कुपोषण की मार, व्यवस्था पर सवाल
महाराष्ट्र जैसे विकसित राज्य के मेलघाट क्षेत्र में छह माह में 65 बच्चों की कुपोषण से मौतें उस सच्चाई को उजागर करती हैं कि विकास के दावों के पीछे उपेक्षित जीवन कितने असहाय पड़े हैं। आदिवासी इलाकों में...

महाराष्ट्र के मेलघाट में छह माह में 65 बच्चों की कुपोषण से मौत
ज्ञान चंद पाटनी,
वरिष्ठ पत्रकार
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देश में ऐसे कई गंभीर मुद्दों की अनदेखी हो रही है, जिन पर देशव्यापी गंभीर चर्चा के साथ समाधान का मार्ग तलाशना बहुत जरूरी है। इनमें से एक मुद्दा है कुपोषण और भुखमरी का। हाल ही महाराष्ट्र के मेलघाट इलाके में कुपोषण से बच्चों की मौत का मामला सामने आने से यह मुद्दा एक बार फिर गरमाया है। देश के सबसे समृद्ध राज्यों में शुमार महाराष्ट्र के मुंबई शहर को देश की आर्थिक राजधानी माना जाता है, जो वाकई गर्व की बात है। शर्म की बात यह है कि इसी राज्य के मेलघाट जैसे आदिवासी क्षेत्र में बच्चे कुपोषण के कारण कालकवलित हो रहे हैं। इससे विकास व कल्याणकारी योजनाओं पर गंभीर सवाल लगता है और सरकारों की संवेदनहीनता भी उजागर होती है। आजादी के अमृतकाल में यह स्थिति वाकई चिंताजनक है और सभी को सोच-विचार के लिए मजबूर करती है।
मेलघाट महाराष्ट्र के अमरावती जिले का आदिवासी बहुल इलाका है। इस इलाके की दुर्गमता और वहां बुनियादी सुविधाओं की अनुपलब्धता के कारण लोगों की मुश्किलें खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहीं। इस क्षेत्र की बदहाली का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले छह महीने में यहां 65 बच्चों की कुपोषण से मौत हो चुकी है। यहां बच्चों ही नहीं, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं की अचानक होने वाली मौतें भी स्थानीय प्रशासन की लापरवाही को उजागर करती हैं। ये मौतें राज्य सरकार के लोक-कल्याणकारी दावों पर सवालिया निशान लगाती हैं।
सरकारें बदलती रहीं, हालात नहीं बदले
महाराष्ट्र में सरकारें बदलती रहीं, लेकिन मेलघाट इलाके की स्थिति बरसों से ऐसी ही है। नेताओं ने सरकार बनाने— बिगाड़ने पर तो बहुत जोर दिया, खूब जोड़— तोड़ और दलबदल भी हुआ। दुर्भाग्य की बात यह है कि बच्चों को कुपोषण से मुक्त कराने पर खास ध्यान ही नहीं दिया गया। हां, इस इलाके की तरफ बॉम्बे हाईकोर्ट की निगाह जरूर गई, जहां जनहित याचिकाओं पर सुनवाई हो रही है। अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि सरकार सिर्फ कागजों पर सबकुछ सही दिखाने की कोशिश करती है, जबकि वहां के हालात अब भी बेहद गंभीर हैं। हाईकोर्ट ने महिला एवं बाल कल्याण, स्वास्थ्य, आदिवासी विकास और वित्त विभागों के प्रमुख सचिवों को अदालत में तलब तक किया। उनसे विस्तृत रिपोर्ट मांगकर जवाबदेही तय करने का आदेश भी दिया है।
इलाज तो छोड़ो, दूध व भोजन तक नहीं
मेलघाट आदिवासी इलाके की हालत यह है कि मां को भोजन नहीं, तो बच्चे को दूध नहीं और इलाज तो बहुत दूर की बात है। गर्भवती महिलाओं एवं नवजात शिशुओं की देखभाल, पोषण एवं उपचार की व्यवस्था एकदम नदारद है। असल में इस इलाके का बारिश में संपर्क टूट जाता है। पुरुष काम की तलाश में बाहर जाते हैं और पीछे रह जाती हैं महिलाएं, बच्चे और बूढ़े। जब खाने का ठिकाना ही नहीं, तो चिकित्सा की तो बात करना ही बेमानी लगता है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने ठीक ही कहा है कि कुपोषण को महज आंकड़े के रूप में न देखा जाए, मानव त्रासदी मानकर इस समस्या के समाधान के लिए ठोस उपाय किए जाएं।
1.80 लाख बच्चे कुपोषित..!
इस बीच यह तथ्य भी चिंताजनक है कि कुपोषण का संकट महाराष्ट्र के शहरी क्षेत्रों में भी तेजी से बढ़ता जा रहा है। इसी वर्ष जुलाई में विधानसभा में महिला एवं बाल विकास मंत्री ने बताया था कि महाराष्ट्र में 1,80,000 से ज्यादा बच्चे कुपोषित हैं।
यानी सरकार को समस्या का पता तो है, लेकिन इसका समाधान करने में उसकी खास दिलचस्पी नजर नहीं आती। मुंबई के उपनगरों, नासिक, पुणे, ठाणे और कई अन्य बड़े शहरों में कुपोषित बच्चों की संख्या चौंकाने वाली है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार राज्य में कुल मिलाकर 1,82,443 बच्चे कुपोषण से पीड़ित हैं। इसमें से लगभग 1,51,643 मध्यम कुपोषित और 30,800 गंभीर रूप से कुपोषित हैं। ये तो सरकारी आंकड़ें हैं। इसका मतलब है कुपोषित बच्चों की संख्या ज्यादा हो सकती है।
मुंबई के उपनगरों के हालात भी ठीक नहीं
गगनचुंबी इमारतों के लिए प्रसिद्ध मायानगरी मुंबई के उपनगरों में भी 16,344 बच्चे कुपोषित पाए गए हैं, जिनमें से 13,457 मध्यम और 2887 गंभीर रूप से प्रभावित हैं। जाहिर है झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले लोग बुनियादी खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य सुविधा के लिए संघर्ष कर रहे हैं। नासिक में भी 9852 बच्चे कुपोषण का सामना कर रहे हैं, जिनमें 8944 मध्यम और 1852 गंभीर मामले हैं। पुणे में 7410 मध्यम और 1666 गंभीर रूप से कुपोषित बच्चे हैं, वहीं ठाणे जिले में 7366 मध्यम और 844 गंभीर हैं। अन्य जिलों जैसे धुले, छत्रपति संभाजी नगर और नागपुर में भी बड़ी संख्या में बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती खाद्य लागत, शहरी गरीबी और पोषण के प्रति जागरूकता की कमी ने शहरी क्षेत्र में भी कुपोषण की समस्या को जटिल बनाया है।
आधे से ज्यादा भारतीय ‘स्वस्थ आहार’ से वंचित
जब कोई व्यक्ति अपने दैनिक आहार से उतनी ऊर्जा प्राप्त नहीं कर पाता जिससे वह एक सामान्य व सक्रिय जीवन जीने में सक्षम हो सके तो इसे कुपोषण की अवस्था माना जाता है। इस वर्ष जुलाई में जारी संयुक्त राष्ट्र की स्टेट ऑफ फूड सिक्योरिटी एंड न्यूट्रिशन इन द वर्ल्ड (एसओएफआई) रिपोर्ट में बताया गया है कि लगभग आधे से अधिक भारतीय (55.6%) आज भी ‘स्वस्थ आहार’ का खर्च उठाने में सक्षम नहीं है। यह भी साफ हो जाता है कि दावे चाहे जो किए जाएं, लेकिन महाराष्ट्र ही नहीं देश के दूसरे राज्यों में भी कुपोषण और भुखमरी की समस्या बनी हुई है। पिछले दिनों ग्लोबल हंगर इंडेक्स (जीएचआई) 2025 रिपोर्ट ने भी इस सच को उजागर किया था। इस रिपोर्ट के अनुसार ग्लोबल हंगर इंडेक्स के मामले में भारत 123 देशों में 102वें स्थान पर है, जिसका स्कोर 25.8 है। यह स्थिति दर्शाती है कि भारत में भुखमरी की समस्या अब भी गंभीर बनी हुई है और इसमें पिछले कुछ वर्षों में खास सुधार नहीं हुआ है। 2030 के लिए मुख्य सतत् विकास लक्ष्यों में से एक है भुखमरी को शून्य स्तर पर लाना, लेकिन भारत सहित विश्व के विभिन्न देशों के जो हालात हैं, उनमें यह लक्ष्य हासिल करना असंभव सा लगता है। वैश्विक भूख सूचकांक यानी जीएचआई एक ऐसी वार्षिक रिपोर्ट है जो दुनिया भर के देशों में भुखमरी की स्थिति को मापती है। यह रिपोर्ट कन्सर्न वर्ल्डवाइड (आयरलैंड) और वेल्थुंगरहिल्फे (जर्मनी) संयुक्त रूप से प्रकाशित करता है। इसमें भूख की गंभीरता के आधार पर देशों को रैंकिंग दी जाती है।
दूसरे राज्यों के हालात भी अच्छे नहीं
भारत के विभिन्न राज्यों में कुपोषण और भुखमरी की स्थिति अलग-अलग है। आमतौर पर, उच्च गरीबी और निम्न सामाजिक-आर्थिक संकेतकों वाले मध्यप्रदेश, झारखंड, बिहार, छत्तीसगढ़, उत्तरप्रदेश, राजस्थान जैसे राज्यों में कुपोषण की समस्या ज्यादा है। राजस्थान में भी कुपोषण से होने वाली मौतों की खबरें समय-समय पर आती रही हैं, हालांकि सरकारी अधिकारी अक्सर इन मौतों का सीधा कारण कुपोषण के बजाय अन्य बीमारियों को बताते हैं। वर्ष 2016 में बारां के सहरिया इलाके में कुपोषण से बच्चों की मौत का मामला अखबारों की सुर्खियां बना था। महाराष्ट्र का आदिवासी इलाका भी इन दिनों चर्चा में है और सरकारी अधिकारियों ने मौतों का कारण कुपोषण के बजाय निमोनिया जैसी बीमारी को बताया है। महाराष्ट्र जैसे राज्य में कुपोषण एक गंभीर समस्या बनी हुई है। इससे साफ है कि धन का असमान वितरण भी गरीबी और कुपोषण की समस्या को बढ़ाता है।
देश में नि:शुल्क अनाज योजना, मिड डे मील जैसी योजनाएं चल रही हैं। राज्य सरकारें भी कई कल्याणकारी योजनाएं चला रही हैं। मेलघाट में कुपोषण से बच्चों की मौत का मामला सामने आने से एक बार फिर साफ हो गया कि इन योजनाओं का लाभ सभी वर्गों तक नहीं पहुंच रहा। वितरण व्यवस्था में भ्रष्टाचार, प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा का अभाव, पोषक आहार तक पहुंच न होना और संवेदनशीलता की कमी कुपोषण का प्रमुख कारण है।
हैरत की बात यह है कि महाराष्ट्र में अदालती निर्देशों के बावजूद, डॉक्टरों की नियुक्ति, स्वास्थ्य केंद्रों की उपलब्धता जैसे मामलों पर काम नहीं हुआ है। समय की मांग है कि सरकारें सही आंकड़ों के आधार पर निर्णय लें। पोषक आहार की आपूर्ति एवं वितरण नेटवर्क की समीक्षा करने के साथ उसमें सुधार किया जाए। आंगनबाड़ी, आशा, एनएचएम कर्मियों को अपने काम के प्रति संवेदनशील और जिम्मेदार बनाया जाए। इसके लिए उनको विशेष आर्थिक लाभ देकर भी प्रोत्साहित किया जा सकता है। यह सुनिश्चित करना होगा कि बच्चों, गर्भवती महिलाओं और माताओं तक समय पर पोषक आहार, स्वच्छ पानी और प्राथमिक चिकित्सा पहुंचे। सरकार को निगरानी और जवाबदेही तंत्र बनाना होगा, जिससे ऐसी त्रासदी दोहराई न जाए।
बेहतर तो यह है कि मां-बच्चे के पोषण के साथ उपचार पर भी खास ध्यान दिया जाए। निश्चित रूप से मेलघाट में कुपोषण से बच्चों की मौतें सरकार और समाज के लिए चेतावनी है। जहां एक तरफ विकास की चमक है, वहीं दूसरी तरफ पीड़ा, उपेक्षा और शोक का अंधकार है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाल की सुनवाई में राज्य सरकार की संवेदनहीनता और लापरवाही की तीखी आलोचना करते हुए इसे मानवता का मुद्दा बताया है। न्यायालय की फटकार के बाद तो सरकार को जागना चाहिए। लोगों को कुपोषण के चंगुल से मुक्त कराने के लिए महाराष्ट्र ही नहीं देशभर में विशेष अभियान चलाया जाना चाहिए। यह तय है कि कुपोषण और भुखमरी के चंगुल में फंसे लोग अपने आप इससे बाहर नहीं निकल सकते। सरकार और समाज के समर्थ— संवेदनशील लोग उनकी तरफ मदद का हाथ बढ़ाएं। कुपोषण और भुखमरी सिर्फ एक आर्थिक या सामाजिक समस्या नहीं है, बल्कि यह मानव अधिकारों और जीवन की मूलभूत गरिमा से जुड़ा मामला भी है। इस समस्या के समाधान के लिए सतत प्रयासों की जरूरत है। वंचित वर्ग की हर हालत में सहायता की जानी चाहिए, ताकि वह भी सम्मान के साथ जी सके और भार बनने की बजाय पूरी क्षमता के साथ देश के विकास में अपनी भागीदारी निभा सके।






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