छूट का अजीब खेला
भारतीय बाजार: नब्बे प्रतिशत बचत या सौ प्रतिशत भ्रम? बलवंत राज मेहता.वरिष्ठ पत्रकार भारतीय बाजार में इन दिनों एक नया मायाजाल बुना जा रहा है एम.आर.पी. पर भारी छूट का खेल। ऑनलाइन स्टोर हों या मॉल के...

भारतीय बाजार: नब्बे प्रतिशत बचत या सौ प्रतिशत भ्रम?
बलवंत राज मेहता.
वरिष्ठ पत्रकार
भारतीय बाजार में इन दिनों एक नया मायाजाल बुना जा रहा है एम.आर.पी. पर भारी छूट का खेल। ऑनलाइन स्टोर हों या मॉल के शो-रूम, नब्बे प्रतिशत तक की छूट के बैनर हर जगह लटक रहे हैं। उपभोक्ता के मन में सवाल उठता है, अगर यह सचमुच बचत है तो व्यापारी नुकसान में क्यों नहीं? और अगर व्यापारी फायदा ही कमा रहा है, तो यह बचत आखिर किसकी जेब में जा रही है?
दरअसल एम.आर.पी., यानी अधिकतम खुदरा मूल्य वह सीमा है जिससे अधिक कीमत वसूलना अवैध है। पर एम.आर.पी. तय करने का अधिकार पूरी तरह निर्माता या पैकर के पास होता है। कोई सरकारी अधिकारी यह नहीं तय करता कि किसी उत्पाद की लागत कितनी है और उसकी एम.आर.पी. कितनी होनी चाहिए। यही वह जगह है जहां व्यापार की चालाकी शुरू होती है। जब कोई कंपनी किसी वस्तु की एम.आर.पी. जानबूझकर अधिक रखती है, तो बाद में उस पर 70 या 90 प्रतिशत की छूट दिखाना बेहद आसान हो जाता है।
अब सवाल यह उठता है कि किसी वस्तु की खरीद के समय एम.आर.पी. को कितना महत्व दिया जाना चाहिए? सच तो यह है कि एम.आर.पी. अब “वास्तविक कीमत” का संकेत नहीं रह गया। यह केवल एक कानूनी औपचारिकता है, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि कोई व्यापारी इस सीमा से अधिक न वसूले। किंतु अधिकांश उपभोक्ता इसे ‘असली कीमत’ मान बैठते हैं। यही वह मानसिक भ्रम है, जिसका उपयोग विपणन रणनीतियां कुशलता से करती हैं।
उच्च ‘एम.आर.पी.’ और ‘भारी छूट’ का यह खेल उपभोक्ता की मनोविज्ञान पर आधारित है। इंसान स्वभावतः ‘सेविंग’ के भाव से आकर्षित होता है। जब किसी टैग पर ‘₹9,999’ काटकर ‘₹999’ लिखा दिखता है, तो दिमाग में खुशी का रसायन ‘डोपामिन’ तेज़ी से सक्रिय होता है। व्यक्ति यह सोचता है कि उसने नौ हज़ार रुपये बचा लिए, जबकि वस्तु की वास्तविक लागत शायद पांच सौ रुपये से अधिक नहीं थी। यही एंकरिंग इफेक्ट है। जहां ऊंची कीमत को आधार मानकर उपभोक्ता कम कीमत को लाभ समझ लेता है।
यहां एक बड़ा प्रश्न यह भी है कि जब कोई उत्पाद नब्बे प्रतिशत छूट के बाद भी लाभ में बिक सकता है, तो उसकी असली लागत क्या होगी? क्या निर्माता पहले से ही कीमत को इतना बढ़ा देता है कि भारी छूट के बावजूद लाभ सुरक्षित रहे? यह शंका निराधार नहीं है। वस्त्र, जूते, कास्मेटिक, खिलौने और यहां तक कि पैक्ड खाद्य वस्तुओं में यह प्रवृत्ति आम हो चुकी है।
ऑनलाइन बाजारों में तो यह भ्रम और अधिक बढ़ गया है। इंटरनेट पर हर उत्पाद की कीमत सेकंडों में बदल जाती है। ई-कॉमर्स साइटें कृत्रिम बुद्धिमत्ता के ज़रिये उपभोक्ता के सर्च पैटर्न, लोकेशन और पिछली खरीदारी का विश्लेषण करके मूल्य तय करती हैं। इसीलिए एक ही उत्पाद दो लोगों को अलग-अलग कीमत पर दिखाया जा सकता है। यह तकनीकी चालाकी अक्सर ‘भारी छूट’ के रूप में प्रस्तुत की जाती है।
सरकार ने भी इस खेल पर अंकुश लगाने के लिए हाल के वर्षों में कुछ कदम उठाए हैं। उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय और सेंट्रल कंज्यूमर प्रोटेक्शन अथॉरिटी (सीसीपीए) ने ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्मों की भ्रामक छूटों और ‘डार्क पैटर्न्स’ के खिलाफ कार्रवाई की है।
वर्ष 2025 में फर्स्टक्राय पर ₹2 लाख का जुर्माना लगा, क्योंकि उसने ‘एम.आर.पी.’ टैक्स सहित दिखाया था, जबकि चेकआउट पर जीएसटी अलग वसूला जा रहा था। 2025 के जून में सीसीपीए ने सभी ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्मों को तीन महीने में ‘सेल्फ-ऑडिट’ कर यह घोषित करने का आदेश दिया कि वे किसी भी ‘डार्क पैटर्न’ का उपयोग नहीं कर रहे हैं।
2023 में सरकार ने आधिकारिक रूप से ‘डार्क पैटर्न्स’ को प्रतिबंधित किया। अब कोई भी प्लेटफॉर्म उपभोक्ता को झूठे काउंटडाउन टाइमर, छिपे शुल्क या गलत छूट दिखाकर भ्रमित नहीं कर सकता। इससे पहले 2021 में सीसीपीए ने प्रमुख ऑनलाइन कंपनियों को घटिया क्वालिटी के प्रेशर कुकर बेचने पर नोटिस दिए थे। सरकार के इन कदमों से यह तो स्पष्ट है कि निगरानी बढ़ रही है, पर नियंत्रण अभी भी सीमित है। कारण एम.आर.पी. का निर्धारण निजी क्षेत्र के हाथ में है और उसकी समीक्षा का कोई सार्वभौम मानदंड तय नहीं।
अब प्रश्न उठता है कि क्या उपभोक्ता शिक्षा की कमी इस समस्या की जड़ नहीं है? भारत में ‘जागो ग्राहक जागो’ जैसी मुहिमें तो चलती हैं, लेकिन डिजिटल और मनोवैज्ञानिक बाज़ार-रणनीतियों की समझ आम उपभोक्ता तक अभी नहीं पहुंची। जब तक उपभोक्ता यह नहीं सीखेगा कि ‘छूट’ और ‘सस्ता’ हमेशा समानार्थी नहीं होते, तब तक यह भ्रम बरकरार रहेगा।
विदेशों में इस दिशा में कड़े नियम हैं। यूरोपियन यूनियन ने यह अनिवार्य किया है कि यदि कोई कंपनी ‘डिस्काउंट’ दिखाती है, तो उसे पिछले 30 दिनों की औसत बिक्री कीमत भी साथ बतानी होगी। इससे उपभोक्ता को वास्तविक बचत का अंदाज़ा हो जाता है। अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में भी ‘फेक डिस्काउंट’ को धोखाधड़ी माना जाता है। भारत में अभी ऐसा कोई प्रावधान लागू नहीं है, लेकिन इस दिशा में चर्चा शुरू हो चुकी है।
आख़िरकार यह तय करना उपभोक्ता के विवेक पर ही निर्भर है कि वह किसी ‘90% छूट’ को लाभ माने या शक। यदि वह खरीदने से पहले दो मिनट तुलना कर ले, दूसरे प्लेटफॉर्म पर दाम देख ले, या पिछले दिनों की कीमत पर नज़र डाल ले तो शायद वह इस जाल में न फंसे।
छूट का आकर्षण हमेशा रहेगा, पर विवेक का प्रकाश उससे बड़ा होता है। बाजार की यह चमक तभी तक काम करती है जब तक ग्राहक अपनी आंखें बंद रखता है। एक बार उसने देखना सीख लिया, तो हर ‘डिस्काउंट’ का नकाब उतर जाएगा। एम.आर.पी. का असली अर्थ यही है मैक्सिमम रीटेल प्राईज, पर आज यह मार्केटिंग रेफरेंस पाइंट बन गया है। जरूरत है कि उपभोक्ता, सरकार और व्यापारी तीनों मिलकर इस भ्रम की परतों को उतारें। तभी बाजार ईमानदार होगा और ग्राहक वास्तव में जागरूक कहलाएगा।
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‘डिस्काउंट के नाम पर कीमत बढ़ाकर भारी छूट दिखाने का चलन तेजी से बढ़ रहा है। उपभोक्ता को समझना चाहिए कि व्यापारी कभी नुकसान उठाकर वस्तु नहीं बेचता। ज़रूरत से ज़्यादा डिस्काउंट दिखे तो सतर्क रहें, क्योंकि वास्तविक लाभ अक्सर उतना नहीं होता जितना बताया जाता है। ऐसी स्थिति में वस्तु की अनुमानित सही कीमत समझकर ही खरीदें। भ्रामक विज्ञापन की स्थिति में उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत कार्रवाई भी की जा सकती है।’
– डॉ अनंत शर्मा, नेशनल चेयरमैन कंज्यूमर्स कनफेडरेशन ऑफ़ इंडिया
‘कानून के अनुसार कोई भी ऐसा विज्ञापन जो गलत प्रभाव पैदा करे, भ्रम फैलाए या अधूरी जानकारी दे Misleading Advertisement कहलाता है, और 90% जैसी कृत्रिम छूट इसी श्रेणी में आती है। ऐसे भारी डिस्काउंट उपभोक्ता के साथ व्यावसायिक छलावा बनते जा रहे हैं, इसलिए पारदर्शी मूल्य निर्धारण और प्रभावी नियंत्रण जरूरी है। कृत्रिम छूट पर रोक उपभोक्ता संरक्षण और बाजार की स्वस्थ प्रतिस्पर्धा दोनों को मजबूत करेगी। सही जानकारी और सही मूल्य सुनिश्चित करना ही जिम्मेदार समाज और मजबूत अर्थव्यवस्था की नींव है।’
-डॉ कमल किशोर सारस्वत, अधिवक्ता, राजस्थान उच्च न्यायालय






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