ले डूबी आपसी खींचतान
यह सिर्फ एक हार नहीं, बल्कि बड़ा सियासी संकेत है भाजपा और उसके नेताओं के लिए। इसके दूरगामी परिणाम भी प्रदेश की राजनीति में देखने को मिलेंगे या कहें कि इसका असर अभी से दिखने भी लगा है। चाहे प्रदेश में...

अंता उप चुनाव की हार भाजपा के लिए बड़ा झटका
सुरेश व्यास,
वरिष्ठ पत्रकार
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राजस्थान में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी की अंता विधानसभा क्षेत्र के उपचुनाव में बड़े मत अंतर से हार को सामान्य तो नहीं कहा जा सकता। निश्चित तौर पर यह हार भाजपा और प्रदेश की भजनलाल शर्मा सरकार के लिए बड़ा झटका है। वैसे तो चुनावों में हार-जीत एक सामान्य बात है। दो लड़ते हैं तो एक जीतता और दूसरा हारता है, लेकिन अंता का यह उप चुनाव हर मायने में खास था। भले ही यह प्रदेश का एक मात्र उपचुनाव था और पूरी सरकार और भाजपा के पास समग्र ताकत थी कि वह यह चुनाव आसानी से जीत सकती थी, फिर भी हार हुई। इस हार की गहराई में जाने से लगेगा कि यह सिर्फ एक हार नहीं, बल्कि बड़ा सियासी संकेत है भाजपा और उसके नेताओं के लिए। भाजपा के लिए इस चुनावी हार ने आंतरिक राजनीति में भी नए समीकरणों के उभार के संकेत देने शुरू कर दिए हैं।
आमतौर पर माना जाता है कि जिस भी राज्य में कोई विधानसभा उप चुनाव होता है तो यह सत्ताधारी दल के लिए एक तरह से एडवान्टेज है। पिछला इतिहास देखें तो बहुत कम ऐसे मौके नजर आएंगे कि सत्ताधारी दल को विधानसभा क्षेत्र के उपचुनाव में भारी हार का सामना करना पड़ा हो। प्रदेश में दो साल पहले बनी भाजपा सरकार ने पिछले साल ही सात उपचुनाव देखे हैं। इनमें से पांच में भाजपा को जीत हासिल हुई और एक-एक सीट कांग्रेस और बीएपी ने जीती। ये चुनाव विधायकों के सांसद चुने जाने की वजह से हुए थे। उस वक्त भाजपा की इस जीत को काफी अहम माना गया, क्योंकि कुछ महीने पहले ही संसदीय चुनाव में पार्टी हारी थी और बाद में उस संसदीय क्षेत्र की विधानसभा सीट झटके में जीत ली। ऐसे में अंता उपचुनाव के बाद सवाल खड़ा हो रहा है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि भाजपा वहां पहली बार हुआ उपचुनाव जीत नहीं सकी या यूं कहें कि अपनी जीती हुई सीट बरकरार नहीं रख पाई।
अंता में अब तक हुए चार चुनावों में भाजपा-कांग्रेस दो-दो बार जीती है। पहला चुनाव कांग्रेस के प्रमोद जैन भाया ने 2008 में भाजपा के दिग्गज नेता रघुवीर सिंह कौशल को हराया तो 2013 में भाजपा के प्रभुलाल सैनी ने भाया को हराया। वर्ष 2018 के चुनाव में भाया ने सैनी को हराकर गहलोत सरकार में काबिना मंत्री बने। पिछले यानी 2023 के चुनाव में कंवरलाल मीणा ने भाया को हराकर अंता सीट फिर से भाजपा की झोली में डाल दी थी।
इसलिए आई उपचुनाव की नौबत
अंता में अब पहला उपचुनाव हुआ है। कारण रहा एक आपराधिक मामले में तीन साल की सजा के कारण कंवरलाल की विधायकी रद्द होना। कंवरलाल पर साल 2005 के पंचायत राज चुनावों के दौरान उपखंड अधिकारी पर पिस्तौल तानकर धमकी देने और वीडियोग्राफी के दौरान कैसेट तोड़ देने का आरोप था। उन्हें दिसम्बर 2020 में निचली अदालत ने तीन साल की सजा सुनाई। इसे उन्होंने हाईकोर्ट में चुनौती दी। वहां पांच साल केस चला। सजा बरकरार रही। यह फैसला साल की शुरुआत में ही आ गया। कंवरलाल ने सुप्रीम कोर्ट तक राहत के लिए हाथ-पैर मारे, लेकिन फैसला नहीं बदला। ऐसे में इसी साल मई में ही उनकी विधायकी रद्द कर दी गई। तभी से तय था कि यहां विधानसभा उपचुनाव होगा। लेकिन भाजपा की अंदरूनी राजनीति यहीं से शुरू हो जाती है और यही अंता में उप चुनाव होने का एक परोक्ष आधार भी बनती है। कारण कि कंवरलाल प्रदेश की राजनीति से एक तरह से नैपथ्य में भेजी जा चुकी पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के नजदीकी हैं और अंता से पहले वे मनोहर थाना विधानसभा क्षेत्र से 2013 से 2018 तक विधायक रह चुके थे। वसुंधरा राजे चाहती थी कि राज्यपाल के समक्ष दया याचिका पेश कर उनकी सजा में कमी करवा दी जाए, ताकि उपचुनाव की नौबत नहीं आए। बताते हैं कि उन्होंने दिल्ली तक प्रयास किए। इसके बाद जब राज्य सरकार को इस सम्बन्ध में हरी झंडी मिली तो पत्रावली को राजभवन पहुंचाने में ही देरी हो गई और चुनाव आयोग ने बिहार विधानसभा चुनावों के साथ ही अंता में भी उपचुनाव करवाने की घोषणा कर दी। बताया जाता है कि जिस दिन पत्रावली राजभवन जाने वाली थी, उस दिन महज तीन घंटे की देरी ने उपचुनाव की नौबत ला दी।
एक-दूजे को घेरने का दांव
उपचुनाव की घोषणा के साथ ही भाजपा की अंदरूनी राजनीति भी सामने आने लगी। कांग्रेस ने को बिना देरी किए प्रमोद जैन भाया को अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया, लेकिन भाजपा आखिर तक उलझी नजर आई। अंता चूंकि वसुंधरा राजे की राजनीतिक कर्मभूमि बारां-झालावाड़ संसदीय क्षेत्र का हिस्सा है और यहां से वसुंधरा के पुत्र दुष्यंत सिंह लगातार पांचवी बार सांसद हैं। इस नाते वसुंधरा पिछले चुनाव में कंवरलाल को झालावाड़ के मनोहर थाना क्षेत्र से अंता लाकर भी जिता ले गई। चूंकि वसुंधरा दया याचिका समय पर राजभवन नहीं पहुंचा पाने के कारण सरकार से नाराज तो थी ही, इसलिए उन्होंने प्रत्याशी चयन के लिए पूछे जाने तक कोई राय नहीं दी। फिर पूछा गया तो उन्होंने कंवरलाल की पत्नी का नाम सुझा दिया, जो परिवारवाद के आरोप लगने की आशंका से आगे नहीं बढ़ पाया। जानकारों का कहना है कि मुख्यमंत्री भजनलाल और प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ यहां से पूर्व मंत्री प्रभुलाल सैनी को ही उतारने के पक्षधर थे। सैनी पिछला चुनाव बूंदी जिले की हिंडौली विधानसभा सीट से कांग्रेस के अशोक चांदना के सामने हार चुके थे। अंता में उन्हें बाहरी प्रत्याशी बताए जाने का डर भी था। फिर भी सैनी के नाम को आगे बढ़ाया गया, लेकिन वसुंधरा स्थानीय प्रत्याशी के पक्ष में थी। उन्होंने यह कहते हुए खुद को विवाद से दूर करने की कोशिश भी की कि प्रत्याशी मुख्यमंत्री व प्रदेशाध्यक्ष चुनेंगे। आखिर बारां के साधारण कार्यकर्ता मोरपाल सुमन को मैदान में उतारा गया। सांसद दुष्यंत को चुनाव प्रभारी बना दिया गया। समिति में अधिकांश सदस्य भी वसुंधरा समर्थक ही रखे गए, लेकिन क्षेत्र में प्रभाव रखने वाले छबड़ा विधायक प्रतापसिंह सिंघवी, कृषि मंत्री किरोड़ीलाल मीणा, शिक्षा मंत्री मदन दिलावर व ऊर्जा मंत्री हीरालाल नागर जैसे नेताओं को दूर रखा गया, जबकि कांग्रेस से बागी हुए नरेश मीणा ने कड़ी चुनौती देते हुए चुनाव को त्रिकोणीय बना दिया था। वसुंधरा कई दिनों तक प्रचार के लिए नहीं पहुंची। दुष्यंत व अन्य नेता प्रचार में पूरी तरह लगे रहे, यहीं से लगने लगा था कि यह अंदरूनी राजनीति का नतीजा है, ताकि चुनाव हारे तो वसुंधरा को अपने इलाके में ही कमजोर साबित किया जा सके।
हारे भी बुरी तरह से
उप चुनाव के प्रचार के दौरान वसुंधरा पूरे हफ्ते अंता निर्वाचन क्षेत्र में रही। खुद मुख्यमंत्री भजनलाल व प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ ने भी खूब प्रचार किया। भीड़ भी खूब उमड़ी। मतदान भी जमकर हुआ। प्रचार में ऊपरी तौर पर तो एकजुटता दिखी, लेकिन अंदरखाने गांठ पड़ी हुई थी। प्रचार में लगे एक प्रांतीय नेता ने मतदान से ठीक दो दिन पहले कहा कि सब कुछ इस पर निर्भर है कि नरेश कितने वोट ले जाता है। नतीजा आया तो एक तरह से चौंकाने वाला इसलिए भी था कि भाजपा प्रत्याशी मोरपाल सुमन मतगणना के 15वें राउंड तक तीसरे स्थान पर रहे। इसके बाद बढ़त बनाई, लेकिन उनमें व तीसरे स्थान पर रहे नरेश मीणा के बीच महज 126 मतों का फासला रहा और नरेश मीणा 50 हजार वोट ले गए। जाहिर है उन्होंने कांग्रेस से ज्यादा भाजपा को नुकसान पहुंचाया।
कांग्रेस के प्रमोद जैन भाया 15 हजार से अधिक मतों से जीतने के बाद विधानसभा सदस्यता की शपथ ले चुके हैं, लेकिन भाजपा अब भी सदमे में हैं। स्थानीय पत्रकार धीरेंद्र राहुल कहते हैं कि यहां से भाजपा जीतती भी कैसे। चुनाव घोषित होने तक क्षेत्र के अधूरे पड़े कामों की सुध नहीं ली गई, जबकि भाया के कार्यकाल में काफी काम शुरू हुए थे, उन्हें भी पूरा नहीं करवाया जा सका। इससे भाया के प्रति माहौल बन गया और वे आसानी से चुनाव जीत गए।
अब वसुंधरा बनाम भजनलाल
भाजपा के एक सांसद नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं कि अंता उप चुनाव में पार्टी की एकजुटता दिखी तो सही, लेकिन नतीजे में नहीं बदल सकी। हालांकि इस हार से भाजपा सरकार की सेहत पर असर नहीं पड़ेगा, लेकिन इसने विपक्ष के उस नैरेटिव को मजबूत कर दिया है कि भजनलाल सरकार जनापेक्षाओं पर खरी नहीं उतर रही। सरकार दो साल के कार्यकाल में भी गुड गवर्नेंस के मामले में नाकाम रही है। वे मानते हैं कि इसका सियासी असर कई दिनों तक दिखाई देगा। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि पिछली बार जब उपचुनाव हुए तो मुख्यमंत्री नहीं बनाए जाने से कथित तौर पर नाराज वसुंधरा एक तरह से अपने तक की ही सीमित रही, लेकिन हाल के दिनों में जब से वे सक्रिय हुई तो मौजूदा नेतृत्व इससे असहज है। एक धड़ा अंता की हार के बहाने वसुंधरा को घेरने की कोशिश में है कि वे अपने इलाके से भी भाजपा को एक विधानसभा चुनाव नहीं जिता पाई तो वसुंधरा खेमा इस उपचुनाव के बहाने भजनलाल सरकार को लिटमस टैस्ट में विफल बताने में जुटा है। अब बेहतर सत्ता संतुलन ही स्थिति को सम्भाल सकता है, वरना वसुंधरा के मुकाबले राजनीति में कम अनुभवी भजनलाल शर्मा की चुनौतियां कम नहीं होंगी। हालांकि सत्ता संतुलन की कोशिश शुरू हो गई हैं, लेकिन इसका क्या असर होता है आने वाला वक्त ही बताएगा।






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