सिविल लाइंस में तेंदुए की शाही सैर
बात- बेलगाम जयपुर के सिविल लाइंस क्षेत्र में तेंदुए की शाही सैर ने बता दिया कि असली वीआईपी मूवमेंट किसे कहते हैं। बेचारा सुरक्षा तंत्र सोच में पड़ गया। यह किस नेता के रूट से भी तेज़ निकल...

बात बेलगाम
बलवंत राज मेहता,
वरिष्ठ व्यंग्यकार
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जयपुर के सिविल लाइंस क्षेत्र में तेंदुए की शाही सैर ने बता दिया कि असली वीआईपी मूवमेंट किसे कहते हैं। बेचारा सुरक्षा तंत्र सोच में पड़ गया। यह किस नेता के रूट से भी तेज़ निकल गया! तेंदुआ पहले एक बंगले में घुसा, फिर दूसरे में और यह संयोग भी कम मज़ेदार नहीं कि उसके कदम सीधे सुरेशसिंह रावत के सरकारी आवास से होते हुए सचिन पायलट के घर के सामने तक पहुंच गए। लग रहा था जैसे कह रहा हो, “दोनों बड़े नेता हैं, पर असली ‘फुटवर्क’ मेरा है!” रावत के बंगले में झांककर शायद उसने सोचा “जल संसाधन मंत्री के यहां पानी है कि नहीं?” और पायलट के घर के सामने पहुंचकर बोला होगा, “मैं भी उड़ान भरने आया हूं, लेकिन बिना हेलिकॉप्टर के।” अधिकारियों ने इसे पकड़ने की कोशिश ऐसी की जैसे यह कोई साधारण जानवर नहीं, बल्कि दल-बदल की राजनीति का नया संदेशवाहक हो। आख़िर में तेंदुए ने दिखा दिया, सुरेश रावत हों या सचिन पायलट, सिविल लाइंस का असली अनघोषित सुपरस्टार वही है, जो बिना सिक्योरिटी पास के वीआईपी लेन में चहलकदमी कर जाता है!
मंत्री जी बने खाद निरीक्षक
राजस्थान के कृषि मंत्री इन दिनों खुद छापे मार रहे हैं। जैसे विभाग नहीं, सुपरहिट सीरीज़ चला रहे हों, “खाद का खलनायक कौन?” वे खेत-खलिहानों में पहुंचते हैं, गोदामों के ताले तोड़ते हैं, और अफसरों की आंखों से नींद चुरा लेते हैं। जो कर्मचारी बरसों से “गुणवत्ता” की रक्षा कर रहे थे, शायद वे खाद में नहीं, फाइलों में मिलावट जांचते रहे! अब मंत्रीजी खुद हर बोरिया सूंघ रहे हैं, कहीं असली काम की गंध मिले तो सही। लगता है, पूरे कृषि विभाग की उपज अब एक ही है ढीली जवाबदेही और कड़ी शर्मिंदगी!
ज्योतिषीय यातायात का नया युग!
वाह! अब राजस्थान में ट्रैफिक विभाग नहीं, ज्योतिष विभाग काम करेगा! हादसा हो जाए तो सड़क नहीं, राहु दोषी। बस पलटे तो शनि की साढ़ेसाती! अब सिग्नल पर “लाल बत्ती” नहीं, “लाल ग्रह” देखना होगा। ड्राइवर सीट पर हेलमेट की जगह हनुमान चालीसा, और बस डिपो में “नवग्रह शांति यज्ञ”। विधानसभा में मुख्य सचेतक जोगेश्वर गर्ग के बयान से तो लगता है, अब सड़क इंजीनियर नहीं, ज्योतिषाचार्य सड़कें नापेंगे कि मंगल दशा में ही डामर डलवाओ। कभी सोचा नहीं था कि सड़क के गड्ढों को भी ग्रहों के गड्ढ़े कहा जाएगा। शुक्र है कि उन्होंने ये नहीं कहा, “हादसे इसलिए हो रहे हैं क्योंकि चंद्रमा भावुक है!” अब जनता भी ट्रैफिक पुलिस को नहीं, पंडित जी को फोन करेगी, “पंडित जी, निकलूं क्या आज या राहु काल है?” वाह री राजनीति! जब जिम्मेदारी का ग्रहण लगता है, तो हर गलती ग्रहों पर डाल दी जाती है!
गुरु, मदिरा और मोबाइल नंबर की शिक्षा
बाड़मेर की मिट्टी ने तो वीर पैदा किए, पर इस बार एक “वीर” ने शिक्षा को ही नशे में डुबो दिया। हापों की ढाणी के सरकारी स्कूल में छुट्टी के बाद गुरुजी शराब की “विद्या” का पाठ पढ़ाते गैलरी में ही शयन मुद्रा में पाए गए। मानो आराम हराम है का नारा बदलकर आराम ही परमानंद है, कर दिया हो। छात्रों ने वीडियो बनाया, ग्रामीणों ने वायरल किया, और प्रिंसिपल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए उन्हें “रिलीव” कर दिया। शायद अब वह किसी और स्कूल की “वातावरणीय शिक्षा” सुधारेंगे। सुबह छात्रा की कॉपी में मोबाइल नंबर, शाम को स्कूल की गैलरी में नींद। दिन भर की परिपूर्ण शैक्षणिक दिनचर्या! शिक्षा मंत्रालय चाहे कुछ भी करे, पर कुछ गुरुओं का पाठ्यक्रम अब “चरित्रहीनता और चरस” का संयुक्त सिलेबस बन चुका है। कहते हैं गुरु अंधकार मिटाता है, पर यहां तो गुरु खुद अंधकार में डूब गया और शिक्षा व्यवस्था उसका दीया लेकर अब भी रास्ता तलाश रही है।
अब शिक्षा भी कॉस्ट कटिंग मोड पर
राजस्थान में अब शिक्षा भी कॉस्ट कटिंग मोड पर आ गई है। तीन सौ से ज्यादा सरकारी स्कूल अब मर्जर में चले जाएंगे। जैसे किसी कंपनी का घाटा संभालने का फार्मूला हो। शिक्षा मंत्री का कहना है कि बच्चों की संख्या 25 से कम थी, तो स्कूल का क्या करें? मानो बच्चे नहीं, टार्गेट यूनिट्स हों! जिन स्कूलों में एक भी बच्चा नहीं था, वो तो सरकार की साइलेंट क्लास बन गए। बिना हाजिरी, बिना परीक्षा। अब उन बिल्डिंगों में सरकारी फाइलें पढ़ाई जाएंगी, और टीचर्स नए पते पर ट्रांसफर होप के साथ पहुंचेंगे। सरकार कहती है कि बच्चों ने प्राइवेट स्कूलों का रुख कर लिया। यानी शिक्षा अब भी जनता के बीच लोकप्रिय है, बस सरकारी ब्रांड पर भरोसा नहीं बचा। शिक्षा का मर्जर हो या स्कूल का बंद होना, असली सवाल यही है कि अब “ज्ञान” किस स्कूल में एडमिशन लेगा?
अजमेर में जल-बिजली संगम
पिछले दिनों अजमेर ने एक नया रिकॉर्ड कायम किया। नल सूखे तो क्या, बल्ब भी बुझा दिए! बीसलपुर की पाइपलाइन ने रात दो बजे आत्मनिर्भरता का परिचय देते हुए खुद ही फूटने का फैसला कर लिया। शहर की प्यास पर विराम लगा तो बिजली विभाग ने भी सोचा, जब नहाने का पानी नहीं, तो आईने के सामने रोशनी किसलिए! नतीजा यह कि लोग अब बाल्टी में पानी नहीं, उम्मीद भर रहे हैं। जिनके घर में थोड़ा पानी बचा है, वे उसे ऐसे संभाल रहे हैं जैसे बैंक में फिक्स डिपॉज़िट। जिनके घर में बिजली है, वे पड़ोस में “पावरफुल” कहलाने लगे हैं। सरकार का कहना है, “शाम तक सब ठीक हो जाएगा।” जनता भी आशावादी है। बस उसे ये तय करना है कि कौन सी शाम! अजमेर के नागरिक अब विकास की नई परिभाषा गढ़ रहे हैं जब नल सूखे तो मोमबत्ती जलाओ, और जब मोमबत्ती पिघले तो उम्मीद बचाओ।






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