट या जन्म प्रमाण-पत्र जैसे दस्तावेजों को प्राथमिक प्रमाण माना जाता है, तो इसके साथ ही यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि इन दस्तावेजों को हासिल करने की प्रक्रिया देश के हर नागरिक, खासकर ग्रामीण और गरीब वर्गों के लिए सरल, सुलभ और मुफ्त हो। जब तक हर नागरिक के पास एक ऐसा ‘पुख्ता’ प्रमाण नहीं होगा, जिसे कोई चुनौती न दे सके, तब तक हर पुनरीक्षण अभियान केवल अविश्वास और कानूनी उलझनों को ही जन्म देता रहेगा। यह स्पष्टता ही लोकतंत्र में भरोसे का आधार बन सकती है।
• राजनीतिक दलों की सक्रिय भागीदारी : मतदाता सूची को शुद्ध करने का काम केवल आयोग का नहीं है। राजनीतिक दलों को अपने बूथ लेवल एजेंट्स (BLA) को सक्रिय रूप से प्रशिक्षित करना चाहिए, ताकि वे डोर-टू-डोर सत्यापन में भाग लें। यदि प्रत्येक दल सक्रिय रूप से सूची की जांच करेगा, तो किसी भी गलत छंटनी या पक्षपात को तुरंत उजागर किया जा सकेगा, जिससे पूरी प्रक्रिया में विश्वास और संतुलन बढ़ेगा।
• पूर्ण पारदर्शिता : आयोग को अपनी पूरी कार्यवाही पारदर्शी बनानी चाहिए। जिन लोगों के नाम सूची से हटाए जाते हैं, उन्हें स्पष्ट कारण लिखित रूप में (फॉर्म 7 का उपयोग) देना जरूरी है। ऐसा कारण सार्वजनिक भी किया जा सकता है, ताकि प्रक्रिया पर संदेह न रहे। साथ ही, नागरिकों को सरल तरीका उपलब्ध कराया जाना चाहिए कि वे अपनी आपत्ति दर्ज करा सकें और सही प्रमाण देने पर उनका नाम तुरंत जोड़ दिया जाए।
• दस्तावेजों में नरमी : दस्तावेजों के मामले में भी आयोग को कठोर रुख नहीं अपनाना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति के पास जन्म प्रमाण- पत्र या भूमि- पत्र नहीं है तो उसके पास आधार कार्ड, राशन कार्ड, निवास शपथ-पत्र या अन्य प्रमाण- पत्र स्वीकार किए जा सकते हैं। नियमों का उद्देश्य नागरिक को परेशान करना नहीं, बल्कि उसके अधिकार की रक्षा करना होना चाहिए।
समय व परिस्थितियां भी ध्यान में रखना जरूरी
सत्यापन के लिए अवधि का निर्धारण भी राज्य की परिस्थितियों के अनुसार होना चाहिए। बारिश और बाढ़ के दिनों में ग्रामीण क्षेत्रों में घर- घर जाना कठिन होता है, ऐसे माहौल में जल्दबाजी करने से गलतियां बढ़ सकती हैं। यदि प्रत्येक क्षेत्र की परिस्थितियों को देखते हुए समय तय किया जाए तो प्रक्रिया अधिक प्रभावी और सही परिणाम देने वाली सिद्ध होगी।
लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि पात्र नागरिक का एक भी नाम सूची से बाहर न रहे। इसलिए यह अभियान एक प्रकार की सुधार प्रक्रिया बने, न कि छंटाई का उपकरण। नागरिकों का अधिकार ही सबसे पहले है और इसे सुरक्षित रखना आयोग और सरकार दोनों की जिम्मेदारी है।
भरोसा ही लोकतंत्र का आधार
सही मायने में कहें तो विशेष गहन पुनरीक्षण-2026 लोकतंत्र को मजबूत बनाने का अवसर भी है और उसके सामने खड़ी चुनौती भी। यदि इसे निष्पक्ष और पारदर्शी ढंग से चलाया गया तो मतदाता सूची अधिक विश्वसनीय बनेगी और जनता का भरोसा बढ़ेगा। लेकिन यदि इसमें जल्दबाजी, असमानता या पक्षपात दिखाई दिया तो यह प्रक्रिया लाभ के बजाय अविश्वास पैदा करेगी। लोकतंत्र केवल नियमों और सूचियों से नहीं चलता, वह चलता है जनता के भरोसे से। उस भरोसे को सुरक्षित रखना ही आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
बढ़ता काम का दबाव, थकान का संकट
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान बीएलओ पर पड़ रहा दबाव अब खबरों में भी साफ दिखाई दे रहा है। दिन भर घर- घर जाकर सत्यापन, दस्तावेज जांच और लगातार लक्ष्यों को पूरा करने की मजबूरी ने कई कर्मचारियों को भारी तनाव में डाल दिया है। कुछ जिलों से तो ऐसे मामलों की सूचना सामने आई है, जहां काम के दबाव और शारीरिक थकान के बीच बीएलओ की मौत तक हो गई। यह स्थिति प्रशासनिक मशीनरी की वह परत उजागर करती है जो अक्सर रिपोर्टों में अनदेखी रह जाती है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया का यह महत्वपूर्ण काम तभी सुरक्षित रह सकता है, जब इसे निभाने वाले कर्मचारियों की सेहत और क्षमता का भी समान ध्यान रखा जाए।
पश्चिम बंगाल में भगदड़ का माहौल और बढ़ती बेचैनी
दूसरी ओर पश्चिम बंगाल में हाल की हलचल इस अभियान के सामाजिक असर को दर्शाती है। अवैध रूप से रह रहे लोगों के बीच अचानक भय फैलने लगा है और कई क्षेत्रों में उनके मूल स्थानों की ओर लौटने की कोशिशों से भगदड़ जैसा माहौल बन गया है। स्थानीय स्तरीय अफवाहों और गलत सूचनाओं ने उनकी बेचैनी को और बढ़ा दिया है। यह स्थिति बताती है कि मतदाता सूची की जांच केवल तकनीकी प्रक्रिया नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक प्रभावों से भी घिरी होती है। जहां भी जानकारी अस्पष्ट रहती है वहां अफवाहें हावी हो जाती हैं और सामूहिक घबराहट जैसी स्थितियां जन्म लेती हैं। यह भी आवश्यक है कि प्रशासन इस प्रकार की आशंकाओं को शांत करने के लिए स्पष्ट संवाद और विश्वसनीय जानकारी उपलब्ध कराए।






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